शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

झाँसी ओरछा की घुमक्कड़ी #5: मंदिर, हवेलियाँ ,छतरियाँ इत्यादि

03/12/2018

ओरछा किला और उसके अन्दर मौजूद अलग अलग महलों को हमने देख लिया था। अब चाय पीने की तलब लग गई थी। हम लोगों को अब मंदिरों की तरफ भी जाना था। यह सब सोचकर अब हम किला परिसर से निकले। यहाँ तक आपने पिछली कड़ी में पढ़ा। अब आगे  :

चतुर्भुज मंदिर 



अब हम बाज़ार में थे। बाज़ार से हम रामराजा मन्दिर के तरफ बढे। उधर देखा तो मुझे एटीएम दिख गया। मेरे अंदर उम्मीद की किरण जागी। सुबह से जेब खाली थी। सोचा अब भर जाएगी। मैं खुशी खुशी उधर पहुँच गया लेकिन निराशा ही हाथ लगी। पैसे नहीं मिले। निराश होकर हम वापस एक चाय की दुकान पर पहुँचे। इस बार दुकान पहले वाले से अलग थी। यहाँ एक बुजुर्गवार बैठे हुए थे जो चाय बना रहे थे। उधर हमने चाय का आर्डर दिया और राकेश भाई से कहकर मैंने आई आर टीसी एप्प पर खुद के लिए टिकेट करवाया। किस्मत अच्छी थी रात दस बजे की टिकेट कन्फर्म मिल गई थी। अब कोई टेंशन नहीं थी आराम से सोकर जाया जा सकता था।

चाय आई तो हमने चाय की चुस्की ली। चाय बेहतरीन थी। आराम से हमने चाय पी।

चाय पीकर हमने खुद को रिचार्ज किया और फिर यह तय किया कि किधर जाये। जब किला परिसर जाने से पहले चाय पी रहे थे तो चाय वाले साहब ने बताया था कि राम राजा मंदिर में आरती शाम को ही होती है। उसमें वक्त था और तब तक हमारा रुकने का कोई इरादा नहीं था। अभी भी साढ़े तीन बज रहे थे तब तक तो हम लोग काफी कुछ घूम सकते थे।  वैसे उधर भीड़ भाड़ होती तो हमने फैसला किया कि अन्दर नहीं जायेंगे। हमने चाय के पैसे चुकाए और मन्दिर परिसर के तरफ बढ़ गये।



राम राजा मंदिर 

हम मंदिर परिसर में दाखिल हुए

मंदिर में श्रद्धालुओं  की भीड़ को व्यवस्थित करने के लिए पूरी तैयारी थी। जैसे बड़े मंदिरों में होते हैं उसी तरह रास्ते बने हुए थे। मन्दिर के चारो तरफ अलग अलग चीजों की दुकाने थी। कहीं मिष्टान्न मिल रहे थे तो कहीं पूजा का सामान था।

हम दोनों ही लोग मंदिर जाने का इतना शौक नहीं रखते हैं। मंदिर नया बना लग रहा था। अगर ऐतिहासिक तो उसकी फोटो जरूर खींचता लेकिन ऐसे में मेरा फोटो खींचने का मन नहीं किया और हम लोग आगे बढ़ गये। मैं उधर से जल्दी इसलिए भी बढ़ना चाहता था कि मिठाई देखकर मेरा मन डोल सकता था। मंदिर से जुड़ी कहानी हमे उस वक्त तो पता नहीं था लेकिन बाद में पता लगी। यह कहानी मुझे रोचक लगी तो आप भी सुन लो।

कहते हैं कि मधुकर शाह ने चतुर्भुज मंदिर का निर्माण भगवान राम के लिए करवाया था। भगवान राम की मूर्ती को मधुकर शाह की पत्नी रानी गणेश कुंवरि अयोद्ध्या से लायीं थी और मंदिर बनने तक कुछ समय के लिए मूर्ती महल में स्थापित की गई थी। जब मन्दिर बना तो मूर्ती को मंदिर में स्थापना के लिए ले जाने की कोशिश की लेकिन मूर्ती अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। इसे दैवीय चमत्कार माना गया और महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया। और इसको नाम दिया राम राजा मन्दिर।  राजा राम को ओरछा का राजा भी माना जाता है क्योंकि कहते हैं कि भगवान राम की मूर्ती मन्दिर को न देखकर महल की ओर देखती है।

यह तो कथा का संक्षिप्त रूप है।  मैंने विकिपीडिया में जो कथा पढ़ी वो किसी रोमांच कथा से कम नहीं है। उसमें राजा रानी के बीच का झगड़ा है, तपस्या है, मरने की कोशिश है और फिर रोमांचकारी ढंग से मूर्ती की प्राप्ति है। पूरी कथा आपको पढ़नी है तो आप इसे निम्न लिंक पर पढ़ सकते हैं:
विकिपीडिया



राम राजा मंदिर के गेट की तरफ बढ़ते राकेश भाई 
राम राजा मंदिर - फोटो स्रोत: पत्रिका



चतुर्भुज मंदिर 
राम राजा मंदिर के बाद हम लोग चतुर्भुज मंदिर पहुँचे। हम चतुर्भुज मंदिर के सामने खड़े थे। विशालकाय मंदिर हमे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। यह इतना खूबसूरत लग रहा था कि हमने उसके अनेक फोटो खींचे। कुछ वक्त तो मुझे यही सोचने में लग गया कि इसे पूरा कैसे कैमरे में कैद करूँ। इस मंदिर के अंदर लोग आ जा रहे थे। हमारा इधर भी अंदर जाने का इरादा नही था। मंदिर के बाहर ही एक बोर्ड था जिसमें दर्ज था कि मंदिर का निर्माण मधुकर शाह ने महारानी गणेश कुंवरि के अराध्य राजा राम के लिए करवाना शुरू किया था। परन्तु पश्चिमी बुन्देलखंड में मुगुल हमले और राजकुमार होरेलदेव की मृत्यु के कारण यह पूरा न हो सका।  बाद में महाराज वीर सिंह के शासन में यह पूरा हुआ।  यह चीज ऊपर दर्ज राम राजा मंदिर के कथा से अलग है। ऊपर वाली कथा जैसा रोमांटिसिस्म इसमें नहीं है। आपको क्या मानना है यह आपके ऊपर है।


मंदिर के निकट टकसाल भवन भी है। टकसाल भवन में सिक्के ढालने के काम आता था। यह सत्रहवीं शताब्दी में बना था। इसके आलावा मंदिर के आस पास खाने पीने की चीजों की दुकानें भी थी।

मंदिर के बाहर लोग बैठे हुए थे और राजनितिक चर्चा कर रहे थे। ओरछा के विकास के ऊपर बातचीत चल रही थी। वहीं पर दो बोर्ड लगे हुए थे। मेरी नज़र उन पर गई। दोनों बोर्ड में एक एक नक्शा बना हुआ था। वह नक्शा हेरिटेज वाल्क का था। उस पर एक रास्ता दिख रहा था जिसको पकड़ कर हम चले तो हम अलग अलग ऐतिहासिक इमारतों को देखते हुए जा सकते थे। राकेश भाई मंदिर की तस्वीर लेने में व्यस्त थे तो मैंने पहले इस नक्शे को पढ़ा। उसमें उन छतरियों को भी दिखाया गया था जहाँ हमे जाना था। फिर मैंने उन नक्शों की फोटो ली। फोटो लेने के पश्चात मैंने राकेश भाई को उन नक्शों के विषय में बताया तो उन्होंने भी उसे पढ़ा। अब हमने उस नक्शे के हिसाब से चलने की योजना बना दी। हम लोग आगे बढ़े। इसमें 27 से ऊपर ऐतिहासिक इमारतों के विषय में दर्शाया गया था। यह देखकर इतना तो अंदाजा हो गया था कि सब कुछ हम लोग इस बार नहीं देख पाएंगे लेकिन जैसा पहले भी कहा है कुछ नहीं से कुछ अच्छा होता है तो हम लोग वही देखने वाले थे जो बिना दौड़े भागे और जल्दबाजी किये देख सकते थे।

चतर्भुज मंदिर की तरफ जाते हुए 
चतुर्भुज मंदिर एक दूसरे कोण से 

चतुर्भुज मंदिर 

चतुर्भुज मंदिर के निकट बना टकसाल भवन। भवन के सामने राकेश भाई चतुर्भुज मंदिर की फोटो उतारते हुए।


हेरिटेज वाक का नक्शा जो कि चतुर्भुज मंदिर परिसर में मौजूद है 

भगवत राय की हवेली

आगे हम बढे तो एक और इमारत ने हमारा ध्यान आकर्षित किया। उधर लिखे बोर्ड ने बताया कि यह भगवंत राय की हवेली है। अब यह भगवंत राय कौन थे क्या थे यह उधर कुछ नहीं दिया गया था। ओरछा के इतिहास में एक भगवंत सिंह नाम के राजा का नाम तो आता है।  यह उन्हीं का है या नहीं इसका मुझे आईडिया नहीं है। आपको हो तो बताना।

यह छोटी सी हवेली थी। हवेली सड़क से थोडा ऊपर को थी। सड़क के किनारे ठेले थे। हम ऊपर गये। ऊपर के हाल बेहाल थे। हवेली और आस पास के इलाके की ढंग से देख भाल नहीं कि गई थी। उधर कूड़ा भी पड़ा था जो दिखा रहा था कि ढंग से सफाई उधर नहीं होती है। और आस पास के लोग इसे कूड़ा घर की तरह प्रयोग में ला रहे हैं। यह देखकर बुरा लगा।

हम उतरे और फिर आगे बढ़ गये।


भगवत राय की हवेली 


दीवान का महल

आगे बढ़ने पर हमे एक और इमारत दिखी।  यह दीवान का महल थी। हालत इसकी भी बेकार ही थी। इसकी फोटो लेकर हम आगे बढ़ गये।

दीवान का महल 

दीवान की हवेली से आगे बढ़े तो हमे एक रास्ता दिखा जो कि नीचे एक गली में और ऊपर की तरफ जाता था। यह ढलान वाला इलाका था। रास्ते के पार एक हरा मैदान था जिसमें कुछ गाय चर रही थीं। मैदान के बगल में एक और इमारत दिख रही थी। वह कोई छोटा पुराना सा महल या मंदिर लग रहा था। मैंने उधर जाने का विचार किया। उधर जाने के लिए नीचे को जाते रास्ते की तरफ जाना था। मैं उस रास्ते की तरफ बढ़ गया। राकेश भाई ने ऊपर ही रहकर मैदान के कोने से फोटो खींचने का मन बना लिया।

मैदान और मैदान के किनारे महल की दीवार 

सीतामढ़ी महल

मैं नीचे पहुँचा तो महल मुझे दिखा। रास्ते के दोनों तरफ आम घर थे। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी अनजान मोहल्ले में दाखिल हो रहा हूँ। जैसे किसी के व्यक्तिगत स्पेस को भंग कर रहा हूँ। इसलिए मुझे थोड़ा झिझक भी महसूस हो रही थी।  मैं जल्द से जल्द महल तक पहुंचना चाहता। कुछ ही देर में महल के गेट के बाहर था। महल का नाम सीतामढ़ी महल था। इसका दरवाजा एक आम घर के गेट की तरह  था और वो बंद था।मैंने अन्दर जाना उचित नहीं समझा। मैंने बहार से एक दो फोटो ली और ऊपर वापस मुड़ गया।

ऊपर आकर मैदान में पहुँचा तो राकेश भाई भी फोटो ले चुके थे।  मैं भी दीवार के किनारे पहुँच गया और मैंने एक आध फोटो ली। अन्दर महल की हालत बेकार थी। ऐतिहासिक अवशेषों के चारों तरफ घास उगी हुई थी जो कि दिखा रही थी प्रशासन कैसे लापरवाही इस काम में बरत रहा है।






मैदान की दीवार से दिखता अन्दर का नजारा 
 मैदान के किनारे से फोटो लेने में थोड़ा वक्त गुजर गया। फिर हम लोग आगे बढ़ने लगे। नक्शे में सातवें नंबर पर छतरियाँ दिखा रहा था तो हम लोग उधर की तरफ बढ़ना चाहते थे। सीतामढ़ी महल जाने के लिए मुझे  नीचे उतरना पड़ा था और अब हम ऊपर की तरफ चढ़ने लगे। पहले हम दायें मुड़ गये। उधर एक छोटा सा संतोषी माता का मन्दिर था। उसका भी गेट बंद था। खुला होता तो भी शायद हम उधर नहीं जाते। एक ऑफिस भी था जिससे चतुर्भुज मंदिर के पीछे का हिस्सा भी दिखता था। उधर ही रास्ते के किनारे फूल भी उगे थे। सफ़ेद और हल्के गुलाबी बैंगनी रंग लिए यह फूल आकर्षक थे। उन फूलों को देखकर मुझे मेरे घर के गमलों की याद आ गई।  हमारे यहाँ भी ऐसे पौधे हैं जो कि फूल तो एक ही है लेकिन रंग कभी सफेद होता है और कभी बैंगनी। बचपन में बहुत मजा आता था यह देखने में मुझे। पापा तो गुलाब में भी ग्राफ्टिंग करते थे और एक ही गुलाब के पौधे में अलग अलग रंग के गुलाब खिलते थे जो कि बड़े ही खूबसूरत लगते थे।  यादों की कड़ियों से मैं बाहर आया और हम आगे बढ़े।

उधर कुछ लोग थे। राकेश भाई ने उनसे छतरियों के विषय में पूछा तो उन्होंने हमे निर्देश दिये। हमे बायें तरफ जाना था। निर्देश का पालन करते हुए हम बायें मुड़ गये।

अब हमे छतरियों की तरफ ही जाना था। इन्ही छतरियों के लिए ही तो हम इधर आये थे।



पीछे से दिखता चतुर्भुज मंदिर 

संतोषी माता का मंदिर

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन 

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
पहुँच गये छतरियों के निकट





कृपाराम गौर की हवेली 

छतरियों की तरफ बढ़ते हुए हमारे सामने सबसे पहले कृपाराम गौर की हवेली पड़ी।  यह एक छोटा सा दो मंजिला मकान था। गेट बंद था तो हम अंदर नहीं गये। हालत देखने से लग रहा था कि इसकी भी ज्यादा देखभाल नहीं होती है।

हमने एक दो फोटो हवेली की ली और आगे बढ़ गये। वैसे एक बात थी जो मैंने नोट करी। मैंने जितनी भी हवेली इधर देखी थी वो या तो एक मंजिले मकान थे या दो मंजिले। उसमें भी हर एक में एक एक कमरा ही था। बचपन से हवेली शब्द जब सुनता हूँ तो मन में जो चित्र उभरता है वो किसी बढ़ी कोठी का होता है। ऐसा मकान जिसमें कम से कम दो तीन मंजिल हों और दस बीस कमरे हों। वैभव और ऐश्वर्य की झलक दिखती हो।

लेकिन इन हवेलियों को देखकर मन में यह ख्याल आया है कि अगर एक या दो मंजिल में एक दो कमरों के हवेली बन सकती है तो मैं भी बूढा होने तक एक अंजान की हवेली भी बना ही दूँगा।  बड़ा मज़ा आएगा।  लोग गाँव में दूर दूर से देखने आयेंगे। मैं भी ऐसे कुछ अलौकिक किस्से उस हवेली के विषय में उड़ा दूँगा ताकि लोग उधर आयें तो उन्हें कम से कम रोमांच का अनुभव हो।  हा हा हा !!

खैर, हवेली तो बनते बनते बनेगी। अभी हम लोग आगे चलते हैं।


कृपाराम गौर की हवेली 

छतरी समूह


कृपाराम की हवेली से आगे बढे तो हमे सामने ही छतरी समूह दिख गया। बेतवा नदी बह रही थी। इधर ही एक घाट बना है। घाट का नाम कंचना घाट है जो कि मुझे उधर लिखी चेतावनियों से पता चला।  घाट के एक तरफ बेतवा का शांत पानी है और दूसरी तरफ छतरियों का समूह है। हम लोग सुबह से चल रहे थे तो घाट में पहुँचे। कुछ फोटो ली और फिर घाट में बैठ गये। काफी चल लिए थे तो इधर आराम करने लगे।  इधर ही एक बोर्ड लगा था जिससे पता चला कि यहाँ गिद्ध की संरक्षित प्रजाति पायीं जाती हैं।  बैठे बैठे ही हमे गिद्ध दिख गये। छतरियों के ऊपर ही वो बैठे थे। राकेश भाई अपना पॉइंट एंड शूट वाला कैमरा लाये थे तो उन्होंने फोटो लेनी शुरू कर दी। मैं चूँकि कैमरा नहीं लाया था तो उन्हें देख कर कुढ़ता रहा। वैसे मेरा कैमरा का ज़ूम इतना अच्छा भी नहीं है तो कैमरा लाकर भी कोई फायदा नहीं होता। थोड़ी देर कुढने के बाद मैं आस पास के वातावरण में खो गया।

शाम का वक्त था, चार बज गये थे और आस पास का माहौल शांत था। कुछ लोग घाट में चेतावनी के बावजूद नहा रहे थे। कुछ सैलानी फोटो खींच रहे थे और मैं इन अद्भुत नजारों को सोख रहा था।

थोड़ी देर बैठने के बाद मैं उठा और फोटो खींचने लगा।  उधर ही एक शिलालेख था जिस पर दर्ज था कि बेतवा नदी का यह दक्षिणी किनारा था। इधर बुंदेला राजाओं और राज परिवार के अन्य सदस्यों की 15 छतरियाँ थी। हर एक छतरी किसी न किसी राजा को समर्पित है।

 सामने ही एक छोटा सा प्रांगण था। वही पर एक सीढ़ियाँ ऊपर को जाती थी। ऊपर क्या था इसका मुझे कोई अंदाजा नहीं था। मैं उधर फोटो खींचने में व्यस्त हो गया। आस पास की फोटो खींचकर जब फ्री हुआ तो मैंने देखा राकेश भाई को नदारद पाया। जब इधर उधर देखने के बाद भी कहीं नहीं मिले तो उन्हें कॉल लगाया। उन्होंने बताया कि वो सीढ़ियों से चढ़ गये है ।


मैं सीढ़ियों की तरफ बढ़ा तो एक चीज ने बरबस ही मेरा ध्यान आकृष्ट किया। मैंने देखा कि सीढ़ियों के बगल में दीवार पर एक रोचक चीज लिखी थी। उस रास्ते का नाम मौत का रास्ता दिया हुआ था। आखिर इस रास्ते का  नाम ऐसा क्यों रखा गया होगा? मैं यही सोच रहा था। शायद उधर  कुछ  हादसा हुआ होगा तभी यह नाम होगा।मैंने अंदाजा लगाया।

लेकिन जो कुछ भी हो मुझे यह रोचक लगा। मैं राकेश भाई के पास पहुँचा। ऊपर एक समतल जमीन थी जिस पर एक छोटी सी ऐतिहासिक इमारत दिख रही थी। जमीन के इस टुकड़े में उस इमारत को छोड़ ज्यादा कुछ नही था। दो व्यक्ति ट्रेक्टर के साथ उधर मौजूद थे।  वो ट्रेक्टर चला रहे थे।

 मैंने राकेश भाई को देखा तो वो किनारे पर खड़े होकर बेतवा की फोटो उतार रहे थे। मैं उन तक पहुँचा और उनसे बोला -”आपको पता है आप किधर हो?”
“किधर?” उन्होंने कैमरे की पोजीशन सेट करते हुए कहा।
“मौत के रास्ते पर” मैंने दमकते हुए उत्तर दिया।
“क्या कहा?” उन्होंने हैरत से मुझे देखा।
"क्या आप भी? मौत का रास्ता पार करके आ गये और आपको खबर भी नहीं। कुछ हो जाता तो।" कहकर मैं खुद ही अपने बुरे जोक पर हँसने लगा।
"वो अब भी मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं कोई नमूना होऊं।" मैंने उन्हें देखा और कहा - "चलो आपको दिखाता हूँ।" कहकर मैं आगे बढ़ गया। अभी मैं ऐसा महसूस कर रहा था जैसा मैंने कोई बड़ी खोज कर दी हो और अपनी खोज को मैं सबके सामने दर्शा रहा हूँ। मैं आगे आगे चल रहा था और राकेश भाई पीछे पीछे थे।  उन्होंने फोटो ले ली थी। मैंने भी एक आध फोटो ले ली थी तो ज्यादा कुछ हमे करना नहीं था।

मैं नीचे पहुँचा और मैंने उन्हें गर्व से उन्हें अपनी दीवार दिखाई। वो उसे देखे बिना ही आगे बढ़ गये थे। वो चीज उन्हें भी रोचक लगी और हमने उसके आस पास काफी फोटो खींची। उन्होंने कहा कि वो इस तस्वीर का इस्तेमाल ग्रुप में हो रही इस प्रश्न्नोतरी में करेंगे। हमारे कुछ समूह है जिसमें हम लोग किताबों से जुड़े प्रश्न करते हैं। कई बार एक तस्वीर हिंट के तौर पर डाली जाती है और सबको उसका जवाब देना होता है। इस तस्वीर का इस्तेमाल ऐसे ही हो सकता था। फोटो खींचने के बाद हम लोग आगे बढ़ गये।

कुछ छतरियाँ घाट पर हैं और कुछ थोड़ा पीछे को हैं ।  एक बाग़ जैसा बना हुआ था जिसके अंदर कुछ छतरियाँ थीं।  हम लोग उस बगीचे तक पहुँचे और अंदर दाखिल होने लगे। उधर हमसे टिकेट माँगा गया। यह वही टिकेट था जो कि हमने ओरछा महल परिसर में लिया था। यह देखकर मुझे लगा कि पहले महल जाने का फैसला कर हमने अच्छा निर्णय लिया था। वरना फिर टिकेट के लिए चक्कर मारना पड़ता। हम अंदर दाखिल हुए। इस बगीचे का खुला रहने का भी वक्त है। शायद पाँच या छः बजे के करीब है। इस कारण भी हम अदंर चले गये थे क्योंकि गार्ड साहब ने बताया कि पहले यह देख लो फिर आस पास के चीजें देख लेना वरना यह बंद हो जायेगा। हम अंदर दाखिल हुए तो अन्दर का माहौल काफी अच्छा लगा। यह बगीचा अच्छे तरीके से रखा गया था। बहुत खूबसूरती से घास को आकार दिया है। सब कुछ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का था। जितनी निराशा मुझे बाकी के इमारतों की देखभाल देखकर हुई थी वो इसकी देखभाल देखकर थोड़ा सा ठीक हुई। इधर भी चार पाँच से ऊपर छतरियाँ था। हमने इधर फोटो खींची और पन्द्रह बीस मिनट बाद ही इधर से बाहर को निकल पड़े।

कुछ देर घूमने के बाद हम लोग बाहर निकल आये। आस पास कुछ छोटे मोटे खण्डहर थे। अब हमारा इन्हें देखने का विचार था। हम एक तरफ बढ़ गये। हम फोटो ले रहे थे। इस रास्ते में हमे गाँव वाले भी मिले जो अपने जानवरों के साथ थे। सैलानी इधर कम ही थे क्योंकि इलाका थोड़ा बीहड़ था। हम लोग आगे बढने लगे। सूरज भी अब ढलने लगा था तो हम उधर खड़े होकर सूर्यास्त का आनन्द लेने लगे।








मौत के रास्ते पर बढ़ते राकेश भाई 

बाग़ के अंदर छतरियाँ 

विभिन्न छतरियों का पनारोमा शॉट 

ढलता सूरज 



सूर्यास्त और एक अनाम खण्डहर

सूर्यअस्त होने तक हम फोटो उतारते रहे। जब सूर्यास्त हो गया और हमे लगने लगा कि और फोटो नहीं खींची जा सकती तो हम लोग वापस चलने लगे।

अब अन्धेरा होने लगा था। हम अपनी बाइक तक पहुँचे लेकिन सफ़र से पहले हमने एक चाय पीने की सोची। हम लोग फिर उसी दुकान में पहुँचे जिधर से हमने दिन में चाय पी थी। इस बार की चाय भी तगड़ी बनी थी और यह चाय पीकर आधी थकान दूर हो गई। छः से ऊपर का वक्त हो गया था।

हमने चाय खत्म की और अपनी बाइक के तरफ जाने लगे। तभी एक व्यक्ति सामने से गुजरे और उन्होंने कहा - “झाँसी जायेंगे सर?”

“नहीं हमारे पास बाइक है।” - हमने कहा और आगे बढ़ गये।

इससे ये तो पता चल गया था कि ओरछा से झाँसी के लिए यातायात मिल ही जाता है। शेयरिंग में चल रहे थे तो कीमत भी वाजिब ही होगी।

हम बाइक की तरफ गयर बाइक शुरू की। अभी तक हम लोग टी शर्ट में घूम रहे थे। अब थोड़ी ठंड लगने लगी थी। चलती बाइक में तो और भी लग रही थी। अँधेरा हो चुका था। मेरी ट्रेन दस बजे की थी। ओरछा से झाँसी पहुँचने में हमे एक डेढ़  घंटे का समय ही लगना था। हम लोगों का अगला पड़ाव राकेश भाई का होटल रूम था। अभी उधर जाकर थोड़ा आराम करना था। फिर रात का खाना और उसके बाद ट्रेन में बैठना था। झाँसी तक का सफ़र ठिठुरते हुए गुजरा। बाइक में बैठे बैठे ठंड लग रही थी। खैर,दिसम्बर का मौसम था तो ये होना स्वाभिक ही था।

इसके बाद थोड़ी देर में ही राकेश भाई के होटल के नजदीक थे। थोड़ा सा रास्ता भटके थे लेकिन फिर गूगल बाबा की सहायता से सही रास्ते पर वापिस आ गये थे।  थोड़ी देर राकेश भाई के होटल में आराम किया।  आराम कर उधर से रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ने के लिए निकले। मेरे पास सुबह से पैसे खत्म हो रखे थे तो सबसे पहले एक एटीएम ढूँढा। होटल के नजदीक ही एटीम मिल गया था। उधर से पैसे निकाले और पर्स में भरे। होटल से स्टेशन साढ़े तीन किलोमीटर दूर ही था तो आसानी से उधर पहुँच गये। वहाँ जाकर डिनर किया। और फिर चाय पी। चाय पीकर वापस आये तो एक पुलिसवाले साहब मिल गये। वो राकेश भाई को अपनी बाइक हटाने को बोलने लगे। हमने बहस करनी उचित न समझी। ट्रेन आने में कुछ ही वक्त रह गया था तो राकेश भाई से मैंने विदा ली और फिर राकेश  भाई होटल की तरफ बढ़ निकले।

मैं स्टेशन  के अन्दर दाखिल हुआ। कुछ देर के इंतजार के पश्चात ही ट्रेन आ गई और मैं उसमें चढ़ गया। मेरी साइड लोअर बर्थ थी और आस पास साधू लोग बैठे हुए थे। उन्होंने ही सीट घेरी हुई थी। मैं अपनी सीट में बैठा और पसर कर लेट गया। दिन भर की घुमक्कड़ी के बाद अब थकान आने लगी थी। मेरे पास एक पतली सी चादर थी और मैं उम्मीद कर रहा था कि ज्यादा ठंड न लगे। लेटते ही मुझे नींद आ गई थी और इस तरह एक और घुमक्कड़ी की समाप्ति हो गई थी। झाँसी और ओरछा में वैसे तो देखने के लिए अभी काफी सारी चीजें बची थी लेकिन उन्हें आराम से कभी और देखा जायेगा। वैसे एक दिन में हमने काफी कुछ देख ही लिया था। क्यों है न ?
                                                             समाप्त

झाँसी और ओरछा भ्रमण की सभी कड़ियाँ:
दिल्ली से झाँसी
झाँसी रेलवे स्टेशन से किले की ओर
झाँसी का किला और रानी महल
ओरछा किला 
ओरछा भ्रमण:मंदिर, कोठियाँ ,छतरियाँ इत्यादि 
© विकास नैनवाल 'अंजान'

15 टिप्‍पणियां:

  1. मौत का रास्ता पढ़कर जिज्ञासा जागी क्यो रखा होगा...ओरछा घुमाकर पुरानी यादों को हमने भी लेख के माध्यम से ताजा कर लिया....राकेश शर्मा भाई जब होटल में थे और अगले दिन ओरछा घूमने वाले थे तब उनसे मेरी फोन पर बात भी हुई थी सिक्किम की उनकी यात्रा के बारे में जानने के लिए...बढ़िया पोस्ट...

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    1. जी हार्दिक आभार। मेरा भी काफी समय से ओरछा देखने का विचार था। अब जाकर पूरा हुआ। सोचा मौका है तो चौका मार ही दो।

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    2. मौत का रास्ता । यहां पर आगे बेतवा नदी एक खतरनाक भंवर बनता है । इस गर्मियों में 4-5 नवयुवको की मौत हो चुकी है । दूसरी बात छतरियों के पीछे ही श्मसान घाट है ।

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    3. वाह ये जानकारी बढ़िया मिली। जानकर अच्छा लगा। जब हम उधर थे तो बेतवा में कुछ लड़के तब भी बैठे हुए थे। सब कुछ शांत था तो मन में सवाल आया कि ऐसा क्यों लिखा था। अब जिज्ञासा शांत हो गयी है।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 24/02/2019 की बुलेटिन, " भारतीय माता-पिता की कुछ बातें - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. बुलेटिन में मेरे ब्लॉग को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार,शिवम जी।

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  3. विकास नैनवाल को इतना मनमोहक फ़ोटो फ़ीचर प्रस्तुत करने पर, ओरछा के विषय में इतनी दिलचस्प जानकारी देने के लिए और हमारा दिल जीतने के लिए बहुत-बहुत बधाई !

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  4. अरे वाह..... आपने ओरछा यात्रा के बारे में बड़ी ही खूबसूरती से वर्णन किया है.... मौत के रास्ते का पता नही चला की क्यों लिखा ?? बाकी ओरछा तो मेरा पहले से ही घूमा हुआ है आपके लेख से उस अपनी यात्रा को याद करते हुए फिर से घूम लिया....बढ़िया चित्र और लेख

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    1. जी पता नहीं चला था। न जाने क्यों लिखा था। उधर कुछ खतरे की बात नहीं थी। अगली बार जाऊँगा तो पूछूँगा किसी से। ब्लॉग पर टिप्पणी करके के लिए आभार।

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  5. आपने जीडीएस ग्रुप में सूचित किया होता तो आपके सभी प्रश्नों का जवाब मिल गया होता । रामराजा मन्दिर की इमारत नई नही है । यह भी 16 वी सदी की बनी हुई है, बढ़िया रखरखाव के कारण नई लगती है । रही बात हवेलियों की तो 400 साल से रखरखाव न होने से उनकी दुर्दशा तो होनी है । ओरछा की हवेलियां भी बड़ी और भव्य रही है। बड़े महल आदि में अंग्रेजी कार्यालय होने बचे रहे । ओरछा की हर इमारत अपने आप मे इतिहास छुपाये हुए हैं, कभी मौका मिला तो सुनाएंगे....ओरछा की कहानी ।

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    1. जी हमारा प्लान एकाएक ही बनता है। सफर से आने के बाद इनके विषय में पढ़ा था। यह भी जाना कि कई रोमांचकारी किस्से इधर हुए हैं। जासूसी, कत्ल और रंजिशे भी काफी चली हैं। लेकिन वो सब तक कवर करिंगा जब उधर आराम से घूमूँगा। किसी सप्ताहंत इधर आराम से आऊंगा और आस पास का इलाका भी घूमूँगा।

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