सोमवार, 1 अप्रैल 2019

मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #3



पिछली कड़ी में आपने पढ़ा:
रीमा किसी केस की तलाश में होती है लेकिन उसके बॉस उसे आराम करने के लिए कहते हैं। वह ऑफिस से परेशान हालत में लौटती है और यह सोच रही होती है कि आगे वो क्या करेगी कि उसे एक फोन कॉल आता है। फोन कॉल से उसके मन की मुराद पूरी हो जाती है और वो दिल्ली के लिए निकल पड़ती है।

अब आगे:

3)


दिल्ली में मौजूद एक इमारत में भगदड़ मची थी। जहाँ इमारत के ज्यादातर लोग इमारत से बाहर आ रहे थे  वहीं  कुछ ऐसे भी थे जो इमारत  के अंदर दाखिल हो रहे थे। इमारत की एक मंजिल में  आग लगी हुई थी और इस भगदड़ में कौन अंदर है और कौन बाहर इसका कुछ ध्यान किसी को नहीं था। सबको अपनी जान बचाने की जो पड़ी थी।

इन सब बातों से बेखबर एक लड़की कमरे में एक कोने में छुपकर बैठी हुई थी। उसने दरवाजा बंद किया हुआ था। दरवाजे के आगे कुछ बुक शेल्फ लगाये हुए थे और अब वो फोन मिलाने में व्यस्त थी। अपने कांपती उँगलियों से उसे फोन मिलाने में दिक्कत हो रही थी। उसने एक दो गहरी साँसे ली और फिर डायरी के उस पन्ने को देखकर वह नंबर डायल करने लगी। उसने उस वक्त को कोसा जब उसने नम्बर डायरेक्ट मोबाइल फोन में फीड नहीं किया। उसकी यह पुरानी आदत थी कि पर्स में पड़ी डायरी में वह नये नम्बर लिख दिया करती थी।  ऐसे नंबर जिसका इस्तेमाल करने का उसका इरादा नहीं होता था। अब जब उस नम्बर की जरूरत थी तो पहले तो पर्स में डायरी नहीं मिली और फिर डर के मारे कांपते हाथों से डायरी खोलकर नम्बर मिलाने में उसे दिक्कत हो रही थी।

आखिरकार नम्बर मिल गया और उधर से रिंग  जाने लगी।

भले ही वो फोन कर रही थी लेकिन उसका सारा ध्यान दरवाजे पर था। उसने काफी देर पहले कुछ लड़कों के समूह को उसके गेट के बाहर देखा था। ये वही लड़के थे जिन्हें उसने उसका पीछा करते हुए कई बार नोटिस किया था। फिर वो गेट में मौजूद गार्ड से बात करने लगे थे और उसने देखा था कि उनमें से एक लड़का गायब था। उसका माथा ठनका था और उसने सोचा था कि शायद उसे मदद की जरूरत अब पड़ने ही वाली है।


****

चार पांच लड़कों का यह समूह एक फ्लैट के सामने  रुका  और  तेजी से दरवाजा भड़भड़ाने  लगा। दरवाजे के बाहर नेम प्लेट पर नाम नेगी निवास लिखा हुआ था।

फ्लैट के भीतर मौजूद एक पच्चीस  साल की  लड़की थी। लड़की का नाम सुनीता नेगी था। पिछले कुछ दिनों से ये लड़के उसका पीछा  कर रहे थे। उसने इस बात के विषय में पुलिस से बात भी की थी लेकिन उन्होंने  भी खानापूर्ती ही की थी।

फिर आज सुबह वो प्रियंका से  मिलने  एक माल में गयी थी  तो  उधर फिर  इन लोगों ने उस पर हमला बोल दिया था। बड़ी मुश्किल से दोनों ने अपनी जान बचाई थी। तब प्रियंका से उसे यह नम्बर दिया था और रीमा भारती के विषय में बताया था। प्रियंका ने ही उसे कहा था कि रीमा जरूर उसकी मदद करेगी। और अब जब वो लोग उसकी इमारत के बाहर खड़े थे तो उसने रीमा से मदद माँगने का फैसला कर दिया था। डूबते को तिनका का सहारा ही काफी था। यही सोच सुनीता ने रीमा को कॉल लगाया था।

रीमा से बातचीत हो ही रही थी कि किसी के दरवाजा भड़भड़ाने की आवाज़ आने लगी। रीमा ने उम्मीद के अनुसार मदद की थी। फोन रखकर जब रीमा अपने कांटेक्ट से बात कर रही थी तो सुनीता ने दरवाजे के आगे बुक शेल्फ लगा दी थी। यह कुछ देर तक तो उन लोगों को रोकने में सक्षम था। वो भाग कर अंदर गयी थी और अपने बेडरूम की कुंडी लगाकर और उसके आगे कुर्सी टेबल टिकाकर अपने बाथरूम में चली गयी थी। उसने बाथरूम की कुंडी लगाई ही थी कि रीमा का कॉल आया था।

“हेलो” सुनीता ने अपनी साँसों को नियंत्रित करते हुए कहा था।

“किधर हो?” रीमा में प्रश्न किया।

“बैडरूम के अंदर बाथरूम में।” सुनीता ने जवाब दिया।

“दरवाजों पर कुछ लगाया है।”

“जी। हॉल पर बुक शेल्फ और बैडरूम वाले पर टेबल और कुर्सी।”

“गुड। ये उन्हें तब तक रोके रखेंगे। मैंने बात कर ली है। लाइन में इंस्पेक्टर युद्धवीर यादव जी हैं। यादव जी।”

“जी मैडम।” इंस्पेक्टर यादव ने कहा।

“आप कितनी देर में पहुंच जाएंगे?”

“पांच मिनट में मैडम।”

“ओके। सुनीता मैंने यादव जी का नम्बर तुम्हे मैसेज कर दिया है। तुम उनसे कांटेक्ट में रहना। वो पांच मिनट में उधर पहुँच रहे हैं। मैं भी उधर पहुँच रही हूँ। फ्लाइट पकड़ने में और आने में मुझे कुछ वक्त लगेगा। मैं चार पांच बजे तक तुम्हारे पास होऊँगी। तुम हौसला रखो।”
“जी दीदी।” सुनीता बस यही कह पाई थी।
“सुनीता जी आप हौसला रखिये।आपको कुछ नहीं होगा। हम आ रहे है ।” उधर से इंस्पेक्टर यादव की आवाज़ आई थी।
“जी सर।” सुनीता ने कहा था और फिर फोन काट दिया गया था। सुनीता ने बाथरूम के दरवाजे में भी पानी की बाल्टियां रखी हुई थी और बाथरूम की दीवार से पीठ लगाकर बैठी हुई थी।
न जाने उसकी किस्मत में क्या लिखा था। न जाने किस घड़ी उसने उधर जाने का फैसला किया था। इन्ही सब ख्यालातों में वो खोई हुई थी। बाहर एक तेज शोर हुआ था जिससे लग रहा था कि एक बुक शेल्फ गिर चुकी थी।सुनीता ने अपनी आँखें बंद कर ली और अपने आपको हालात के ऊपर छोड़ दिया। अब जो होगा देखा जाएगा।

****

मैं उस वक्त टैक्सी में एअरपोर्ट की तरफ बढ़ रही थी जब मैंने दोबारा सुनीता को फोन लगाया। इतने देर में मैंने दिल्ली में अपनी जान पहचान से ऐसे असफर का नम्बर निकलवा दिया था जो कि सुनीता के मामले में उसकी मदद कर सकता था। दिल्ली में मैंने काफी केसेस सुलझाए थे और इस कारण मुझे यह कांटेक्ट ढूँढने में और उनसे इस मामले में मदद  करने के लिए कहने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी। मैंने इंस्पेक्टर युद्धवीर की बात सुनीता से करवा ली थी। मैं इस बात को लेकर निश्चिंत थी कि मेरे दिल्ली पहुँचने तक तो सुनीता को कुछ नहीं होने वाला है।

वैसे भी अब दिल्ली पहुँचकर ही मैं  कुछ कर सकती थी।

कुछ ही देर में एअरपोर्ट आ गया था और मैंने चेकइन कर लिया था। अभी पौने दो हो रहा था और फ्लाइट ढाई बजे की थी तो मेरे पास पंद्रह से बीस मिनट थे। मैंने उधर मौजूद एक दुकान से एक कॉफ़ी ली और उसे चुसकते हुए बोर्डिंग का इंतजार करने लगी।

****

काफी देर तक बहार शांति सी थी तो सुनीता को कुछ खटका सा हुआ। उसने बाथरूम का दरवाजा खोला बेडरूम में दाखिल हुई।  उसने बेडरूम का दरवाजा खोला तो पाया कि बाहर का दरवाजा आधा खुला था और एक बुकशेल्फ गिरा हुआ था।

तभी दरवाजे के बाहर भागते क़दमों की आहट हुई और सुनीता भागकर बेडरूम में घुस गई। उसने मेज दोबारा दरवाजे पर सरका दिया और खुद बाथरूम में घुस गई।

थोड़ी देर में कोई बेडरूम का दरवाजा खटखटा रहा था। सुनीता के आँसू निकल रहे थे। उसका शरीर सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था। कुछ देर में दरवाजा पीटना बंद हुआ और सुनीता का फोन बजने लगा।

पहले तो सुनीता फोन की आवाज़ से ही डर गई थी। उसने किसी तरह फोन खोला तो दूसरी तरफ से एक सख्त मर्दाना आवाज़ आई। “मैं इंस्पेक्टर यादव बोल रहा हूँ। मैडम आप किधर हैं? हम आपके बेडरूम के दरवाजे के बाहर हैं। जल्दी बाहर आएं। आपकी बिल्डिंग में आग लगी हुई है।”

सुनीता को झटका सा लगा। वो जल्द से उठकर बाथरूम से बाहर आई और समान हटाते हुए उसने बेडरूम का दरवाजा खोला तो उधर इंस्पेक्टर को अपने दो मातहतों के साथ उसने खड़ा पाया।

दरवाजा खुलते ही इंस्पेक्टर यादव ने कहा-”चलिये इधर से नीचे चलते हैं।”

“पर वो?”  सुनीता ने कहना चाहा।

"जब हम आये तो इधर कोई नहीं थे।"

आग हाल फिलहाल में लगी है। चलिये आपको नीचे छोड़कर आते हैं।

और फिर वो सभी कुछ देर बाद बिल्डिंग के नीचे थे।

आग बुझाने वाले भी आ गए थे और आग पर काबू पा लिया गया था। तब तक सभी लोग बिल्डिंग से बाहर आ चुके थे। बाहर लोगों का जमघट लगा हुआ था।

इंस्पेक्टर ने सुनीता से कहा- "मैडम मैं पता करता हूँ क्या माजरा है। आप यही रुकना।"

"तुम दोनों  मैडम के साथ रहना।" इंस्पेक्टर ने अपने मातहतों को निर्देश दिया।

इन्सपेक्टर बिल्डिंग से बाहर निकलते दमकल के दो सदस्यों के पास पहुँचकर कुछ बातें करने लगा।

जब वो लौट कर आया तो उसकी आँखें हैरत से फटी की फटी रह गई।

उसके मातहत लोगों से पूछताछ कर रहे थे और सुनीता अपनी जगह पर नहीं थी।

"अबे लड़की कहाँ गई?" वो अपने मातहतों पर चिल्लाया।

दोनों सिपाही एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। "यही तो थी साहब?" फिर वो ऐसे इधर उधर देखने लगे जैसे सुनीता कोई छोटी सी चीज थी जो गुम गई थी।

"अबे घनचक्करों वो लड़की है सुई थोड़े न जो ऐसे ढूँढ रहे हो? तुम दोनों यहाँ नहीं थे क्या?"

"वो साहब ये रमेश तो बाथरूम गया था।"

"और तू....तू  क्या कर रहा था?" इंस्पेक्टर यादव का पारा सातवे आसमान पर था।

"साहब वो मैं...मैं"

"क्या मिमिया रहा है?"

"मैं...मैं...वो उधर झगड़ा होने लगा था दो चार .लोगों के बीच। मैं उसे छुडाने गया था।"

इंस्पेक्टर ने अपने बालों पर हाथ फेरा और फिर रौबदार आवाज़ में उधर मौजूद लोगों से पूछा -"इधर एक लड़की मौजूद थी? किसी ने देखा?"

सब शांत थे।

"अरे किसी ने तो देखा होगा। वो इसी बिल्डिंग में तो रहती है।"

"कौन साहब? जो लड़की आपके साथ थी?"

"हाँ।" इंस्पेक्टर यादव ने कहा।

"वो तो इधर नई नई आई है। इसलिए शायद कोई नहीं जानता है।" एक आदमी ने कहा।

"तुमने देखा वो किधर गई?" इंस्पेक्टर ने आशान्वित होकर पूछा।

"नहीं साहब।" वो आदमी बोला।"मैं शरीफ आदमी हूँ, लड़कियों को नहीं देखता। मैं तो लड़ाई देख रहा था।"

"साले मसखरी करता है।" यादव कहते हुए आगे बढ़ा ही था कि आदमी बोला - "सर वो मेरी जिम्मेदारी थोड़े न थी।"

उसका यह कहना था कि भीड़ हँसने लगी। इंस्पेक्टर अपमान का घूँट सा पीकर रह गया।

उसके मातहत कभी उसका चेहरा देखते और कभी भीड़ को देखते।

इंस्पेक्टर ने उन्हें देखा और फिर गर्जा -"तुम लोग कबूतरों की तरह मुझे क्या देख रहे हो। बाहर जाकर देखो। लड़की को जबरदस्ती ले जाया गया है। ज्यादा दूर नहीं गई होगी।"

जैसे पुतलों में जान आई हो इसी प्रकार तेजी से दोनों सिपाही बाहर को भागे। लेकिन कुछ हाथ नहीं आया।
कुछ देर बाद इंस्पेक्टर बिल्डिंग कंपाउंड के बाहर आया तो उसने उसके मातहतों को लौटते हुए पाया।

"साब किसी ने कुछ नहीं देखा।" दोनों  ने एक साथ कहा।

"आखिर लड़की गई कहाँ? उसे आसमान निगल गया या जमीन खा गई।" इंस्पेक्टर बुदबुदाया। वो रीमा को क्या जवाब देगा यह सोचकर ही उसे पसीने आ रहे थे। उसकी बुरी तरह लगने वाली थी।

क्रमशः

फैन फिक्शन की सभी कड़ियाँ:
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #1
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #2
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन  #3 
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #4
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #5
मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #6

अब मिलेंगे अगले सोमवार को।
©विकास नैनवाल 'अंजान' 

2 टिप्‍पणियां:


  1. "नहीं साहब।" वो आदमी बोला।"मैं शरीफ आदमी हूँ, लड़कियों को नहीं देखता। मैं तो लड़ाई देख रहा था।"

    👍👍👍👍👍👌

    संस्पेंस पैदा हो चुका☺️☺️

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  2. बेहद खूबसूरत....., जासूसी उपन्यास जैसा ही सस्पेंस...., लिखते रहिए । अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी ।

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