गुरुवार, 2 मई 2019

भूख और प्यास

भूख और प्यास
Image by congerdesign from Pixabay


मैं देखता हूँ
अपने चारों तरफ तो 
पाता हूँ इनसान भूखे और प्यासे

कुछ हैं जिन्हें है भूख रोटी की और मांगते हैं रोटी

कुछ को है भूख शरीर की और नोचते हैं उन्हें,

कुछ को है भूख पैसे की ,नाम की और भागते हैं इसके पीछे
सुनते हैं झिड़कियाँ बॉस की,
मिलता है मौका तो लेते हैं घूस,

लेकिन आदमी की नियति है भूखा रहना,
कितना भी खा ले
ये भूख नहीं होती है शांत,

वही हाल है प्यास का,

एक दूध मुँह बच्चा
लगाकर मुख एक कृशकाय से तन वाली स्त्री के स्तन से पी रहा होता है उसके प्राण,
उसे प्यास है जीवन की,

वही किसी के पास है सब कुछ लेकिन फिर भी है 
उसे अवसाद 
उसे प्यास है प्रेम की,अपनत्व की

किसी की महंगी गाड़ी मांगती है तेल, उसका जीवन मांगता है आराम जो भी है इस दुनिया में 
और वो पीता है खून लोगों का,
ये न जाने कैसी है प्यास जो बुझती है रक्त से इनसानों के

वहीं है एक ऐसा भी व्यक्ति जो ताकता है साफ पानी की ओर,
इसी चाह में कि अगर एक घूँट मिल जाये
तो वो बुझा ले अपनी प्यास

यही है शायद जीवन
भूख और प्यास के चक्र में फँसा हुआ

कभी सोचता हूँ 
गर न होती यह भूख और प्यास 
तो क्या होती दुनिया ऐसी
जैसी अब है 
लेकिन फिर सोचता हूँ कि 
गर न होती यह भूख और प्यास 
तो क्या होती मौजूद यह दुनिया भी



© विकास नैनवाल 'अंजान'

6 टिप्‍पणियां:

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