मंगलवार, 28 अगस्त 2018

नीलकंठ महादेव ट्रेक #२ : रामझूला से नीलकंठ महादेव मंदिर और वापसी-भाग २

यह यात्रा 19 जनवरी से बीस जनवरी के बीच में करी गई


काफी देर बाद मुझे कोई खुली दुकान दिखी थी। अब गाँव वाले इलाके में दाखिल हो गया था। कुछ देर पहले एक रोमाँचक घटना भी मेरे साथ हुई थी। मैं थोड़ी देर दुकान में बैठना चाहता था।

यहाँ तक आपने पिछली कड़ी में पढ़ा। अब आगे।

 वो अकेली दूकान थी जो इस वक्त खुली थी। उन्होने मुझे देखा और नाश्ते के लिए पूछा। मेरा कुछ खाने का मन तो था नही लेकिन चाय पीने का मन जरूर हो रहा था। मैं अन्दर गया और मैंने एक चाय का आर्डर उन्हें दिया। साथ में एक पार्ले जी लाने के लिए बोला। फिर मैंने हल्की फुलकी बातें उनसे की। मैंने उनसे पूछा कि लोग नहीं आते क्या? तो उन्होने कहा- 'आप जल्दी आ गये। लोग नौ दस बजे नीचे से चलना शुरू करते हैं।'

मैं- “ओह! तभी मुझे कोई नहीं दिखा। वैसे इस रास्ते में खतरा तो नहीं है।”

वो  भाई- “अरे नहीं। नीलकंठ सबकी रक्षा करते हैं। बिलकुल सेफ है।”

मैं - “लेकिन नीचे तो लोग कह रहे थे कि जानवर वगेरह रहते हैं।”

वो भाई - “वो ऐसे ही डराते हैं। जानवर हैं लेकिन वो रस्ते में नहीं आते। उनके अपने इलाके हैं।”

मैं-”हम्म। और टैक्सी घूम के आती है क्या?”

वो - “आगे जाकर टैक्सी का स्टॉप है।”

मैं- “अच्छा।”

मैंने फिर आधा परले जी का पैकेट खत्म किया और चाय निपटाई। फिर बचे हुए पैकेट को बैग में डाला और उठ गया।

मैं - "अच्छा चलता हूँ। मंदिर होकर आता हूँ।"

वो भाई- “जाईये और होकर आइये। वापस आकर खाने के लिए इधर भी बैठिएगा।”

“जी जरूर।” मैंने कहा और आगे बढ़ गया।

अब मैं गाँव में था। इधर चहल पहल देखी जा सकती थी। रास्ते में मैंने एक डंडा उठा दिया था। जब मैं आगे बढ़ रहा था तो कुछ महिलाओं का समूह घास लाने के लिए निकल रहा था। मेरे हाथ का डंडा देखकर किसी ने उस पर टिपण्णी की कि ऐसा डंडा इसे किधर से मिल गया। मैंने तो रास्ते में मिले एक टूटे पेड़ से तोड़ा था। उस वक्त सोच यह थी कि कोई जानवर आये तो कुछ तो हाथ में हो। वो अलग बात है लँगूर महाशय को देखकर डंडे के विषय में मैं बिलकुल भूल चुका था।  पहले सोचा कि उन्हें बताऊँ मैं गढ़वाली में समझ भी लेता हूँ और बोल भी लेता हूँ लेकिन इसका भी अपना मजा है। कई बार जब लोगों  को लगता है आप उनकी बात नहीं समझ सकते तो रोचक बाते करतें है। कई चीजें पता चल जाती हैं। मैं अक्सर ऐसा करता हूँ।

खैर, मैं आगे बढ़े जा रहा था। रास्ते के नीचे कुछ खेत थे। मैंने उधर देखा तो उधर पिच तैयार हो रही थी। हम भी ऐसे ही खेतों में क्रिकेट खेला करते थे। लडके उधर इकट्ठा हो रखे थे और मैच शुरू होने वाला था। मैंने आते हुए एक बोर्ड भी देखा था जिससे अंदाजा हो गया था कि आज दो गाँव के बीच में मैच होगा। हम लोग भी ऐसे गाँव के बीच ही मैच रखा करते थे। कभी पार्ले जी के लिए मैच रख दिया और कभी खाडू(भेड़) के लिए। मैच जीतने वाले को भेड़ मिलती थी और फिर पूरी टीम उसका सेवन करती थी। लज़ीज़ मैच होता था। लेकिन इसमें अक्सर बड़े युवा हिस्सा लेते थे। हम बच्चे थे तो पार्ले जी से ही संतुष्ट होना पड़ता था। अपनी बात बताऊँ तो मैं कोई बढ़िया क्रिकेटर नहीं था और इसलिए पार्ले जी हो या खाडू मुझे कुछ भी हासिल नहीं होता था। लेकिन खेलने में मजा जरूर आता था। भले ही गालियाँ ज्यादा पड़ती हों।

एक बार की बात है हम सब लड़के क्रिकेट खेलने के लिए एक खेत में जमा हुए थे। हम लोग विकेट लगा रहे थे कि आसमान से पत्थर बरसने लगे। क्या आपको यकीन नहीं हो रहा? अरे सच बात है। आसमान साफ़ था लेकिन फिर भी पत्थर बरस रहे थे। सारे के सारे लड़के इधर उधर हो लिए। किसी के समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है। और फिर गालियाँ आनी शुरू हुई। हमने टीवी में आकाशवाणी होते हुए तो सुना था लेकिन महसूस पहली बार कर रहे थे। हम उस खेत से कूद कर दूसरे खेत में गये ही थे कि एक साथी ने ऊपर की तरफ इशारा किया। हम सबने ऊपर देखा तो पाया कि उधर एक औरत थीं और वो पत्थर और गालियाँ समान तेजी से बरसा रही थीं। हम लोग सिर पर पैर रख कर भागे। खेत उन्ही महिला का था। बात यह होती थी कि जब आप खेत में क्रिकेट खेलते थे तो खेत की जमीन कठोर हो जाती थी। उससे यह होता था कि जब बारिश होती तो उसकी ऊर्वरक परत बहकर नीचे वाले खेत में चली जाती और उस खेत में हल जो चलाता उसे काफी परेशानी का सामना करना पड़ता। लेकिन चूँकि खेत वाले निगरानी नहीं कर सकते थे तो हम ऐसे ही कभी एक खेत तो कभी दूसरे खेत घूमा करते। लेकिन कई बार उनके मन में क्या आती वो गाली देते हुए आते और हम रफूचक्कर हो जाते थे। ऐसा हमला पहली बार हमारे ऊपर हुआ था। फिर हमे अपने लायक खेत ढूँढने में कुछ वक्त लगा था और हमने चैन से अपना मैच पूरा किया था। बहुत रोमांचक दिन था वह भी।

इन्ही सब यादों में मैं कुछ देर खोया रहा। मैं सोच रहा था कि कहीं इन लड़कों पर भी पत्थरों की बारिश न होने लगे। लेकिन इधर इंतजाम तगड़ा था तो शायद सब कुछ इजाजत से हो रहा था।  मैंने एक दो फोटो लिए और फिर सोचा कि जल्दी से मन्दिर देख लूं। एक बार वो काम कर लिया तो वापिस आते हुए दो तीन बॉल देख सकूँगा। अभी वैसे भी मैच शुरू होने में वक्त लगेगा।

ऊपर गाँव को जाता रास्ता और सीधा नीलकंठ को जाता रास्ता 

मैच की तैयारी करते लड़के। कोने में जो टेबल है उसमें बैठकर कमेन्ट्री होगी 

तैयारी जोरो शोरों पर 


विकास कार्य हुआ होगा। गाँव में अक्सर ऐसा देखने को मिल जाता है 


अब  मैं आगे बढ़ गया। रास्ता सरल था। लोग भी थे। धूप भी आ चुकी थी।मैं आगे बढ़ता जा रहा था। जगह जगह दिशा निर्देश लगे हुए थे जिससे आसानी से पता चल जाता कि किधर को जाना है। रास्ते में मुझे वह जगह भी मिली जिधर टैक्सी आकर खड़ी होती है। मैं बढ़ता रहा। कुछ देर बाद मैं उन सीढियों के सामने था जहाँ से मन्दिर के लिए रास्ता जा रहा था। मैंने एक व्यक्ति से गढ़वाली में कन्फर्म किया और फिर रस्ते में बढ़ गया। मुख्य मंदिर आने से पहले भी कई छोटे मोटे मन्दिर आते हैं। एक आध नये मन्दिर तो तैयार हो रहे थे। भगवान अपने होने से काफी लोगों का भला करते हैं। यह भगवान भी जानते हैं और भक्त भी। चूँकि भक्त जानते है तो इस चीज को भुनाने में वो लोग पीछे नहीं रहते।  वही चल रहा था। खैर, मैं आगे बढ़ गया। मंदिर के निकट पहुँच चुका था। रास्ते में  एक प्राथमिक विद्यालय भी था जहाँ छात्र सुबह की प्रार्थना में खड़े थे। उधर से होकर गुजरते हुए कुछ ही देर में मैं मंदिर वाली सीढ़ियों पर था। मंदिर के गेट तक मार्ग बना हुआ था। मार्ग के इधर उधर पूजा के सामान  की दुकाने थी जहाँ पूजा में चढाने की सामग्री मिल रही थी। मैं गेट के पास आकर रुका। उधर गेट के पास आकर ही मैंने एक प्लेट ली। अलग अलग रेट थे। मैंने सौ या डेढ़ सौ वाली में से एक ली थी। फिर मैंने अपना बैग,अपनी लाठी, जूते इत्यादि  दुकान में छोड़े और अन्दर दाखिल हुआ।

पुण्डरासू का यात्री शेड

पहुँच गये। अब उतरो नीचे। 
रास्ते में पड़ता भैरव मंदिर 

आस पड़ोस की पहाड़ियाँ 

नीचे से दिखती भैरव मन्दिर की छत। कितने नीचे आ गये हम लोग। 
दूर पहाड़ी पर बना एक और मंदिर 

मंदिर जाने वाला मार्ग। पहुँच गये मुख्य गेट पर। 

अब मैं मंदिर में दाखिल हुआ। मुख्य मन्दिर जाने से पहले एक प्रांगण बना हुआ था जहाँ एक बोर्ड लगा था। वह बोर्ड मंदिर के विषय में जानकारी देता था। मैंने जानकारी पढ़ी। मुझे पहले लगता था कि इधर शिव जी ने विष का पान किया था लेकिन ऐसा नहीं था। बोर्ड के अनुसार कुछ ऐसा हुआ था :

श्रुति पुराण के अनुसार जब देव और दानवों के बीच समुद्र मंथन हुआ तो समुद्र से निकलने वाली चौदह चीजों में से एक कालकूट विष भी था। भगवान शिव ने दुनिया की रक्षा के लिए इस विष का पान किया और विष की ज्वलंता को शांत करने के लिए भगवान शिव ने पंकजा और मधुमति नदी के संगम के निकट पंचपणी नामक वृक्ष के नीचे तप किया। यह तप साठ हजार वर्षों तक चला था। तब करके जब शिवजी लौट रहे थे तो उन्होंने जन कल्याण हेतु कंठ के रूप में शिवलिंग स्थापित किया। यही शिवलिंग मंदिर में मौजूद है। 

थोड़ी देर पढ़कर मैं रुक गया। और मेरे दिमाग में यह घटनाएँ चलचित्र के भाँति चलने लगीं। समुद्र मंथन, देव दानव युद्ध, अमृत विष और शिव जी का लोगों के लिए विष का पान। सारी गाथाएं कितनी रोचक थीं। कभी आराम से इनके ऊपर सोचा जा सकता था। अभी तो हाथ में पूजा की थाली थी और वो काम निपटाना था।

अंदर भीड़ कम थी और यह मेरे लिए अच्छी बात थी। मैं अंदर दाखिल हुआ। एक बड़ा सा प्रांगण था जिसको पार करके मुख्य मंदिर जाया जाता था। नीचे पानी का धारा भी था जहाँ लोगों के नहाने की व्यवस्था भी की गई थी।मंदिर में पूजा अभी शुरू नहीं हुई और हम लोगों ने पूजा शुरू होने का इन्तजार किया। कुछ और श्रद्धालु भी उधर खड़े थे। मंदिर के मुख्य प्रांगण में भी दुकाने थी जहाँ किताबें और पूजा का सामान मिल रहा था।

थोड़ी देर के इंतजार के बाद पूजा शुरू हुई। फिर मैंने जो थाली लाई थी उसे उधर चढ़या। अंदर सामग्री चढाने के पश्चात बाहर एक शिवलिंग था उसमें भी चढ़ाने  के लिए शहद इत्यादि था जिसे अर्पित किया। उधर बंदर थे तो उनसे बचकर यह काम करना पड़ा। लेकिन यह बन्दर उन लंगूरों के जैसे नहीं थे। यह लोग आराम से पूजा खत्म होने का इन्तजार करते थे। थोड़ी देर मैं उधर रहा और फिर आगे बढ़ गया।

अभी मैं मंदिर से आगे ही बढ़ रहा था। आगे छोटे छोटे होटल थे।मेरी मंजिल पहाड़ी पर बने हुए कुछ और मंदिर देखने की थी। मैं नंगे पांव ही था और ऐसे उन मन्दिरों तक गया और फिर उधर होकर वापस आ गया। मंदिरों के आसपास कोई नहीं था तो कोई परेशानी मुझे नहीं हुई। अभी खाने का मन नहीं कर रहा था। नीलकंठ की ट्रेक करने का मन जाने कबसे था और अब मैं वो पूरी कर चुका था।

अब मैं वापस जाने को हुआ। मंदिर के बाहरी प्रांगण में रुका और उधर मौजूद शिलालेख को दोबारा पढकर  उसकी फोटो ली।फिर बाहर आकर दुकान से अपना सामान लिया और वापसी के रास्ते पर बढ़ चला।

नीलकंठ महादेव मंदिर 

मंदिर के प्रांगण में दुकान के बाहर लेफ्टिनेंट दिनेश सजवान की याद में बनाया गया स्म्रितिलेख। सजवान जी जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। उनको नमन 

सन्तोशी माता का मंदिर 

आसपास मौजूद दूसरे मंदिर 
मंदिर के द्वार के निकट लगे शिलालेख जो मंदिर के विषय में बतलाते हैं 

शिलालेख


गर्मी काफी हो चुकी थी। जब मैं आया था तो हुड पहन रखा था। अब मैं चलने लगा तो गर्मी होने लगी। मैंने हुड उतार दिया। अभी ऊपर सड़क तक पहुँचने के लिए थोड़ी चढ़ाई चढ़नी थी। चलते चलते मैं ऊपर पहुँचा। फिर वापसी के रास्ते में बढ़ चला। रास्ता आसान था बस गर्मी हो रही थी।मैं सोच रहा था कि कहाँ आज सुबह जब मैं बस से उतरा था तो ठंड के कारण हाथ आपस में घिसने पड़ रहे थे और अब गर्मी से पसीने आ रहे हैं।

चलते चलते मैं उस स्थान तक पहुँचा जहाँ मैच की तैयारी चल रही थी। उधर अब मैच चालू हो गया था। कमेंट्री चल रही थी और लोग बैठकर मैच का आनन्द उठा रहे थे। मैंने कुछ तस्वीरें उतारीं और दो चार बॉल्स देखी। फिर ओवर खत्म हुआ तो मैं आगे बढ़ गया। आगे जाकर मैं उसी दुकान में बैठा जहाँ पहले बैठा था।
मुझे आता देख दुकान वाले भाई ने कहा-"आओ, भाई जी। देख आये मंदिर।"
मैं - "जी। देख आया। अभी तक दूसरे लोग नहीं आ रहे।"
दुकानदार- " आजकल कम ही आते हैं और क्योंकि ठंड है तो देर में आते हैं। आपके लिए खाना लगा दूँ।"
मैं-"नहीं। भूख नहीं लगी है। आप ऐसा कीजिये एक चाय कर दीजिए। मीठा कम डालना।"
"ठीक है भाई जी।" कहकर दुकानदार साहब तो चाय बनाने में तल्लीन हो गए और मैं अपने फोन में व्यस्त हो गया। सिग्नल आ ही रहे थे तो थोड़ा सोशल हो रहा था। तकीनीक की दुनिया में ऐसे ही फोन पर सोशल हुआ जाता है।

फिर वो चाय  बनाने चले गये। चाय बनाने के दौरान उनके दुकान में एक वहीं का स्थानीय व्यक्ति आया। उनके बीच बातचीत हो रही थी और उन्होंने एक रोचक किस्सा सुनाया। किस्सा मुझे पसंद आया। अगर इधर उसे लिखूंगा तो यह लम्बी पोस्ट और लम्बी हो जायेगी तो मैंने सोचा है कि उसे एक लघुकथा के रूप में लिखकर अलग से पोस्ट करूंगा।

आप इस किस्से को निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं।
खुरचन
मैंने इसे खुरचन  नाम दिया था।

किस्सा सुनते हुए मैंने दूसरी बार  की चाय भी मंगवाई। किस्सा रोचक था। दूसरी चाय खत्म करते करते किस्सा भी खत्म हो चुका था। दुकानदार वो भाई और मैं तीनों ही हंस रहे थे।मैंने पैसे अदा किये और जब उस दुकान से निकला तो मेरे चेहरे पर मुस्कराहट थी। दुकान से रह रह कर हंसी के फुहारे छूट रहे थे।

अब मैं आगे बढ़ने लगा। मुझे नीचे ही उतरना था जो कि कदरन सरल रहता है। मैं चल रहा था कि मुझे दो तीन गाँव की औरतें आती दिखीं। वो घास लेकर आ रही थीं। उन्होंने मेरे हाथ में डंडा देखा तो आपस में उससे जुडी कुछ बात करी। पहले मिली औरतों के तरह उन्हें भी हैरानी थी। एक बार को तो मन किया कि उन्हें  यह डंडा दे दूँ। वैसे भी मैंने इसे फेंक ही देना था। इधर इनके काम आ जाता। लेकिन फिर लँगूर का ख्याल आया तो सोचा कि फैंटम बनने से कोई फायदा नहीं। जंगल के बीच से होकर गुजरना है और इसलिए कुछ साथ में होना जरूरी है।

मैं नीचे उतरने लगा। बीच बीच में मुझे डर भी लग रहा था। लंगूरों के समूह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर चहलकदमी कर रहे थे। जैसे ही वो एक पेड़ से दूसरे की तरफ कूदते मैं रुक सा जाता। बस यही उम्मीद कर रहा था कि सुबह की तरह कोई रास्ते के बीच में न आ जाए। मेरे पास थोड़ा प्रसाद भी था तो क्या पता उसकी ही गंध उसे मिल जाये। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लँगूरों का एक पेड़ से दूसरे पर कूदना तो जारी रहा लेकिन जमीन पर उनके कदम नहीं ही पड़े। मैं जल्द से जल्द उस इलाके से बाहर आना चाहता था। ऐसे ही मैंने वो एरिया भी पार कर लिया जहाँ मुझे लँगूर मिले थे।

उधर से आगे बढ़ा ही था कि मुझे तीन चार लड़को का समूह मिला। ये पहले पर्यटक थे जो दिखे थे।उन्होने मुझसे पूछा -

“भोले! कितना दूर है अभी मन्दिर?”

“बस थोड़े दूर और। आधे घंटे में पहुँच जाओगे”

यह बात सुनकर उनमे से एक दूसरे को बोला-”देख, हम सही रस्ते पर हैं। और तू वापस चलने को बोल रहा था।"

फिर वो आगे बढ़ गये और मैं नीचे की ओर चल पड़ा। ऐसे एक दो पर्यटकों के समूह मुझे मिले। अब रास्ते में दुकानदार भी आने लगे थे। कुछ ने सामान लगा दिया था और कुछ लगा रहे थे। मैं बढ़ते जा रहा था। लोगों के दिखने से मुझे वैसा डर का अनुभव नहीं हो रहा था जैसा सुबह था। अगर कहीं कुछ खड़खड़ाहट सुनाई दे जाती तो मैं उस पर उतना ध्यान नहीं देता क्योंकि पता था कि आगे पीछे लोग(पर्यटक या दुकानदार) कोई न कोई तो होगा ही।

यही सोचकर मैं उतरता रहा और आखिर उन बुजुर्ग की दुकान में पहुँच गया जिन्हें सुबह मिला था। हमने गढ़वाली में बात की। उन्होंने अपने पास बैठे एक सज्जन को बताया कि मैं गढ़वाली हूँ। फिर उन्होंने मुझे बताया कि वो सामान समेट रहे थे और कुछ ही देर में चले जायेंगे। मैंने उनसे मौनी बाबा के विषय में पूछा तो उन्होंने कहा कि वो आराम कर रहे हैं।मैंने चैन की सांस ली और कहा कि फिर मैं निकलता हूँ। उन्हें क्यों डिस्टर्ब करूं। उनसे मैंने विदा ली और आगे बढ़ गया।

अब मैं पैदल चल रहा था। कुछ ही देर में मैं राम झूला वाले रास्ते में था। मैं जब गुडगाँव से चला था तो मैंने पढ़ा था कि इधर कोई भारत माता का मंदिर  भी है। सुना था वो मन्दिर भारत माता को समर्पित है। मैंने गूगल में उसके विषय में ढूढने की कोशिश करी लेकिन जिधर का पता वो दिखा रहा था उधर कोई दूसरी ही चीज थी। बाद में गूगल किया तो पता लगा कि जिस मंदिर की तलाश मुझे थी वो हरिद्वार में था। ऋषिकेश में भरत मंदिर था जो कि दूर था। इधर गूगल मैप जाने क्या दर्शा रहा था।
चलो वापिस। 

फील्डिंग ढीली न हो। 





मुझे ऋषिकेश से अब देहरादून को जाना था। मैं चल भी काफी लिया था तो मैंने सोचा क्यों न अब फ़ालतू इधर उधर जाने से कोई फायदा नहीं था। सीधे देहरादून के लिए निकलता हूँ। उधर दोस्तों से भी मिलना था। यह बात सोचकर मैं आगे बढ़ गया और राम झूला पार करके मुख्य सड़क तक आ गया। पहले मैंने सोचा कि क्यों न पैदल ही स्टेशन तक चलूँ। आखिर आया भी तो पैदल ही था। यह सोचकर मैं बढ़ने लगा लेकिन सुबह की बात कुछ और थी। अब धूप अपने चरम पर थी और मैं एक लम्बी ट्रेक करके वापस आ रहा था। मुझे थकान सी लगने लगी तो मैने एक आते हुए विक्रम को रोका और उसे बस स्टेशन के लिए पूछा। उन्होंने बताया कि वो एक जगह मुझे उतार देंगे जहाँ से स्टेशन पास ही था।मैंने हामी भरी और बैठ गया। दस पन्द्रह मिनट के सफर में मुझे उन्होंने एक जगह उतार दिया और बोला कि वो सामने मैदान क्रॉस कर लो आप स्टेशन पहुँच जाओगे। जगह का नाम क्या था यह अब मुझे याद नहीं। बस यह याद आया कि सुबह उधर से निकला तो था मैं लेकिन इस रास्ते  आने के बजाय दूसरे रास्ते से  रामझूला  गया था। मैं उनके बताये रस्ते पर बढ़ा और कुछ ही देर में स्टेशन पर था।

बाहर प्राइवेट गाड़ियाँ खड़ी थी जो कि ऋषिकेश से देहरादून जा रही थीं। जब मुझे रोडवेज का अता पता नहीं लगा तो मैंने  उनमें जाने का मन बनाया। उन गाड़ियों ने  परेड ग्राउंड जाना था। एक गाड़ी चलने को तैयार थी और मैं उसमें चढ़ गया। सीट तो भरी थी लेकिन मैं एक जगह खड़ा हो गया और सोचा कि अब किताब पढूँगा। लेकिन जब बस चलनी शुरू हुई तो किताब पढ़ने की इच्छा मुझे मारनी पड़ी।

ड्राईवर साहब बस ऐसे चला रहे थे जैसे हैरी पॉटर की नाइट बस हो। बस इधर से उधर झोंक खा रही थी।  साथ में लोग भी झोंक खाने लगे थे। मैंने अपने दोनों हाथों से ऊपर मौजूद पाइप को पकड़ा हुआ था और किसी तरह खुद को गिरने से बचा रहा था। कुछ देर में कुछ अधायापिकाओं का समूह बस में चढ़ा। उनमे से एक मैडम ने एक हाथ में पर्स ले रखा था और दूसरे से बिना जोर के सीट के ऊपर बना हैंडल के पीछे बना हैंडल पकड़ रखा था। उनकी हाइट छोटी थी तो वो ऊपर का हैंडल नहीं पकड़ सकती थीं। मैंने उन्हें बोला कि वो दोनों हाथों से हैंडल पकड लें । लेकिन उन्होंने अपने हाथ में मोजूद पर्स दर्शाते हुए कहा कि नहीं पकड सकती। फिर मैंने कुछ नहीं बोला।बस जैसे चल रही थी वैसे चलने लगी और एक बार उसने ऐसा झोंक खाया कि मैडम का संतुलन बिगड़ सा गया और वो सीट से टकराते टकराते बची। फिर उन्होंने झेंपते हुए पर्स को अपने बैग में डाला और दोनों हाथों से हैंडल पकड़े रहीं। अच्छा हुआ कि ज्यादा चोट नहीं आई। लगता था ऐसे ऐसे ही झोंक लेते हुए मुझे देहरादून पहुंचना पड़ेगा। वैसे ही शरीर थका था और इस बस के चक्कर में और थकावट होने लगी थी। लेकिन फिर किस्मत से मुझे सीट मिल गई और मैं बैठ गया। मुझे कॉलेज के दिन याद आ गये कि कैसे कॉलेज से घर जाते हुए बड़ी हसरत से हम सीट को देखा करते थे और यह सोचा करते थे कि कब यह खाली हो और कब हम उसे हथियाएँ। इसी याद ने मेरे चेहरे पर थोड़ी मुस्कराहट ला दी।

शाम पांच बजे करीब मैं परेड ग्राउंड पर था। अब दोस्तों से मिलना था। एक को कॉल किया तो वो बिजी था। फिर एक से मिला। साथ डिनर किया। पूरा दिन एक पार्ले जी खाकर गुजारा किया था और अब खाना अच्छा लग रहा था। फिर मुझे आईएसबीटी  तक छोड़ा गया। इधर से मुझे गुडगाँव के लिए गाड़ी मिल जाती। दस बजे गाड़ी का वक्त था। वक्त होने वाला था। पहले मैंने सोचा था कि आईएसबीटी  में मौजूद किताबो के स्टाल से कुछ किताबें लूँगा लेकिन फिर चूंकि पैसे निकालने का मौका नहीं मिला तो  नहीं लिया। वैसे भी थकान इतनी हो चुकी थी कि अब कुछ पढ़ा जाना मुमकिन नहीं था। जिस दोस्त का फोन नहीं लग रहा था उससे भी बात हो गई थी। उन्हें भी दिल्ली जाना था तो वो भी आईएसबीटी में मिलने वाले थे। पौने दस के करीब वो आये। थोड़ी देर उनसे मिला और फिर गाड़ी में बैठ गया।

नीलकंठ का सफ़र आखिर खत्म हो गया था। इस ट्रेक की तम्मना कई महीनों से थी और आखिर पूरी हो गई। एक अजीब सी शांति का अनुभव कर रहा था। कुछ देर में बस चल पड़ी। मैंने मम्मी को फोन किया और उन्हें सारे किस्सों से अवगत करवाया। लँगूर वाले किस्से को सुनकर वो खूब हँसी। फिर फोन काटा। कंडक्टर साहब ने टिकेट काटा। फिर कुछ देर बाद मैं सो गया।

बीच में गाड़ी खतौली रुकी थी लेकिन मैं उठा नहीं और सीधा दिल्ली आने पर ही उठा। इफ्को चौक में उतरा और अपने रूम की तरफ बढ़ गया। सुबह के साढ़े चार हो रहे थे । मैं नहाया और फिर अपने बिस्तर पर सो गया। आज सन्डे था और मुझे नींद आ रही थी। उठकर कोई नई ट्रिप प्लान करता। लेकिन फिलहाल अभी तो आराम करना था।

नीलकंठ यात्रा के सभी लिंक:
नीलकण्ठ ट्रेक #१ : दिल्ली से रामझूला
नीलकंठ महादेव ट्रेक #२ : रामझूला से नीलकंठ महादेव मंदिर और वापसी-भाग १
नीलकंठ महादेव ट्रेक #२ : रामझूला से नीलकंठ महादेव मंदिर और वापसी-भाग २

फिर मिलेंगे। किसी नई जगह के सफ़र के साथ। तब तक के लिए पढ़ते रहिये,घूमते रहिये।

#रीड_ट्रेवल_रिपीट,#फक्कड़_घुमक्कड़
                                                                       समाप्त

© विकास नैनवाल 'अंजान' 

5 टिप्‍पणियां:

  1. विकास जी ये भाग भी पढ़ लिया। बहुत अच्छा लगा। हम भी नीलकंठ जाने की दो-तीन साल से सोच रहे हैं, पर जा नहीं पाए हैं आज तक। देखिए कब जाना होता है। आपके विवरण को पढ़कर राहत महसूस हुई है कि शनिवार रात को दिल्ली से चलकर सोमवार सुबह तक वापस आया जा सकता है बिना छुट्टी लिए अपना नीलकंठ का सफर पूरा हो सकता है। बहुत ही मार्गदर्शन मिला आपके इस तीनों पोस्ट से बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

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    1. सर, आप शनिवार रात को चलेंगे तो आराम से आ जायेंगे। आपके वृत्तांत का इन्तजार रहेगा।

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