सोमवार, 8 अप्रैल 2019

मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #4

मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा:
सुनीता ने रीमा को कॉल तो किया और रीमा ने उसकी मदद का इन्तेजाम भी कर दिया था। युद्धवीर और उसकी टीम उधर पहुँच गई थी। लेकिन फिर... कोई उनकी नाक के नीचे से सुनीता को अगुवा करके ले गया। अब आगे.....


4.

मैं प्लेन से निकल कर बाहर आ चुकी थी। फ्लाइट लैंड करते ही पहले मैंने सुनीता को फोन लगाया था लेकिन उसने मेरे फोन का जवाब नहीं दिया तो मुझे कुछ खटका था। मैंने तब इंस्पेक्टर को फोन किया था और मुझे वह बुरी खबर मिली थी। इंस्पेक्टर युद्धवीर यादव ने बड़ी ही झिझक के साथ बताया था कि उनके नाक के नीचे से कोई सुनीता को उड़ा ले गया था। मैंने एक गहरी साँस ली थी। सब कुछ आसानी से हो जाये ये भला मेरे साथ कभी हो सकता था। मैंने उनको कुछ जरूरी निर्देश दिये थे और उन्हें अपना इन्तजार करने को कहा था।

मैं एअरपोर्ट से बाहर निकली ही थी कि मुझे रीना दिखी थी। रीना आई एस सी की एक जूनियर एजेंट थी जो अभी दिल्ली में थी। फ्लाइट में बैठने से पहले मैंने उसे अपने आने की खबर कर दी थी और उसे कुछ चीजें लाने के लिए कहा था। वैसे आप सोच रहे होंगे कि जब आईएससी का अच्छा नेटवर्क दिल्ली में मौजूद था तो मैंने इंस्पेक्टर से मदद क्यों माँगी थी। इसका मुख्य कारण केवल इतना था कि मैं आईएससी से मदद माँगती तो अपने चीफ खुराना की राडार में आ जाती और मैं यह नहीं चाहती थी। रीना को भी केवल इतना मालूम था कि मैं मटरगश्ती करने के लिए दिल्ली आई थी। मैंने अपने असली मकसद से उसे भी वाकिफ करवाना जरूरी नहीं समझा था।


रीना और मैं गले मिले, उसने मुझे बैग दिया जो मैंने अपने बैग में डाल दिया और फिर हम पार्किंग तक बढ़ गये। पार्किंग पर पहुँच कर मेरी बाँछे खिल गई। उधर एक सुपर बाइक मौजूद थी। मैंने बहुत दिनों से बाइक नहीं चलाई थी और सोचा था कि एअरपोर्ट से सुनीता के घर तक बाइक से ही जाऊँगी। मैंने रीना को धन्यवाद दिया। अपना बैग लटकाया और फिर बाइक स्टार्ट की। रीना मेरे पीछे बैठ गई। उसका घर उसी दिशा में पड़ता था तो मैंने उसे छोड़ने का फैसला किया। वैसे भी अब सुनीता तो थी नहीं। दस पंद्रह मिनट की देरी से कोई फर्क नहीं पड़ना था।

मैंने एअरपोर्ट से बाइक निकाली तो फ्लाईओवर मेरा इंतजार कर रहा था। वातावरण में धुंध थी जो सर्दी नहीं वरन प्रदूष्ण का परिचायक थी। मैंने बाइक को स्पीड दे दी और मैं अब हवा से बातें करने लगी।

रीना को मैंने उसके घर छोड़ा। उसने मुझे अपने यहाँ रुकने को कहा लेकिन मैंने उससे बोला कि मुझे अपने एक्स बॉयफ्रेंड से मिलना था और आँख मार दी। रीना हँसने लगी। जिस पेशे में मैं और रीना थे उसमें प्यार के लिए जगह नहीं थी। फिर भी हम इनसान थे और कई बार रिश्ते बना बैठते थे। पर आखिर कार उन रिश्तों की ज़िन्दगी बहुत छोटी होती थी। आम आदमी हमारी ज़िन्दगी नहीं समझ सकता था और इस कारण शुरुआत में वह कितना ही बोले कि वह सब समझता है लेकिन आखिर में उसका धैर्य जवाब दे जाता था। खैर, अब यह पुरानी बात हो चुकी थी। मैंने बहुत समय से प्रेम में पड़ना बंद कर दिया था। वैसे ही मेरी ज़िन्दगी में इतना ड्रामा था और ड्रामा मुझे नहीं चाहिए था। और यकीन मानिए भले ही कभी कभी मुझे अकेलापन सताता था लेकिन फिर भी काफी खुश थी। रोज़ मर्रा के झगड़े नहीं होते थे।  खैर, बॉय फ्रेंड वाली बात तो मैंने रीना को टालने के लिए कही थी। मैं नहीं चाहती थी कि उसे मेरे असली मकसद का पता चले।

                                                                          ***

मैंने  दोबारा बाइक शुरू की और दिल्ली की सड़कों पर सरपट बाइक दौडाने लगी। दिल्ली अब जगने लगी थी।

मेरी फ्लाइट 4:30 बजे दिल्ली लैंड हुई थी और पौने छः बजे मैं सुनीता की इमारत के सामने खड़ी थी।

गेट पर एक सिपाही था जिसे मैंने अपना  परिचय दिया और वो मुझे सुनीता के अपार्टमेंट में ले गया।

अन्दर इंस्पेक्टर और दो सिपाही और मौजूद थे।

"सॉरी मैम, हम सुनीता की निगरानी नहीं कर सके।" मुझे देखते ही इंस्पेक्टर ने नजरे झुकाकर कहा।

"कोई नहीं। होता है। आदमी गलतियों से ही सीखता है। फिलहाल क्या क्या हुआ मुझे तफसील से बताओ।" मैंने इंस्पेक्टर से कहा।

इंस्पेक्टर ने बताना शुरू किया।

"हम्म। आग कैसे लगी?"

"दमकल कर्मचारियों के अनुसार उस अपार्टमेन्ट में इलेक्ट्रिकल शार्ट सर्किट हुआ था।"

"आप क्या सोचते हैं?" मैंने पूछा।

"मैडम, वह अपार्टमेंट पिछले दो तीन महीने से खाली था। उसमे शोर्ट सर्किट होना कुछ जमता नहीं है। मुझे मालूम है  कि वह आग डायवर्सन क्रिएट करने के लिए लगाई गई थी।"

"कैसे मालूम है?"

"इस इमारत में सी सी टीवी कैमरे लगे हैं जो कि खुशकिस्मती से काम करते हैं। चूँकि हमला सुनीता के कमरे में भी हुआ था तो मैंने सोचा क्यों न फुटेज देखकर पूरी बात का पता करें। हमला होने से तकरीबन दस पन्द्रह मिनट पहले एक आदमी उस फ्लैट में घुसता दिखता है। थोड़ी देर बाद वो निकलता है, दरवाजा लॉक करता है और आग चालू हो जाती है।"

"हम्म। उनकी पहचान तो नहीं हो पाई होगी।"

"नो मैडम। सभी लोगों ने चेहरे में रुमाल बांधा था और वो खड़े इस तरह से थे कि उनके चेहरे साफ़ दिखाई नहीं  दे रहे थे।"

"हम्म। बाहर खड़े चौकीदार से बात की। मुझे लगता है उनकी यह योजना खड़े पैर तैयार की गई थी।"

"जी मैडम। उससे बात की और उसने बताया कि आग लगने से कुछ देर पहले कुछ लडके उधर किराया का कमरा देखने के लिए आये थे। चौकीदार ने उन्हें यह कहकर भगा दिया था कि इधर कुछ नहीं मिलेगा। हाँ, बातों बातों में उन्होंने उससे यह उगलवा लिया था कि कौन सा कमरा काफी दिनों से खाली है।"

"हम्म। चौकीदार किधर है?"

"मैडम मैंने उसे स्टेशन में भेजा है। वहाँ हमारा स्केच आर्टिस्ट उससे उन लड़कों की तस्वीर निकलवाने की कोशिश करेगा।"

"हम्म। बाहर सी सी टीवी कैमरा नहीं था क्या?"

"नहीं मैडम केवल बिल्डिंग में ही था। बाहर नहीं लगा है। आस पास भी हमने पता किया लेकिन कुछ नहीं मिला है।"

"वो लोग आये तो गाड़ी से होंगे। यहाँ तक आने के लिए दो तीन ही रूट हैं। क्या तुम उधर पता कर सकते हो?"

"यस मैडम मैं आलरेडी इस काम में लग चुका हूँ। कुछ पता चलते ही आपको बताऊंगा।"

"ठीक है।"

"मैडम.." इंस्पेक्टर ने कुछ पूछना चाहा।

"हम्म.. बोलिए"

"वो लड़की आपकी क्या लगती है?" उसने प्रश्न किया।

"छोटी बहन है मेरी।" मैंने जवाब दिया।

"ओह! हम उसे पूरी कोशिश करेंगे ढूँढने की।" इंस्पेक्टर ने तन कर कहा।

"थैंक्स।" मैं इतना ही कह पाई। यह भारत था। यहाँ जिंदगियां आम और ख़ास के तबके में बंटी हुई थी। ख़ास लोगों के रिश्तेदार भी खास होते थे।  सरकारी महकमे उनसे अलग तरह से पेश आते थे। यह मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी। अगर सुनीता के पीछे मैं न होती तो शायद ही कोई पुलिस वाला इतनी तत्परता दिखाता। उसके लिए इससे भी जरूरी खास लोगों के काम होते। पर अब तो सुनीता भी खास थी।

आखिर कौन पड़ा था सुनीता के पीछे? ऐसा उसके साथ क्या हुआ था कि उसकी जान पर आ बनी थी? मैं यह सब सोच ही रही थी कि फिर इंस्पेक्टर की आवाज़ से ही मेरी विचारों की कड़ियाँ टूटी।

"मैडम...मैडम"

"हाँ बोलो.."

"आपको कोई आईडिया है, कौन हो सकता है इस सबके पीछे?" इंस्पेक्टर ने प्रश्न किया।

"नहीं। एक्चुअली मेरा पेशा ऐसा है कि मैं काफी समय से सुनीता के कांटेक्ट में नहीं थी। फिर उसका फोन आया और उसने मुझसे मदद माँगी तो मैं इधर आ गई। फोन पर वो इतनी घबराई हुई थी कि उससे कुछ पूछने का मुझे वक्त ही नहीं मिला।"

"ओह!!" इंस्पेक्टर ने कहा। वह कुछ और कहने ही वाला था कि हम सबका ध्यान एक फोन पर गया जो कि उसी वक्त बजना शुरू हुआ था।

फोन पर कोई अंग्रेजी गीत बज रहा था।

हम लोग उस वक्त लिविंग रूम में थे। सिपाहियों ने तब तक बुक शेल्फ खड़ी कर ली थीं। और कांच साफ़ कर लिया था। हमने एक दुसरे को देखा लेकिन यह हमारा फोन नहीं था। मैंने फोन की आवाज़ पर ध्यान दिया तो वह दूसरी जगह बज रहा था। फोन की आवाज़ का पीछा करते हुए मैं पहले बेडरूम पहुंची और फिर बाथरूम में दाखिल हुई । उधर फोन घनघना रहा था।

मैंने तेजी से फोन लपका और उसे अपने कान पर लगाया।

"हेल्लो, सुनीता कैसी है तू ? ठीक तो है न? प्रियंका दीदी क्या हमारी मदद करेंगी?" एक ही साँस में सब कुछ बोला गया।

"मैं रीमा बोल रही हूँ।" मैंने केवल इतना कहा।

"सुनीता किधर है?" उधर से बोला गया।"प्लीज मेरी उससे बात करा दीजिये।"

"तुम कौन हो? और सुनीता और प्रियंका को कैसे जानती हो?" मैंने प्रश्न दागा।

"आप कौन हैं? और सुनीता का फोन आपके पास क्या कर रहा है?" उधर से मेरे प्रश्नों के बदले प्रश्न किया गया।

मैंने उसे बताया। और वह रोने लगी। "देखो घबराओ मत।" मैंने कहा।

"अपना नाम बताओ?" मैंने पूछा

"जी काम्या नारंग।"

"देखो काम्या। अभी सात बज रहे हैं।" तुम अपने घर में रहो। मैं एक डेढ़ घंटे में तुम्हारे पास पहुँचती हूँ। फिर बात करते हैं। अपना पता बताओ।"

उसने अपना पता बताया। मैंने पता अपने दिमाग में बैठाया और फोन डिस्कनेक्ट किया।

इंस्पेक्टर युद्धवीर मुझे प्रश्नसूचक नजरों से देख रहा था।

"सुनीता की दोस्त है। शायद वह इस मामले को जानती है। मैं उससे मिलने जा रही हूँ।"

"मैडम मैं भी आपके साथ चलूँ।" इंस्पेक्टर ने पूछा।

"नहीं। आप सी सी टी वी फुटेज के माध्यम से उन लोगों के विषय में पता लगाने की कोशिश कीजिये। कुछ पता लगता है तो मुझे बताईये।"

मैं उससे मिलकर आती हूँ। आप मेरे साथ नीचे चलेंगे मैंने उससे कहा। उसने मेरा इशारा समझा और  अपने साथियों को ऊपर छोड़ मेरे साथ नीचे आ गया।

"यस मैडम।" नीचे पहुँचकर उसने मुझसे कहा।

"देखिये। जिस तरह से सुनीता को ले जाने दिया गया उससे मुझे यह अंदाजा तो हो गया है कि आपका कोई साथी उनसे मिला था।"
इंस्पेक्टर ने कुछ कहना चाहा।

"मेरी बात सुनिए पहले।" मैंने कहा। इंस्पेक्टर चुप हुआ।

"आप भी जानते हैं सुनीता का अगवा हो जाना केवल लापरवाही नहीं है। कोई भी पुलिसवाला इतनी कोताही तब तक नहीं बरतेगा जब तक उसे इसका ईनाम न मिले। मैं अभी इस सब पचड़े में नहीं पड़ना चाहती हूँ। कौन था? क्यों किया? वह आपका आंतरिक मामला है। मेरे लिए सुनीता की ज़िन्दगी कीमती है और मैं नहीं चाहती कि उस पर कोई आंच आये। अब एक कड़ी मेरे हाथ आई है। काम्या के साथ भी वही हो सकता है जो सुनीता के साथ हुआ। मैं नहीं चाहती कि ऐसा हो। आप एक काम कीजिये। आप उन लोगों का पता लगाने की कोशिश कीजिये। अगर कुछ पता लगता है तो मुझे बताइए।  कुछ नया पता चलता है तो मैं आपको खबर करूंगी। आशा है आप इसे गलत तरीके से नहीं लेंगे।" मैंने अपनी बात रखी।

मुझे पता था कि इंस्पेक्टर बात का मर्म समझेगा। वह एक व्यवहारिक आदमी था और सिस्टम की खामियां जानता था। उसने गर्दन हिलाकर सहमति दर्शाई।

"अगर कुछ पता चलेगा तो बताइयेगा।" मैंने उससे कहा।

"जी मैडम।" उसने कहा।

मैं थोड़ी देर उसे देखती रही।

"और आपने जो मुझसे अभी कहा है वो बात मैं अपने तक ही रखूँगा।" उसने आगे जोड़ा।

"थैंक्स।"मैंने बोला। मैंने बाइक से अपना हेलमेट निकाला। फोन पर लोकेशन फीड किया और जीपीएस ओंन किया। फोन को स्टैंड पर लगाया और बाइक पर सवार हुई।

मैं बाइक पर सवार होकर अपनी अगली मंजिल की तरफ बढ़ चली।

साइड  व्यू मिरर में मुझे इंस्पेक्टर दिखता रहा।

क्या मैंने इंस्पेक्टर से यह सब कहकर ठीक किया था? कहीं वो भी साजिश में शामिल तो नहीं था? उसके अफसर ने उसे कर्तव्यपरायण ही बताया था। लेकिन फिर आजकल पता किसका चलता है। वह निज़ा फाजली का शेर है न:

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी 
जिस को भी देखना हो कई बार देखना 
- निदा फ़ाज़ली

हम जासूसों को तो यह बात गाँठ बाँध कर रखनी पड़ती है। लेकिन मेरी जासूसी इन्द्रीय कह रही थी कि इंस्पेक्टर युद्धवीर पर मैं विश्वास कर सकती थी।  उसी की बात मानकर मैंने उससे यह सब कहा था।  मैं अब आगे निकल आई थी। इंस्पेक्टर पीछे रह गया था। मुझे अब काम्या से काफी उम्मीदें थी। और एक उम्मीद यह भी थी कि सुनीता को कुछ न हुआ हो। अगर कोई पुलिसवाला उनसे मिला था तो वो काम्या के विषय में जरूर उन्हें खबर करेगा। मुझे उम्मीद थी कि वो लोग तब तक सुनीता के साथ कुछ नहीं करेंगे। अगर उन्हें करना होता तो उसे अगवा न करते। खैर, होने को तो बहुत कुछ हो सकता था। इन्हीं सोचों में डूबी मैं अपनी मंजिल की तरफ बढ़ती जा रही थी।

                                                               क्रमशः

फैन फिक्शन की सभी कड़ियाँ:
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #1
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #2
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन  #3 
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #4
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #5
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #6
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #7
मच्छर मारेगा हाथी को -अ रीमा भारती फैन फिक्शन #8
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #9
अब मिलेंगे अगले सोमवार को।
©विकास नैनवाल 'अंजान' 

4 टिप्‍पणियां:

  1. यह कड़ी भी कथानक को आगे बढ़ाती हुई सस्पेंस को बरकरार रखती है । बेहतरीन लेखन ।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 08/04/2019 की बुलेटिन, " ८ अप्रैल - बहरों को सुनाने के लिये किए गए धमाके का दिन - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. जी, बुलेटिन में मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए शुक्रिया।

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