शनिवार, 24 अक्तूबर 2020

फोटो निबन्ध: एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे




तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे 
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे 

क़ैसर-उल जाफ़री का यह शेर राकेश शर्मा पर एकदम फिट बैठता है। अपनी घुमक्कड़ियों के दौरान राकेश कई ऐसी खूबसूरत शामें अपने कैमरे के माध्यम से चुरा कर ले आते हैं कि देखने वाले के मुँह से वाह अपने आप निकल पड़ती है।

राकेश भाई को मैं जितना जानता हूँ उसके हिसाब से कह सकता हूँ कि उन्हें घुम्म्कड़ी में जिस चीज का शौक सबसे ज्यादा है वो उगते सूरज और ढलते सूरज अपने कैमरे में कैद करना रहा है।  उगते सूरज को अपने कैमरे में कैद करने के लिए वह सुबह सुबह उठ जाते हैं और ढलते हुए सूरज के कारण जो आसमान में खूबसूरती विद्यमान हो जाती है उसे कैद करने के लिए घुमक्कड़ी को विराम देकर इन मनभावन नज़रों को कैद करने लगते हैं।  मैंने खुद उनके साथ कई यात्राएँ की है (कल्सुबाई, कौसानी, चित्तोड़गढ़-कुम्भलगढ़, गिरनार-सोमनाथ-गिर, झाँसी-ओरछा, जैसलमेर-जोधपुर, माउंट आबू इत्यादि) तो इन सब क्रियाकलापों का प्रत्यक्ष दर्शी रहा हूँ। कई बार तो जल्दी न उठने के लिए दिए जा रहे तानों को भी भोगा है क्योंकि वह सुबह उठकर फोटो खींच आते हैं और मैं तब तक बिस्तर पर लेटा ही रहता हूँ।

आज का फोटो-निबन्ध उनके घुमक्कड़ी के इसी पहलू को उजागर करता है। आज 'दुई-बात' आपके समक्ष घुमक्कड़ी के दौरान देखे गये शामों के ऐसे नज़ारे लेकर आ रहा है जिसने राकेश भाई को ठिठकने पर मजबूर कर दिया था और वो उन्हें चुराकर अपने साथ ले आये। 

राकेश भाई का पूर्ण परिचय आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
राकेश शर्मा

उनके सोशल मीडिया हैंडल निम्न हैं:
फेसबुक | इंस्टाग्राम | यूट्यूब

उम्मीद है उनका यह नया फोटो निबन्ध आपको पसंद आयेगा। 

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2020

आ रहे हैं फेलूदा

फेलूदा श्रृंखला के कुछ उपन्यास

कल दैनिक भास्कर में छपी एक खबर ने यकायक ही मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। यह खबर केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री डॉ हर्षवर्द्धन के एक ब्यान पर आधारित थी। संडे संवाद में उन्होंने फेलूदा के आगमन की बात की थी। 

यह मेरे लिए आश्चर्य की बात थी क्योंकि मैं भी एक फेलूदा को जानता हूँ। यह फेलूदा बांग्ला फिल्मकार और कथाकार सत्यजित राय द्वारा रचा गया सबसे मकबूल किरदार है। प्रोदोष रंजन मित्तर एक सत्ताईस अट्ठाईस साल का तेज तरार युवा है जो पेशे से जासूसी करता है।  वह अपने पेशे में टॉप पर है और इसलिए कई लोग उसके पास अपने मामले सुलझाने के लिए लाते रहते हैं। वह अक्सर अपने मामले में अपने छोटे चचेरे भाई तपेश रंजन मित्तर और लेखक दोस्त लाल मोहन गाँगुली उर्फ़ जटायू  को साथ लेकर चलता है। वह तपेश को तोपसे कहता है और वहीं चूँकि प्रोदोष का घर का नाम फेलू है तो तोपसे उसे फेलूदा यानी फेलू भाई कह कर बुलाता है। यहीं से फेलूदा नाम प्रसिद्ध भी हुआ है।

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