मंगलवार, 21 जनवरी 2020

शिशिर ऋतु की कुछ सुखद स्मृतियाँ


र्दी का मौसम मुझे हमेशा से पसंद रहा है। शायद मेरा बचपन एक हिल स्टेशन,पौड़ी गढ़वाल, में बीता है तो इस कारण भी सर्दी के मौसम के प्रति मेरा कुछ ज्यादा ही अनुराग है। फिर सर्दी के मौसम के साथ मेरी ऐसी कई यादें जुड़ी हुई हैं कि जब उन्हें याद करता हूँ तो अपने आप ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। वैसे तो इस बार बर्फ में काफी इधर उधर घूमा। काणाताल (उत्तराखंड ) गया,  पराशर झील (हिमाचल) गया लेकिन पौड़ी की जो बात है वो शायद ही कहीं हो।

ऐसे में जब कुछ दिनों पहले मम्मी ने व्हाट्सप्प में कुछ फोटो साझा करके बताया कि पौड़ी में बर्फ गिरी है तो बचपन की सर्दियों की स्मृतियाँ  अपने आप मन में दोबारा आने लगी।

बर्फ की चादर ओढे पेड़ 
बचपन की याद करूँ तो सर्दियों में पौड़ी में ऐसा अवसर कम ही लगा जब दिन में बर्फ को गिरते हुए हमने देखा हो।मेरे जीवन में कुछ ही बार ऐसा हुआ है। वैसे तो पौड़ी में बर्फ जल्दी से गिरती नहीं है और जब गिरती भी तो ज्यादातर ऐसा होता कि बर्फ रात को गिर चुकी होती और जब हम सुबह उठते थे तो बर्फ की चादर में लिपटा पौड़ी किसी स्वर्ग की भाँती लगता था। लेकिन जब भी बर्फ गिरती है, फिर चाहे दिन में हो या रात में, हम लोग उसका आनंद लेने में पीछे नहीं रहते थे। ऐसा इसलिए भी होता था क्योंकि उन दिनों हमारी सर्दियों की छुट्टियाँ जो चल रही होती थी।

दिन में बर्फ दिन में गिरने की जो यादें मेरे जहन में ताजा है उनमें से एक तो तबकि है जब मैं काफी छोटा सा था।  यह अनुभव सुखद भी था और दुखद भी था। उन दिनों हमारा खुद का मकान नहीं बना था और हम लोग चोपड़ा में किराए के मकान में रहते थे।

उस वक्त हमारे पास एक पॉमेरियन कुत्ता हुआ करता था। सर्दी का मौसम था और हमारी छुट्टियाँ चल रही थीं। ऐसे में जब बर्फ गिरने लगी तो हम लोग बहुत उत्साहित हो गए। हम सभी बच्चे बाहर आ गए और रुई सी कोमल बर्फ को गिरते देखने लगे। साथ में जो बर्फ जमीन कर गिर कर जम गयी थी उसे उठाकर उसके गोले बनाकर एक दूसरे पर मारने लगे। जब भी बर्फ के ठंडे गोले शरीर पर लगे और उन गोलों के टूटने पर यदि बर्फ का कोई अंश शरीर के किसी ऐसे भाग पर लग जाता जिसे कपड़ों ने ढका नहीं था तो एक सिहरन सी बदन में उठ जाती। साथ में एक तरह का रोमांच भी शरीर में दौड़ जाता। हम बच्चे एक दूसरे पर गोले मारते और दूसरों के दागे गोले से खुद को बचाने का प्रयत्न करते। कभी कामयाब होते और कभी उन गोलों का शिकार भी हो जाते। लेकिन जब भी कोई गोला किसी बच्चे के टकराता तो पूरे वातावरण बच्चों की हँसी से गुंजायमान हो जाता।

बर्फ में हम बच्चे तो थे ही साथ में हमारा प्यारा कुत्ता भी था। वह भी हमे देखकर उत्साहित हो जाता और यहाँ वहाँ भागकर और तेजी से पूँछ हिलाने के साथ साथ भौंक भौंककर अपनी ख़ुशी का इजहार करता। जिस बच्चे के गोले लगते वो उसके निकट पहुँचकर खूब धमाचौकड़ी मचाता। वह भी हमारे बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहा था और फिर न जाने कैसे अत्यधिक उत्साह में या उसे पूरी तरह उसे अपने खेल में शामिल करने के लिए हम लोग उसके ऊपर भी बर्फ के गोले मारने लगे। वह भी कभी उनसे बचता और कभी उनका शिकार हो जाता। शिकार होकर हमारी तरह ही खुश दिखाई देता। हम भी खुश हो जाते।

उस वक्त तो उसे कुछ नहीं हुआ लेकिन अब मुझे इस बात की स्मृति है कि उसकी खाल कुछ देर बाद जल सी गयी थी। बर्फ जहाँ रह गयी थी उधर से उसके बाल झड़ से गए थे। बर्फ से ऐसा होता देख हम डर गए थे। और डर के मारे उसे घर लेकर आ गए थे। एक डर ये भी था कि मम्मी पापा हमारी इस हरकत को देखेंगे तो डाँट तो लगेगी ही साथ में पिटाई होने का भी अंदेशा था। वह हमारे परिवार के सदस्य जो था जिसे हमारी बेवकूफी के कारण यह सब सहना पड़ा था। मुझे बस इतना याद है कि उस दिन हमें डाँट पड़ी थी लेकिन उसके बाद उसके बाद हम फिर कभी अगर अपने कुत्ते को बर्फ में खेलने ले गए तो हमने यह सुनिश्चित किया कि कुत्ते पर कोई बर्फ न डाले।
घर से दिखते हिमाच्छादित खेत 

बर्फ गिरने की दूसरी स्मृति तबकि है जब हम किराये के घर से अपने घर आ गए थे। उस वक्त हमारी सर्दियों की छुट्टियाँ चल रही थी और हम ठंड से अंदर दुबके हुए थे कि अचानक से बाहर शोर होने लगा। अचानक हुए शोर के कारण मन में उपजे कोतुहल कोशांत करने के लिए जब  हम लोग घर से बाहर आये तो रुई के फाँकों सी गिरती बर्फ के दर्शन हुए। अपनी छोटी छोटी हथेलियो से हमने दस्ताने उतार दिए थे और अब उन हथेलियों में नरम बर्फ को गिरते देख रहे थे। वह बर्फ इतनी मुलायम थी कि बुढ़िया के बाल जैसे जबान में जाकर घुल जाते हैं वैसे वह बर्फ हाथ में लग कर पिघल सी जाती थी। यकीन मानिए न जाने कितनी देर तक हम उस बर्फ में खेलते रहे। जब थक कर अंदर आये तो चाय की चुस्कियों और नमकीन पराठों से हमने अपनी खोयी हुई ऊर्जा को वापस पाया था।



बर्फ देखने की तीसरी याद तब कि है जब हम लोग दसवीं के प्री बोर्ड का पेपर दे रहे थे। मुझे याद है वह आखिरी पेपर था
 
पौड़ी का रामलीला मैदान 
जिसमें बच्चे अपने अपने उत्तर लिखने में मशगूल थे। ऐसे में जब परीक्षाग्रह में बर्फ  बर्फ की फुसफुसाहट सुनाई दी तो सभी का खिड़की से बाहर झाँकना लाजमी था।

और हुआ भी यही। सभी बच्चे पेपर छोड़ बाहर गिरती बर्फ को देखने लगे। कुछ देर तक हम लोग भूल ही गए कि परीक्षा चल रही है। ऐसे में इंविजिलेटर सर ने जब याद दिलाया और पेपर पूरा करने की याद दिलाई तो सभी मन मारकर पेपर लिखने में मशरूफ हो गए। सबका पता नहीं लेकिन मैं तो यही दुआ कर रहा था कि यह बर्फ   गिरनी बंद न हो। वैसे मुझे लगता है ज्यादातर लोग यही दुआ कर  रहे होंगे।

 हमसे जितना जल्दी हो सकता था हमने पेपर निपटाए थे और फिर बाहर जाकर गिरती बर्फ में खूब मस्ती की थी। जब मैं पौड़ी में था तो हम लोगो का यह नियम होता था कि आखिरी के पेपर के दिन हम लोग स्कूल से घर तक पैदल ही जाते थे। इसी नियम का हमने इस बार भी पालन किया और सड़क में बर्फ के साथ खूब मस्ती करते हुए घर आये। वो अलग बात है कि जब हम लोग घर पहुँचे तो ठंड से हालत खराब हो गयी थी।


पेपर खत्म होने के बाद हम पैदल ही घर तक गए थे जो कि स्कूल से तीन चार किलोमीटर दूर था और हमने काफी मज़े किये थे। बर्फ किसी पेपर के आखिरी दिन प्रकृति के किसी उपहार की भाँती हमारे जीवन में आया था जिसने पेपर के कारण होने वाले तनाव से सभी को राहत दिला दी थी।

इस बार घर से ये तस्वीरें आईं तो अचानक मन में छुपी हुई पुरानी यादें भी ताज़ा हो गयी। कई ऐसे लोगों के चेहरे भी मन में उभर आये जिनसे मिले हुए न जाने कितना अरसा बीत गया है।

अब बैठकर यही सोच रहा हूँ कि यह बर्फ हमे इतना क्यों लुभाती है? चाहे बच्चे हों या यस्क गिरती बर्फ देखकर शायद ही कोई होगा जिसके चेहरे पर मुस्कान न उभर आये।

क्या आपके साथ भी ऐसा होता है? आपको भी बर्फ इतनी लुभावनी लगती है?





नोट: ऊपर दिए सभी चित्र माँ ने कुछ दिनों पहले व्हाट्सप्प में भेजे थे।

© विकास नैनवाल 'अंजान'

4 टिप्‍पणियां:

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