रविवार, 16 नवंबर 2014

रोग बनकर रह गया , प्यार तेरे शहर दा- शिव कुमार बटालवी, जगजीत सिंह

कल बैठा जगजीत सिंह जी कि गायी हुई ग़ज़ल सुन रहा था । ग़ज़ल के बोल दिल को छू गये और मैं इसे काफी बार सुनता रहा।  यह ग़ज़ल शिव कुमार बटालवी साहब की लिखी हुई थी। और इसके बोल इस प्रकार है :

रोग बनके रह गया है , प्यार तेरे शहर दा ,
मैं मसीहा वेखिया, बीमार तेरे शहर दा ,

ऐदिया गालियाँ मेरी , चढ़दी जवानी खा लई,
क्यूँ करा न दोस्ता , सत्कार तेरे शहर दा ,

जित्थे मोया बाद भी , कफ़न नहीं होया नसीब ,
कौन पागल हुण करे , ऐतबार तेरे शहर दा ,

ऐथे मेरी लाश तक , नीलाम कर दित्ती गयी ,
लाथ्या कर्जा न, फिर भी यार तेरे शहर दा 

- शिव कुमार बटालवी

इस ग़ज़ल को आप इन लिंक्स पे जाके सुन सकते हैं।
gaana.com

और अगर ऐसी ही कोई उम्दा ग़ज़ल से आप वाकिफ हों तो आप उसे कमेंट बॉक्स पे जाके साझा कर सकते हैं ताकि बाकि लोग भी उससे रूबरू हो सकें। 

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