शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

मालदेवता पिकनिक स्पॉट - एक छोटी सी घुमक्क्ड़ी

19 जनवरी 2020,रविवार

मालदेवता - देहरादून 

ई बार मुझे लगता है कि किसी शहर में घूमने के लिए आपको उस शहर से बाहर जाना पड़ता है। जब तक आप उस शहर में होते हैं घर की मुर्गी दाल बराबर के तर्ज पर उस शहर में मौजूद चीजों को देख नहीं पाते हैं। फिर कई वर्षों बाद जब आप उस शहर में लौटते हैं तो आप उस शहर को अलग नजरिये से देखते भी हैं और शहर में घूमते भी हैं।

यह बात इस बार फिर मैंने इस बार देहरादून जाने पर महसूस करी। देहरादून में मैंने इंजीनियरिंग करते हुए चार साल बिताये लेकिन तब मैं यहाँ मौजूद दर्शनीय स्थलों में से कुछ को ही देख पाया था। ज्यादातर सप्ताहंत ऐसे ही व्यर्थ हो जाते थे। निकलना होता भी था तो बाहर ही निकलना होता था। काफी चीजें ऐसी थीं जो कि देख न सका था और कइयों के विषय में तो पता भी नहीं लगा था। 

मालदेवता भी ऐसी ही एक जगह थी जो कि स्थानीय लोगों में काफी प्रसिद्ध है लेकिन मैंने कॉलेज के दिनों में इसका नाम भी नहीं सुना था। ऐसा नहीं था कि इस बार देहरादून जाने से पहले मैंने इसका नाम नहीं सुना था।  नाम सुना तो था लेकिन पहली बार नाम सुनना भी कुछ दो ढाई हफ्ते पहले ही हुआ था जब देव बाबू ने एक किस्सा सुनाया था जिसमें वो और कॉलेज के समय के उनके कुछ दोस्त कुछ ही दिनों पहले मालदेवता गए थे और उन्होंने उधर जाकर मस्ती की थी। उनका किस्सा सुनाने का अंदाज यूँ होता है कि अगर जगह में कुछ देखने लायक न भी हो तो भी आप उनके कहने के अंदाज से जगह देखने के लिए लालायित हो जाते हैं। उस किस्से को सुनते वक्त मेरे मन में मालदेवता देखने की इच्छा का बीज पड़ तो गया था लेकिन मुझे क्या पता था कि उस बीज से पौधा इतनी जल्दी फूट पड़ेगा। यह इच्छा मैंने मन के किसी कोने में दबा दी थी।यहाँ तक की मालदेवता और उधर जाने की इच्छा के विषय में लगभग भूल सा गया था।

शनिवार की सुबह जब मैं देहरादून पहुँचा तो कुछ तो रात के सफर के कारण और कुछ बाहर के मौसम के कारण घर से बाहर ही नहीं निकल पाया। देहरादून में वैसे भी कुछ दिनों से बारिश हो रही थी। धूप निकल नहीं रही थी तो बाहर निकलने का कोई तुक मुझे दिखाई नहीं दिया। घर में रहकर हमने फ़िल्म देखी और बाहर जाकर कुछ करने के नाम पर हमने केक्ल डिनर ही किया। 

रविवार को जब हम उठे तो बातों बातों में मालदेवता का जिक्र इस कारण आया कि मेरी मँगेतर की रूममेट(जो कि एक तरह से मेरी भाँजी ही लगती हैं) को एक गाने की शूटिंग के लिए उधर की तरफ जाना था। नाम आया तो पता लगा कि वह जगह बहुत खूबसूरत है और फिर बात से बात निकलती रही और आखिरकार उधर जाने का प्रोग्राम भी बन गया।

उस वक्त तक भी देव बाबू की मालदेवता वाली बात जहन में नहीं आई थी तो इस कारण मेरे मन में मालदेवता को लेकर एक तरह की धारणा पनप गयी थी। मैंने मन ही मन में सोच लिया था कि वहाँ कोई मालदेवता का मंदिर किसी चोटी पर होगा और उसके इर्द गिर्द ही वह रमणीय स्थल होगा जिसके विषय में मुझे बताया जा रहा था। अपने संकोची स्वभाव के कारण भी मैंने ज्यादा प्रश्न नहीं किया। वैसे भी जा तो रहे ही थे तो देख ही लेते। वैसे भी जगहों पर बिना किसी योजना के जाने मुझे अच्छा लगता है। इससे जब आप उधर पहुँचते हो तो आपको उधर जाकर एक आश्चर्य सा होता है। जब हम ज्यादा शोध करके कहीं जाते हैं तो उस जगह के विषय में शोध के दौरान जानी गयी बातों के चलते एक तरह की धारणा मन में बन जाती है। ऐसे में अगर वह जगह वैसे न निकले तो थोड़ा मायूस सा मन हो जाता है। मैंने भी माल देवता के प्रति मन में जो ख्याल आया था उसे झटक दिया और इस सफर की राह देखने लगा। 

सुबह नाश्ता पानी करने में हमे ग्यारह तो बज ही गये थे। आसमान साफ था और सूरज महाराज मंद -मंद मुस्काते से प्रतीत हो रहे थे। यानि धूप तो थी लेकिन वातावरण में ठंडक भी थी। मालदेवता जाया कैसे जाए इसका मुझे तो अंदाजा नहीं था। सुजाता( मेरी मंगेतर जिनके साथ घूमने की योजना बनी थी) ने यह भी बता दिया था कि मालदेवता को जाने वाली सड़क देहरादून की वो धमनियाँ थी जहाँ विक्रम नाम की कोशिका यातायात रूपी ऑक्सीजन सप्लाई नहीं करती थी। यह मेरे लिए अचरज की बात ही थी क्योंकि मैं अब तक यही समझता था कि ये विक्रम देहरादून की हर सड़क नापते थे। ऐसे में हमारे पास यही विकल्प था कि हम लोग या तो एक ऑटो रिक्शा करें या बस वगेरह से जाएँ। 

हम लोग कैसे जाएं इसी बात प्र विचार चल रहा था? बस का आईडिया सुजाता को भी नहीं था। यही सोचते हुए हम आगे बढ़ रहे थे कि तभी मेरे मन में देव बाबू का ख्याल आया और  मैंने उन्हें फोन लगा दिया।  मेरा खयाल था कि चूँकि वो देहरादून के ही हैं तो उन्हें मालदेवता तक जाने वाले सार्वजनिक यातायातों का पता होगा। परन्तु उस वक्त उन्होंने कॉल नहीं उठाया। 


मैंने कॉल काट कर जेब में डाला ही था कि एक खाली ऑटो हमे आता दिख गया। उनसे बातचीत हुई तो उन्होंने 170 रूपये में छोड़ना निर्धारित किया। मुझे दाम सही लगा और इस तरह हम ऑटो में बैठ गये। अब हम मालदेवता के लिए निकल चुके थे।

हम राजीव नगर पुल से मालदेवता की तरफ बढ़ रहे थे।  मालदेवता देहरादून के रायपुर से होते हुए कुछ दूर के इलाके में पड़ता है। वहीं से एक रोड़ सहस्त्रधारा के लिए निकलती है और एक मालदेवता के लिए।  मालदेवता राजीव नगर के पुल से लगभग चौदह पन्द्रह किलोमीटर दूर था। हमें उधर से मालदेवता में मौजूद पुराने पुल के अवशेषों के पास पहुँचने के लिए लगभग चालीस मिनट लगे। यह चालीस मिनट मनोरम परन्तु सुनसान इलाके से गुजरे, जहाँ दोनों तरफ जंगल और विराना था।आस पास का दृश्य इतना अच्छा था कि मेरा फोटो लेने का मन करता लेकिन तब तक ऑटो आगे निकल जाता। अगर अपने व्यक्तिगत वाहन से हम आये होते तो शायद रुक रुक फोटो खींचते हुए ही हम आगे बढ़ते।  ऑटो में बैठकर हम केवल उन प्राकृतिक छटाओं को देख ही सकते थे। उनकी खूबसूरती को अपने मन में अंकित ही कर सकते थे। 


मौसम सुहावना हो रहा था। और साथी हसीन था तो घूमना और अच्छा लग रहा था। हमारी बातचीत भी चल रही थी। हँसी मज़ाक हो रहा था। बीच में देव बाबू का एक बार फिर कॉल आया। उन्होंने बताया वो और कुछ दोस्त लोग शौपिंग करने के लिए बाज़ार गये थे इस कारण उस वक्त उन्होंने मेरा कॉल नहीं उठाया था। मैंने उनसे कॉल का कारण बताया तो उन्होंने बस के विषय में बताया लेकिन अपने सफर के दौरान मैंने कोई सार्वजनिक वाहन इधर देखा नहीं था। हाल चाल पूछे और उन्हें बताया कि मैं ऑटो में हूँ।फिर मैंने उनसे वादा किया कि अगर वक्त मिलेगा तो मिलेंगे और फिर फोन रख दिया।मैं वापस सफर में ध्यान देने लगा।

मैंने सुजाता को बस वाली बात बताई और यह भी कि इधर तो सुनसान है तो उन्होंने भी कहा कि अक्सर गर्मियों में इधर काफी लोग आते हैं। तो जो सड़क अभी वीरान दिख रही है वो गाड़ियों से पटी पड़ी रहती है। मैंने उन्हें मालदेवता नाम के पीछे का कारण पूछा तो उन्हें भी इसका नहीं पता था। इस नाम के पीछे क्या कहानी है? यह प्रश्न मेरे मन में एक तरह का कौतुहल पैदा कर रहा था। जगह के विषय में उन्होंने केवल इतना ही कहा कि यह नदी के किनारे मौजूद एक जगह है जहाँ अक्सर प्रेमी युगल शहर की भीड़ भड़ाके से दूर प्रेम के कुछ पल गुजारने के लिए आते हैं। एक तरह का यह पिकनिक स्पॉट है ये जहाँ लोग आकर वक्त बिताना पसंद करते हैं। 

सुजाता और मैं दोनों ही इस जगह पहले नहीं आये थे इसलिए बीच में हम जगह को लेकर थोड़े शंकित हुए लेकिन उधर मौजूद स्थानीय लोगों से पूछने पर हमे उस जगह का पता चल गया था जहाँ लोग पिकनिक के लिए पहुँचते हैं। ऑटो वाले भाई को भी शायद इस जगह का अंदाजा नहीं था इसलिए सफर के आखिरी चरण में पुराने पुल के अवशेष तक जाने के लिए उसे कच्ची सड़क पर चढना पड़ा तो वह किराया कम बताने की बात करने लगा। हमने उन्हें दिलासा दिया कि हम उन्हें 200 रूपये ही देंगे। 

हम पुराने पुल के अवशेष तक पहुँचे। ऑटो का किराया दिया गया। इलाका क्योंकि सुनसान था और आस पास पब्लिक ट्रांसपोर्ट दिखाई नहीं दे रह था तो उसी ऑटो वालेभाई  से सुजाता ने नम्बर ले लिया ताकि बाद में वापसी में उन्हें कॉल कर दें और वो हमें लेने आ जाएँ। जाते जाते बैठने के लिए सुजाता ने उनसे एक अखबार भी ले लिए थे ताकि नदी के किनारे मौजूद पत्थरों में हम लोग आसानी से बैठ सकें।  सड़क के किनारे के छोटा सा मन्दिर था जिसके सामने ही पुल का एक हिस्सा था। पुल का दूसरा हिस्सा सामने पहाड़ में दिखाई दे रहा था जिसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था जैसे कोई आशिक अपने प्रेमी को तक रहा हो। वो अपने प्रेमी से मिलना चाहता हो लेकिन अपने बीच की दूरी को पाटने में असमर्थ हो। कुछ देर तक मैं उन दोनों पुलों के सिरों को देखता रहा। पुल के ये सिरे मुझे बिछड़े प्रेमियों से क्यों लग रहे थे इसका मुझे अंदाजा नहीं था? मैंने इनके फोटो निकालने शुरू किये। एक फोटो मैंने इस तरह से भी निकाला जिसमें पुल के एक अवशेष से दूसरे को देखा जा सके। यह फोटो इनके बिछोह को शायद दर्शा सकता था।  कुछ फोटो लेकर हम लोग आगे बढ़ने लगे। 

अब हमे इस सड़क से नीचे नदी के तट की तरफ उतरना था। 

सड़क के किनारे मौजूद मंदिर 

पहाड़ी के दूसरे तरफ मौजूद पुल के अवशेष 

सड़क के सामने से दिखते पुल के दो हिस्से....मिलने की राह तकते हुए 
सड़क से नीचे जाने के लिए एक रास्ता जाता था जहाँ से हम नदी के किनारे पहुँच सकते थे। यहाँ पर सबसे पहले हमने देखा कि कुछ गाड़ियाँ कार और स्कूटी पार्क की हुई थी। साथ में कुछ लोग बड़ी बड़ी चटाई साफ कर रहे थे। सुजाता ने बताया कि चूँकि इधर पानी आसानी से मिल जाता है तो टेंट हाउस वाले लोग अपनी बड़ी बड़ी चटाई धोने सुखाने इधर ही आते थे। वहीं पर एक छोर पर हमे कुछ लोग कपड़े धोते हुए भी दिखे थे जो कि शायद स्थानीय थे।

यह सांग नदी थी जिसके किनारे हम मौजूद थे। जब मैं उधर था तब मुझे नदी का नाम नहीं पता था लेकिन गुरुग्राम आकर जब मैंने मालदेवता के विषय में जानकारी हासिल करनी चाही तो इस नदी का नाम आया। सांग नाम सुनकर पहले तो लगा जैसे चीन की कोई नदी हो। न जाने इसका नाम सांग कैसे पड़ा होगा? वह कहानी भी रोचक होगी।

फिलहाल नदी में पानी कम था लेकिन फिर भी उधर काफी लोग मौजूद थे। नदी में एक तरफ से दूसरी तरफ जाने के लिए छोटे छोटे पुल बनाये गए थे।यह पुल लकड़ी के फट्टों या बल्लियों को जोड़कर बनाये गए थे।पानी ज्यादा नहीं तो आसानी से इनके ऊपर चलकर नदी पार की जा सकती थी। बारिश के वक्त शायद ही ऐसा करना मुनासिब हो। कभी बरसात में इधर आऊंगा तो इसका अनुभव लूँगा। पानी के स्तर कम होने के कारण पूरे इलाके में ऐसी काफी जगहें बन गयी थी कि जो छोटे छोटे तालाब सरीखी थी। चारो तरफ जमीन या घास और बीच में तलाबनुमा पानी।  ये जगहें बहुत खूबसूरत लग रही थी।

अभी फिलहाल मौसम में ठंडक जरूर थी लेकिन सूरज चमक ही रहा था। इसलिए सूरज की चमक गुनगुनी सी गर्मी पैदा कर रही थीं जो कि एक अलग आनंद दे रही थी। ठंड में गुनगुनी धूप का आनंद कुछ अलग ही होता है। इसके अलावा बारिश होने के आसार नहीं थे तो सब बढ़िया ही था।

मालदेवता में  काफी लोग मौजूद थे। जैसा की सुजाता ने बताया था कि उधर प्रेमी युगल ज्यादा आते थे तो कुछ प्रेमी युगल उधर मौजूद थे। लेकिन उन युगलों के अलावा कई परिवार वाले अपने बच्चों के साथ उधर मौजूद थे। कई लोग चटाई लेकर बैठे हुए थे। कल कल बहती नदी के किनारे उधर पिकनिक मना रहे थे और लंच कर रहे थे। कई लोग अपने दोस्तों के साथ मौजूद थे जो एक जगह पर चूल्हा जलाकर पतीलों में खाना पका रहे थे। कई लोग उधर शराब भी पी भी रहे थे। कई लोग सेल्फियाँ खींच रहे थे। एक आध स्पीकर पर गीत बजाकर मौसम का आनंद ले रहे थे।

 यानि की सभी लोग उधर अपने अपने तरह से उस वक्त का लुत्फ़ लेने उधर आये थे। इस पूरे इलाके में मुझे एक ही दुकान दिखाई दे रही थी जिसके आस पास भी लोग मौजूद थे जो कि शायद दूकान वाले भाई से खाने की चीजें बनवा रहे थे। हम तो नाश्ता करके ही आये थे तो पहले हमने इधर घूमने की सोची। कुछ पुल पार करके हमने आस पास के चक्कर मारे।उधर कई मजदूर लोग भी दिखे जो कि रेती या बजरी उधर से निकाल रहे थे। ये काम कानूनन हो रहा था या गैर कानूनी तरीके से इसका मुझे अंदाजा नहीं है। सुजाता ने कुछ देर उनसे बात की। उनका इस तरह किसी से भी बात कर पाना मुझे भाता है। मैं संकोची स्वभाव का हूँ तो यह सब मुझसे नहीं होता है। मैं उन्हें बात करते हुए ही देख रहा था। फिर उधर से आगे बढ़ते हुए हम नदी के एक कोने में पहुंचे जहाँ पर काफी बड़ी बड़ी चट्टाने थी। उधर कुछ देर बैठकर हम दोनों ने बातें की। थोड़ी देर बात करके हम उठे तो सुजाता को फोटो खिंचवाने का ख्याल आया। नदी के बीच में बड़ा सा पत्थर था जिसमें वो जाकर बैठ गयीं और उधर मैंने उनकी कुछ तस्वीरें खींची। कुछ से वो संतुष्ट हुईं और कुछ तस्वीरों को उन्होंने डिलीट कर दिया।


मालदेवता में मौजूद पत्थर


कल कल बहती सोंग नदी 

पानी से चमकते पत्थर जिन्होंने मेरा ध्यान आकर्षित किया था
पत्थरों के बीच में चलता फोटो सेशन

पानी में मस्ती!! मुझे भिगाने की कोशिश करती सुजाता जी

वापसी करने से पहले एक और फोटो हो जाए
फोटो सेशन के बाद हमने इधर उधर घूमने का विचार बनाया। एक जगह पर हमें एक कैम्प भी दिखा। कैम्प खाली था लेकिन एडवेंचर एक्टिविटीज के लिए बनाई गयी चीजें उधर दिखाई दे रही थी। रस्सियों से झूले बनाये गए थे। टेंट भी उधर मौजूद थे। लेकिन लोग उधर मौजूद नहीं थे।  वहाँ से हम एक और दिशा में चले गए जहां छोटी छोटी झाड़ियाँ थी। उन झाड़ियों के पीछे ही एक जगह थी जो कि तालाबनुमा था। वो जगह मैंने तब भी देखी थी जब पुल पार करके हम इस तरफ आये थे। अब छोटे छोटे बल्लियों से बने पुल पार करके हम दूसरी तरफ गए। वह तालाब अब खाली था। उधर जो समूह था वो शायद जा चुका था। ऐसे में हम उधर की तरफ बढ़े। कुछ देर हमने उस तलाब से थोड़ी दूर बैठकर आराम किया और फिर जब तालाब के आस पास कोई नहीं दिखा तो तालाब के किनारे बैठकर वक्त बिताया। उधर से सामने पहाड़ी दिखाई दे रही थी जिसमें एक मंदिर मौजूद था। उसे देखकर मुझे लगा शायद वही माल देवता मंदिर है लेकिन सुजाता के ख्याल से ऐसा कुछ नहीं था। वह गांव का आम मंदिर था। ऐसे ही बैठे हम इधर उधर की बातें कर रहे थे। बातें करते करते हमे पता ही नहीं लगा कब चार बज गए। चार बजे तो मुझे चाय की तलब महसूस हुई। चाय पीने हमें फिर उस तरफ जाना था। हम उठे,कुछ तस्वीरें ली और फिर दुकान की तरफ बढ़ने लगे।


तालाबनुमा जगह जहाँ आकर हमने आराम किया।

तालाब के उस छोर पर पिकनिक मनाता एक परिवार

वक्त काटने के लिए पत्थर के ऊपर पत्थर ही रखा जाए....बॉल होती तो पिट्ठू भी खेल लेता
अब वापसी का मन भी बना लिया था तो हमने सोचा पहले ऑटो वाले भाई को फोन कर दें। सुजाता ने ही उन्हें कॉल किया। पहले तो उन्होंने यह कोशिश की कि उन्हें न आना पड़े। उन्होंने कहा भी कि जिस कच्ची सड़क पर उन्होंने हमें छोड़ा था उधर से नीचे उतर कर हम मुख्य सड़क पर आते हैं तो हमे वापसी का वाहन मिल सकता था। मैं होता तो शायद मान भी जाता लेकिन सुजाता ने एक न सुनी और उन्होंने पौने घण्टे का समय लेकर आने की बात की। इतना समय चाय पीने के लिए काफी था। अब वापसी का बंदोबस्त हो गया था तो हम लोग चाय की दुकान की तरफ बढ़ गए।

हमें फिर से नदी पार करनी थी। इस बार नदी पार करते हुए हमें एक समूह मिला जिसमें मौजूद महिलाएं अपने बच्चों के साथ पानी में खेल रही थीं। सुजाता उन्हें देखकर हैरान जरूर हुई लेकिन जब उन महिलाओं ने कहा उन्हें ठंड नहीं लग रही है तो मान भी गयी। वैसे मुझे पता था कि अगर उस वक्त वो भी पानी में खेलने लगती तो उन्हें भी ठंड नहीं लगती। मस्ती करने के दौरान ठंड महसूस नहीं होती है। वह तो बाद में लगती है। कुछ दिनों पहले जब वो मसूरी बर्फ गिरने के दौरान गए थे उन्होंने यह बात खुद ही मुझे बताई थी। बर्फ में मस्ती तो कर दी थी लेकिन बाद में ठंड ने हालत भी खराब कर दी थी। मेरी बात पर वो भी हँसने लगी थी।शायद उन्हें भी वह बात याद आ गयी थी।

हम लोग दुकान में पहुँचे तो उधर एक व्यक्ति चावल का कुक्कर लेकर दुकानदार के पास आये थे। और एक और व्यक्ति दुकानदार को मुर्गा बनाने के लिए कह रहा था। मैंने भी एक चाय का आर्डर दिया। उधर कॉफी का बंदोबस्त नहीं था और चूँकि सुजाता चाय नहीं पीती हैं उन्होंने मूँगदाल नमकीन से ही काम चलाया। चाय पीकर तलब भी शांत हो गयी थी तो मैंने चाय के पैसे अदा किए और हम वापस सड़क की तरफ बढ़ गए। इस बार हमने दूसरे तरफ से नदी पार की। यह बात इधर ठीक लगी। जगह जगह पर ऐसे अस्थाई पुल बनाये गए थे। आप कहीं से भी इन पुलों को पार कर इधर से उधर जा सकते थे।

हम सड़क की तरफ बढ़ने लगे थे। चार बजते ही सूरज थोड़ा ढलने लगा था। मौसम में ठंड बढ़ने लगी थी। ऑटो वाले भाई का भी फोन आ गया था। वो भी ऊपर सड़क में पहुँच चुके थे। बाते करते करते हम बढ़ ही रहे थे। हमारी नज़र ऊपर सड़क पर थी। मैं यह सुनिश्चित कर रहा था कि ऊपर ऑटो आया है या नहीं कि अचानक से पीछे की तरफ से तेज आवाज हुई। लगा कोई गाड़ी गिर गई है। उस आवाज के कारण सुजाता चीखी और मैंने मुड़कर देखा तो पता लगा कि एक स्कूटर वाले भाई गिरने को हो गए थे। किसी तरह उन्होंने स्कूटर सम्भाल दिया था। मैं उन्हें उठाने गया तो उन्होंने कहा कि वो ठीक हैं और गिरे नहीं हैं। उनका एक बोरा गिर गया था जिसे उठाकर उन्हें दिया। तब भी वो यही दोहराते रहे कि वो गिरे नहीं हैं। उनके नजदीक पहुँचकर मैं इतना तो जान गया था भले ही वो गिरे न हों लेकिन वो पिये जरूर थे। उसके बाद उनके स्कूटर संभालने तक और वहाँ से स्कूटर लेकर अपने गंतव्य की तरफ थोड़ा दूर बढ़ने तक, जो कि हमारे जाने की दिशा से उल्टी दिशा में था, हम उन्हें जाते हुए देखते रहे। जब वो चले गए तो हम सड़क के तरफ बढ़ने लगे। वापस जाते हुए मैंने उन्हें अपनी मम्मी से जुड़ी कहानी सुनाई। सुजाता के चीखने पर मुझे मम्मी की याद आ गयी थी क्योंकि वो भी एक बार इसी तरह चिल्लाई थी। वो कहानी तो मैं इधर नहीं कहूँगा क्योंकि फिर पहले से बड़ी पोस्ट और बड़ी हो जाएगी लेकिन इतना जरूर कहूंगा वो कहानी काफी हास्यपूर्ण थी। मैं तो मम्मी को आज भी उस कहानी की याद करके खूब छेड़ता हूँ और उनकी एक्टिंग करता हूँ। सुजाता के सामनेभी मैंने वही एक्टिंग की जिसे देख वो भी हँसने लगे थे। ऐसे ही हँसते हुए कुछ ही देर में हम सड़क में थे जहाँ ऑटो हमारा इंतजार कर रहा था।

यह छोटी सी घुम्मकड़ी सम्पात होने को थी। वापसी का सफर उधर की बातें करते हुए ही बीता। मेरे मन में ये प्रश्न अभी भी कीड़े की तरह कुलबुला रहा था कि उस जगह को मालदेवता क्यों कहते हैं? अगर मालदेवता का कोई मंदिर था तो इसके नाम के पीछे क्या कहानी थी? अगर कोई मंदिर था तो वो किधर था?

इन प्रश्नों के उत्तर मुझे भले इस बार नहीं मिले थे लेकिन फिर भी काफी कुछ मिल गया था। यह सुजाता के साथ की गई मेरी पहली घुमक्कड़ी थी। यह उन अनगिनत यात्राओं को साथ करने की तरफ उठाया गया हमारा पहला कदम था। हर पहली चीज बहुत विशेष होती हैं। यह यात्रा भी मेरे लिए बहुत विशेष थी। दिल के करीब थी। प्रश्नों का क्या है? उनके उत्तर तो मालदेवता की अगली घुम्मकड़ी में हम खोज ही लेंगे।

लौटकर हमने एक रेस्टोरेंट में लेट लंच क़िया। मुझे दिल्ली के लिए निकलना था तो मेरे लिए इसी ने डिनर का काम भी किया। फिर हम कमरे की तरफ बढ़ गए।सड़क के किनारे मौजूद एक म्यूरल ने मेरा ध्यान आकृष्ट  किया। सड़क के किनारे दीवारों पर उभरी ऐसी आकृतियाँ मैंने पहली दफा परी टिब्बा की ट्रेक के दौरान मसूरी में देखी थी। उधर गढ़वाल की परम्परा दर्शाते हुए आकृतियाँ बनाई गयी थी। ऐसी आकृति इधर भी थी लेकिन लेकिन जिससे हिस्से में मेरा ध्यान आकर्षित किया वो तीन लोगों की मूर्ती थी।


इस म्यूरल को देखकर मेरे मन में दो प्रश्न आये? पहला ये कौन हैं? दो को तो मैं पहचान गया था। बाएं वाले तो शायद वीर चन्द्र गढ़वाली जो हैं और मध्य में सुमित्रानन्दन पंत जी हैं। तीसरे महानुभव का को मैं पहचान न सका? अगर आपको पता हो तो बताइयेगा?

दूसरा प्रश्न मेरे मन में यह आया कि किस कलाकार ने इन तस्वीरों को म्यूरल के लिए चुना था। अभी ऐसा लग रहा है जैसे गढ़वाली जी और दूसरे व्यक्ति एक दूसरे से नाराज हों। और पंत जी देखने वाले की तरह यह सोच रहे हों कि आखिर ये दोनों नाराज क्यों हैं?

यह म्यूरल इस कारण मुझे तो थोड़ा फनी लगा था। वैसे बचपन से मुझे बेतुकी चीजों में हँसने की आदत है जिस कारण मुझे काफी परेशानियों का भी सामना करना पड़ा है तो ऐसा भी हो सकता है कि केवल मेरे लिए ही यह चीज मज़ाकिया हो और आपको ऐसा कुछ न लग रहा हो? आप बताइयेगा। आपको क्या लग रहा है?

बीच में सुमित्रा नन्दन पन्त हैं और बायीं साइड में वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली हैं.. तीसरे व्यक्ति कौन हैं ये मैं नहीं पहचान पा रहा हूँ?? क्या आपको पता है?

अब इजाजत दीजिये।

अगर आप सोच रहे हैं कि इस घुम्मकड़ी में कोई किताब मेरे पास क्यों नहीं थी तो उसका उत्तर यह है कि किताब मैं ले तो जरूर गया था लेकिन रूम में छोड़कर घूमने आया था। डीन कूँट्ज़ की किताब लाइफ एक्सपेक्टेंसी का एक अध्याय मैं घूमने निकलने से पहले पढ़ा था और जाकर भी एक अध्याय मैंने पढ़ा था। किताब अभी भी चल रही है।

                                                                            समाप्त

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उत्तराखंड



#फक्कड़_घुमक्कड़ #पढ़ते_रहिये_घूमते_रहिये

© विकास नैनवाल 'अंजान'

4 टिप्‍पणियां:

  1. सदा की तरह रोचक घुमक्कड़ी वृत्तांत । नव जीवन के शुभारंभ के लिए हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई ।

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  2. यात्रा वर्णन काफी रोचक और दिलचस्प है। आगामी किश्त और अधूरे प्रश्नों की तलाश का इंतजार रहेगा।
    धन्यवाद।

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    1. जी आभार। यह भाग तो खुद तो में पूरा है। हाँ, अगर आगे देहरादून जाकर इधर का दोबारा चक्कर लगा तो बाकि प्रश्नों के उत्तर जानने की कोशिश करूँगा और उसे साझा भी करूँगा। ब्लॉग पर आते रहियेगा।

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