रविवार, 14 दिसंबर 2014

अँधेरी रात


वो गहरी अँधेरी रात थी ,
केवल मेरी तन्हाईयाँ मेरे साथ थी ,
हम बैठे हुए घूर रहे थे अपने टीवी को ,
केवल हमारी परछाई हमारे साथ थी ,
अचानक हमने सुनी कोई चीख और हमारा ध्यान भटका,
क्या ये सच्चाई थी या हमारा वहम ये ख़याल हमारे मन में खटका ,
हम ने नज़र दौड़ाई चारो और ,
न कोई नज़र आया, था सन्नाटा हर और ,
फिर अचानक हो गया अँधेरा ,
बिजली गयी थी चली और बुरा हो गया था हाल मेरा,
कुछ नहीं होगा मुझे, ये दिलाया मैंने अपने को दिलासा ,
होगी यहीं कहीं कोई टॉर्च, था मुझे इस बात का भरोसा ,
उठा मैं कुर्सी से, केवल टॉर्च थी मेरे दिमाग में ,
पानी थी टॉर्च और करना था उजाला इस अन्धकार में ,
यही सोच कर चलने लगा था मैं उस दूसरे कमरे की ओर,
दिमाग में इसके सिवा कोई बात नहीं थी कुछ और ,
लेकिन अचानक मेरे सर पर हुआ एक तेज प्रहार,
बंद हो गयी मेरी आँखें और छा गया मेरी आँखों के आगे अंधकार ,
बस बेहोश होते हुए मेरे कर्णों में पड़ी ये आवाज़,
मार दिया साले को, अब न होगी कोई आवाज़ ,
हम कर सकते हैं आराम से अब इस घर में चोरी,
ये तो गया परलोक न होगी इसकी अब कोई दूसरी इच्छा पूरी ,
बस ये ही शब्द मेरे कानों में गूंझते रहे ,
क्या यही थी ज़िन्दगी जिसके लिए हम जूझते रहे ,
फिर मैं हो गया शून्य में विलीन ,
न रहा मुझे होश हो गया में बेहोशी में  तल्लीन,
जब खुली मेरी आँखें तो हो गया मैं हैरान ,
जाने क्या वक़्त था मैं था इससे परेशान ,
चारो तरफ था वो ही अँधेरा जिससे में था घबराता,
लेकिन ये जगह तो ऐसी थी जिससे नहीं था मेरा नाता ,
मैं उठा तो मैंने अपने को उनके बीच पाया ,
वो  लोग दो थे और उनकी तरफ बढ़ रहा रहा कोई नकाबधारी साया ,
मैं उन्हें चेताने के लिए चिल्लाया,
लेकिन मेरी आवाज़ नहीं पहुंचती है उन तक ये मैंने पाया ,
वो साया अभी भी उनकी तरफ बढ़ रहा था ,
उन लोगों की नादानी पे मैं कुढ़ रहा था ,
अब मुझे ही कुछ करना होगा ये मैंने सोचा ,
मैंने उसे जाकर एक दम से दबोचा ,
मैंने उसे उठाकर पटका,
चिल्लाये वो दोनों लोग की ये  चोर था क्यूँ हवा में लटका ,
मैं अब नकाबपोश के ऊपर था ,
उन दोनों लोगो के मन में एक डर था ,
मैंने नकाबपोश की खोपड़ी में एक प्रहार किया,
उसने होश खोकर अपने हारने का इजहार किया ,
वे दोनों लोग एक कोने में दुबके पड़े थे,
जैसे हों कोई मूर्ती ऐसे खड़े थे,
मैंने अब उनको और फिर नकाबपोश को देखा ,
वे लोग होने लगे गायब जैसे मिटा रहा हो कोई पेंसिल की रेखा ,
अब मैं उधर अकेला खड़ा था ,
न कोई उधर घर था , न ही कोई उधर पड़ा था ,
किधर था मैं और क्यूँ था मैं मुझे न था इस बात का कोई अंदेशा ,
सोच रहा था मैं ये कि अचानक मैंने फिर एक साए को देखा ,
फिर एक गहरी अँधेरी रात थी ,
शायद तकदीर मेरे साथ थी
वो साया बैठ कर टीवी के मज़े ले रहा था ,
और एक नकाबपोश उसके पीछे चाकू लेके खड़ा था
- विकास 'अंजान'
नोट : copyright  © २०१४ विकास नैनवाल  

6 टिप्‍पणियां:

  1. एकान्त में मनोभाव एवं मनोदशा को अच्छी तरह से चित्रित किया है आपने और आपकी अन्तर्दवन्द के संघर्ष का भी बढ़िया उल्लेख किया है!:)

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  2. शुक्रिया देव जी बस आपकी रचनाओं को पढ़कर ही थोडा inspired हुए हैं ।

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  3. बहुत बढ़िया
    अंतर्मन के द्वंद को रेखांकित करने का प्रयास

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