बुधवार, 5 मई 2021

सज्जन और सजन - ब्रजेश शर्मा

 

सज्जन और सजन - ब्रजेश शर्मा
Image by Peggy und Marco Lachmann-Anke from Pixabay

छत्तीसगढ़ के ब्रजेश शर्मा लेखक हैं। वह अजिंक्य शर्मा के नाम से अपराध और हॉरर साहित्य लिखते हैं। उनके उपन्यास किंडल पर प्रकाशित होते रहे हैं। आज दुई बात पर पढ़िए उनके द्वारा लिखा गया एक हास्य लेख। उम्मीद है जो वक्त चल रहा है उसमें यह आपके चेहरे पर एक मुस्कान लाने में कामयाब हो पायेगा।

ब्रजेश शर्मा का विस्तृत परिचय निम्न लिंक पर पढ़ा जा सकता है:
ब्रजेश शर्मा - परिचय 

उनके उपन्यास निम्न लिंक पर जाकर खरीदी जा सकते हैं:
उपन्यास - अजिंक्य शर्मा

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

वो आँखें : फिलिप के डिक की कहानी The eyes have it का हिन्दी अनुवाद

'द आईज हेव इट' विज्ञान गल्प लेखक फिलिप के डिक की लिखी एक लघु-कथा है। यह लघु-कथा सर्व प्रथम साइंस फिक्शन स्टोरीज नामक पत्रिका में 1953 में प्रकाशित हुई थी।  

आज दुईबात में पढ़िए फिलिप के डिक की कहानी द आईज हेव इट का हिन्दी अनुवाद वो आँखें। उम्मीद है कहानी और अनुवाद आपको पसंद आएगा।

मूल कहानी आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सक  ते हैं:
द आईज हेव इट

शनिवार, 20 मार्च 2021

मैं हिमालय बोल रहा हूँ | हिन्दी कविता | अटल पैन्यूली

मैं हिमालय बोल रहा हूँ | हिन्दी कविता | अटल पैन्यूली
Image by David Mark from Pixabay

अटल पैन्यूली युवा कवि और कथाकार हैं। वह फिलहाल बी एड की पढ़ाई कर रहे हैं। दुई बात में आज पढ़िए अटल पैन्यूली की कविता 'मैं हिमालय बोल रहा हूँ'। 

बुधवार, 3 मार्च 2021

प्रेम? | हिन्दी कविता

Image by Dariusz Sankowski from Pixabay



प्रेम 
कभी किया था 
तुमने मुझसे? 
या मैंने ही तुमसे ?

या फिर था  

 प्रेम 
 तुम्हें मेरे होने के ख्याल से 
और मुझे तुम्हारे होने के ख्याल से 

ख्याल
जो असल में थे खाँचे
बनाये थे, 
जो हमने एक दूसरे के लिए
अपने अपने दिलो में 

और अब 
बैठाते रहते हैं एक दूसरे को
उन खांचों में हम 
फिर 
जब पाते हैं अलग
एक दूसरे को उन  खाँचे से
तो कहते हैं
बहुत बदल गये हो तुम
वो था कोई 
जिसे किया था प्रेम
कभी हमने
और 
अब खो गया है वो 

लेकिन सच
बताओ?
क्या सचमुच खो गये हैं हम ?
क्या सचमुच बदल गये हैं हम?
या फिर 
अब ही जान पाएं  हैं
असल में 
एक दूसरे को 

-विकास नैनवाल 'अंजान'

©विकास नैनवाल 'अंजान'

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

बुढ़िया के बाल | हिन्दी कविता | बाल कविता

बुढ़िया के बाल | हिन्दी कविता | विकास नैनवाल 'अंजान'
Image by Amol Sharma from Pixabay 

नोट:  मुझे बुढ़िया के बाल हमेशा से ही पसंद रहे हैं। बचपन में भी यह पसंद आते थे और आज भी बहुत पसंद आते हैं। मुझे याद है जब बचपन में घंटी बजाते हुए भैया बुढ़िया के बाल बेचने आते थे तो मैं काफी उत्साहित हो जाता था। इसी उत्साह को मैंने इस रचना के माध्यम से दर्शाने की कोशिश की है। 

रविवार, 24 जनवरी 2021

फोटो निबन्ध: घुमक्कड़ी की यारी, मेरी यह सवारी

राकेश शर्मा

राकेश शर्मा घुमक्कड़ हैं और इस घुमक्कड़ी में उनकी साथिन उनकी मोटर बाइक रहती हैं।  न जाने कितने किलोमीटर का उनका यह साथ रहा है। मुझे भी यदा कदा उनकी इस गाड़ी पर सवारी करने का मौका मिलता रहता है। 

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