सोमवार, 21 अगस्त 2017

कानपूर मीट #4

शनिवार 8 जुलाई 2017

इस यात्रा संस्मरण को शुरुआत से पढने के लिए इधर क्लिक करें।

नाना राव पेशवा पार्क के सामने सभी लोग। बायें से अंकुर भाई,अल्मास भाई, राजीव जी ,राघव जी, भारती जी ,पुनीत भाई ,नवल जी और योगी भाई 

एक चालीस का वक्त हो गया था और अब हम घाट घूम चुके थे। इस विषय में आप पिछली कड़ी में पढ़ चुके हैं। अगर आपने नहीं पढ़ा है तो आप इधर जाकर पढ़ सकते हैं। हम लोग गाड़ी में बैठ गये थे और अब दूसरे स्थलों पर जाने की तैयारी थी।

जब पुनीत भैया से पुछा कि अगला पड़ाव कौन सा होगा तो उन्होंने कहा एक साईं मंदिर है, सुधांशु महाराज का आश्रम है और आखिर में गंगा बैराज घूमेंगे। मैं घूमने के लिए निकलता हूँ तो मंदिर अक्सर कम ही जाता हूँ। अगर मंदिर की वास्तुकला में कुछ विशिष्ट बात हो तो देख आता हूँ वरना अगर मंदिर साधारण है तो मुझे उसे देखने की इतनी उत्सुकता नहीं रहती है। सुधांशु महाराज के आश्रम के प्रति भी मैं मन में उत्सुकता नहीं जगा पा रहा था। हाँ, गंगा बैराज देखने की उत्सुकता मन में थी। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि मैंने 'गैराज' तो सुना था लेकिन बैराज शब्द से पहली बार रूबरू हुआ था। क्या होता होगा ये बैराज? ये प्रश्न मन में उठ रहा था लेकिन मैंने सोचा था कि जब देखेंगे तो पता चल ही जायेगा। क्योंकि गंगा बैराज था तो पानी तो होगा ही इस बात की मुझे पूरी उम्मीद थी।

हमारी गाड़ी घाट से निकल रही थी और मुख्य सड़क की तरफ आ रही थी कि पुनीत भाई ने बोला कि इधर एक किला भी है। किला का नाम सुनकर मेरे कान खड़े हो गये। मैंने पुनीत भाई को कहा कि किला तो देखना बनता है। अल्मास भाई ने एक बार कहा कि छोड़ो किला क्या देखना लेकिन बाकी लोग भी अब किले को देखने को उत्सुक थे। और ये बात सही भी थी कि क्योंकि जब आये थे तो होटल में बैठने तो नहीं आये थे और फिर एक दो जगह घूमने में क्या दिक्कत थी। ऊपर से मेरे मन में ये भी विचार आ रहा था कि अगर ज्यादा देर हुई तो मंदिर और आश्रम जाने की योजना को कैंसिल किया जा सकता है। हमारी गाड़ी आगे बढ़ गयी थी। हमको किले की ओर जाने के लिए गाड़ी वापस मोड़नी थी। सड़क संकरी थी तो ड्राईवर साहब ने गाड़ी थोड़े आगे बढ़ाई और एक जगह रास्ता देखकर गाड़ी मोड़ ली और किले की तरफ ले ली। इसी दौरान दूसरी गाड़ी से संपर्क करके उन्हें भी किले की तरफ आने के लिए बोल दिया।

अब हम लोग किले की तरफ बढ़ रहे थे और दस पन्द्रह मिनट के बाद ही किले के सामने मौजूद थे। उधर जाकर पता चला इसका नाम नाना राव पेशवा स्मारक पार्क है। दूसरी गाड़ी भी थोड़ी ही देर में आ गयी और हम लोग इस पार्क को देखने के लिए चल दिए। अभी लगभग दो बज रहे थे। आइये इस पार्क के विषय में कुछ बातें पहले जान लें :


  1. आज़ादी से पहले इसे मेमोरियल वेल्ल(memorial well) कहा जाता था। इधर १८५७ की क्रांति में नाना राव पेशवा की फ़ौज ने लगभग 200 अंग्रेज औरतों  और बच्चों को मार डाला था। उन्ही की याद में इसे बनाया गया था। 
  2. इस स्मारक के निर्माण के लिए उस वक्त कानपुर के लोगों को तीस हज़ार पौंड की रक्म अदा करनी पड़ी थी। ये सज़ा इसीलिए दी गयी थी क्योंकि वो उन औरतों और बच्चो की जान की रक्षा नहीं कर पाए थे 
  3. आज़ादी के बाद इस मेमोरियल को तोड़ दिया गया और इसका नाम बदल कर नाना राव पेशवा पार्क कर दिया गया।(स्रोत: , : वैसे उधर कुएँ के आगे एक बोर्ड था जिसमे कुछ और ही दास्तान लिखी है। उस बोर्ड की तस्वीर आप नीचे देख सकते हैं।   ) 

हम पार्क की तरफ बढे तो एक बड़े से गेट ने हमारा स्वागत किया। ये गेट किले के द्वार जैसा विशालकाय था। गेट के अगल बगल जैसी दीवारें थी वो भी किले की ही तरह थीं।  शायद यही कारण था कि स्थानीय लोग इसे पार्क की जगह किला कहते थे। क्योंकि अन्दर जाने पर हमे कुछ किले जैसा इसमें नहीं दिखा। हाँ, बहुत बड़ा पार्क जरूर था।

हमने सबसे पहले इसके सामने कुछ तसवीरें खिंचवाई। इसके बाद किले के तरफ बढ़ते हुए बायें तरफ एक 1880 की एक तोप रखी थी जिसने सबका ध्यान आकर्षित किया और सारे सुमोपाई बच्चे के समान इस तोप के साथ फोटो खिंचावाने के लिए लालायित दिखने लगे। बारी बारी कई फोटो उस तोप के साथ खीचे गये। एक बार तो  शैलेश जी ने फोटो खींचने के चक्कर में वहाँ पर रखा गमला भी लुड़का दिया था। पार्क के सामने गार्ड लोग थे। जैसे ही गमला गिरा मैंने उधर अपनी नज़र घुमाई। सोचा वो कुछ कहेंगे या सीटी द्वारा अपनी नाराजगी जाहिर करेंगे। दिल्ली में कुतब मीनार में घूमते हुए सीटी वाले गार्ड भाइयों को मैं देख चुका था। लेकिन न कोई सीटी बजी न उन्होंने इस तरफ ध्यान दिया। शैलेश जी ने भी आराम से गमला सीधा किया और फोटो खींच डाली। ऐसे ही उस तोप के साथ ससम्मान कई फोटो खीची गयी। वैसे हैरत वाली बात ये थी कि हमको छोड़कर कोई भी उस तोप के तरफ तरजीह नहीं दे रहा था। उधर पाँच छः मिनट फोटो खिंचवाने के बाद हम लोग गेट के अन्दर दाखिल हुए।

सारे सदस्य ऊपर वाले ही हैं बस मैं एक्स्ट्रा ऐड हो गया हूँ। फोटो योगी भाई ने खींची 

किले के बाहर रखी १८८० की तोप 
तोप के सामने सारे 

किले के अन्दर जाने के लिए शायद मामूली शुल्क था। इधर शायद इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मुझे इसका कुछ पता नहीं चला। एस एम पी मीट में ऐसे खर्चों की जिम्मेदारी  अक्सर होस्ट के ऊपर रहती  है और इस बार ये काम पुनीत भाई और अंकुर भाई ने किया था इसलिए अगर टिकेट कुछ रहा भी होगा तो उन्होंने ही लिया होगा। वैसे मैंने पुनीत भैया से पूछा तो उन्होंने कहा था कि शायद 20 रूपये के करीब था। अब उन्होंने भी शायद लगाया तो मैंने भी शायद ही लगा दिया। समूह में घूमने की एक दिक्कत मुझे यही लगती है। आपको कुछ पता ही नहीं चलता। जैसे न मुझे टिकेट का पता चला। न ये पता चला कि कानपुर में जितनी भी जगह देखीं उन्हें अगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट से देखना हो तो क्या करना होगा? इसे वैसे होस्ट की कामयाबी के तौर पर भी देखा जाना चाहिए क्योंकि सब कुछ इतना स्मूथली हो गया था कि हमे कुछ सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। पुनीत भाई और अंकुर भाई को इसके लिए धन्यवाद। खैर, वापस वृत्तांत पर आते हैं। किले के बगल में ही एक संग्राहलय था। लेकिन हमें प्यास लगी थी तो पहले हम पार्क में मौजूद कैंटीन की तरफ बढ़ गये ताकि पानी पी सके।

कैंटीन के बगल में ही एक छोटा सा पार्क था जिसमे झूले थे। उन झूले को देखकर कुछ सुमोपाई अपने पे काबू न रख सके और झूले झूलने लगे। भले ही उधर ये लिखा था कि ये झूले बच्चों के लिए हैं लेकिन दिल तो बच्चा होता है न जी इसलिए झूले झूले गये। थोड़े देर तक ये प्रोग्राम चला। उसके बाद हम लोग कैंटीन की तरफ बढे। कैंटीन में पानी लिया। फिर पानी का बिल देने की बारी आई तो कैंटीन वाले एमआरपी से ज्यादा पैसे चार्ज करने लगे।उनसे इस बात पर थोडा बहस हुई। पैसे तो दे दिए लेकिन उनके मेनेजर से बात करने के लिए कहा जो कि नदारद था। लेकिन क्रान्ति का बिगुल तो बज चुका था। हमारे साथ एक दो और ग्राहकों ने भी इस ओवर प्राइसिंग के ऊपर नाराजगी जताई। इस क्रांति का बिगुल राजीव सिंह जी ने बजाया। नाना राव पेशवा पार्क १८५७ में हुई क्रान्ति के लिए ही प्रसिद्ध है और एक और क्रांति उधर हो रही थी। क्या संयोग था ? थोड़ी देर हमने बहस की लेकिन कुछ फर्क नहीं दिख रहा था। ऐसे ही थोड़े देर उधर रुके और फिर कुछ न होता देखकर पार्क में घूमने निकल गये। हम अपना मूड भी खराब नहीं करना चाहते थे।

कैंटीन की ओर से दिखता स्मारक 

पार्क में झूलते अल्मास भाई और पुनीत भाई 

बहस के दौरान संजीदा मुद्रा में राजीव सिंह जी और मजाकिया मूड में योगी भाई। साथ में पुनीत भाई,अंकुर भाई और नवल जी भी हैं। 

पार्क में नाना राव पेशवा जी कि बड़ी सी मूर्ती बना रखी है।मूर्ती के नीचे ही उनका संक्षिप्त जीवन परिचय दिया गया है। ये स्मारक उनके ही नाम पर  है। उसके आगे ही एक सेल्फी पॉइंट भी बना है जो कि शायद पार्क में नया ऐडीशन है। जब से सेल्फी का चलन शुरू हुआ है, तब से पर्यटक स्थलों में ऐसे सेल्फी स्टेशन बनने लगे हैं। मुझे तो व्यक्तिगत रूप से इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि न मुझे सेल्फी का शौक है और सच बताऊँ तो मुझे सेल्फी खींचनी तक नहीं आती है। खैर, स्मारक तक चढ़ने के लिए सीढियाँ थी जिन्हें पार करके मूर्ती तक जाया जाता था। फोटो ग्राफी के लिए अच्छा माहौल था तो  उधर ही काफी फोटोग्राफी की गयी। हमारे इलावा भी और भी कई लोग उधर फोटो खिंचवा रहे थे।
पार्क का एक हिस्सा 

पेशवा जी के स्मारक की तरफ से दिखता बाहर का गेट 

पेशवा जी की मूर्ती के सामने खड़े साथी। राघव जी, भारती जी ,राजीव सिंह जी , योगी भाई, अंकुर जी। साथ में सेल्फी लेते पुनीत भाई। 
नाना राव पेशवा जी की मूर्ती। नीचे उनका संक्षिप्त जीवन परिचय भी दिया गया है। 

नाना राव पार्क काफी बढ़ा है। स्मारक तो आधे रास्ते में ही पड़ जाता है। उस स्मारक के पीछे भी पार्क का काफी बड़ा हिस्सा था। मैं ज्यादा फोटो नहीं खींच पाता और फोटो खिंचवाने में भी मुझे एक वक्त के बाद ऊब होने लगती है इसलिए मैं बोर होने लगा था। ऐसे  में भारती जी ने मुझे कहा कि उधर चलोगे तो मैंने कहा ठीक है और हम उधर की साइड निकल पड़े। पार्क में पेड़ पौधे थे और माहौल खुशनुमा था। पार्क में रास्ते बने हुए थे।  इन्ही रास्तों में चलकर हम  तात्या टोपे जी की एक अर्ध प्रतिमा के तरफ पहुंचे। प्रतिमा के नीचे  उनका संक्षिप्त जीवन परिचय था। आगे बढे तो कुछ ही दूर पर एक छोटी सी झील थी। ये सब कृत्रिम था। इसी झील में कुछ नावें थी जिसमे बोटिंग कर सकते थे। ये झील पार्क के एक हिस्से से दूसरे हिस्से की तरफ बनाई गयी थी। पार्क में एक जगह उस झील को पार करने के लिए एक छोटा सा खूबसूरत लकड़ी का पुल भी था। पार्क के इस हिस्से में काफी लोग थे। कुछ प्रेमी जोड़े थे तो कुछ परिवार के साथ इधर के शांत माहौल का लुत्फ़ उठा रहे थे। इधर घूमने फिरने का अपना अलग मज़ा था। कुछ ही देर में बाकी सारे एस एम पियंस भी उधर आ गये थे तो हमने उस पुल के ऊपर भी थोड़ी फोटो खींची। फिर हम वापस जाने के लिए मुड़ गये।
तात्या टोपे जी की अर्ध प्रतिमा 

झील की तरफ जाता रास्ता 

पार्क में मौजूद झील 

पुल के ऊपर खड़े भारती जी, राजीव सिंह जी और पुनीत भाई 

वापस जाते समय हमे योग और ध्यान केंद्र भी दिखा। एक बिल्डिंग थी जिसके बगल में एक कुआँ था। उस कुएँ का उपयोग १८५७ के क्रांति में हुआ था। हम उधर भी गये। कुएँ तो बंद करके रखा हुआ था। इस कुएं के विषय में एक बोर्ड लगा था जिसमे लिखा था कि ब्रिटिशरों से बचने के लिए इसमें कई महिलाओं और बच्चों ने जान दे दी थी। विकी में इसके उलट लिखा है जिसके विषय में मैं ऊपर लिख चुका हूँ। दो अलग अलग बातें हैं। कौन सी सही और कौन सी गलत? अगर आपको आईडिया है तो जरूर कमेंट कीजियेगा। वैसे कमेंट भावना में बहकर न कीजियेगा।

उधर थोडा वक्त बिताने के बाद हम बाहर की तरफ बढ़ गये। जब बाहर जा रहे थे तो पुनीत भाई ने कहा कि वो पहली बार इधर आ रहे थे। मैंने कहा ऐसा अक्सर होता है। जहाँ हम रहते हैं उधर ही कम घूमने जाते है। मैं भी दिल्ली में रहते हुए उधर इतना नहीं घूमा हूँ लेकिन इस कमी को धीरे धीरे पूरा पर रहा हूँ। हम अब बाहर की ओर जा रहे थे। देखने के लिए अब संग्राहलय ही बचा था।

पार्क में मौजूद एक और इमारत। इधर शायद योग और ध्यान केंद्र भी था। 

कुएँ के विषय में बताता बोर्ड। इसमें विकी से बिलकुल उलटा लिखा है। अब सच क्या है कौन जाने ??

कुआँ 



अब चूँकि संग्राहलय गेट के नज़दीक ही था तो सोचा जाने से पहले उसे भी देख लिया जाए। संग्रहालय में जाने से पहले आपको अपने जूते वगेरह बाहर ही रैक में रखने होते हैं। ये मेरे लिए नया अनुभव था। मैं कुछ संग्राहलय में गया हूँ लेकिन आज तक ऐसी व्यवस्था कहीं नहीं देखी थी।  हम सबने जूते निकले और संग्राहलय में दाखिल हुए। इस संग्राहलय में कई वस्तुएं थी। गांधी जी से जुडी कुछ वस्तुएं। कुछ पुराने हथियार। कुछ पुरानी चिट्ठियाँ। १८५७ से जुडी हुई कुछ यादें। कई स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े लोगों के नाम की गैलरी थी जिसमे उनसे जुड़े कागजात थे। हमने कुछ देर इन्हे देखा। उधर शायद फोटो खींचने की मनाही थी। उधर बैठे एक गार्ड साहब से मैंने तस्वीर के लिए पुछा तो उन्होंने कहा इधर इसकी अनुमति नहीं है। मैंने कहा लिखा तो कहीं नहीं है लेकिन उन्होने कहा उधर देखो उधर लिखा है। मैंने उधर देखा तो उधर कुछ भी नहीं दिखा मुझे। लेकिन फिर मैंने कोई फोटो वगैरह नहीं ली। हाँ, कुछ साथियों ने  पहले ही कुछ फोटो ले ली थी तो वो ही आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा। हमने चीजों को देखा और उनके विषय में पढ़ा। संग्राहलय ज्यादा बड़ा नहीं था तो दस बारह मिनट में ही सब देख लिया था। इधर थोडा वक्त बिताने के बाद हम बाहर को आ गये।

कानपुर के नामों को दर्शाता बोर्ड। किनते बदलावों के बाद कैसे कानपुर अपने आज के नाम तक पहुंचा। 

गणेश शंकर विद्यार्थी से जुडी चीजें। 

मौलाना हसरत मोहानी से जुडी चीजें 

हथियारों के साथ सेल्फी खींचते राघव भाई  



बाहर सब इकठ्ठा हो गए थे। यहाँ एक मजेदार वाक्या हुआ। हम सब तो आ गये थे लेकिन हममे से दो लोग गायब थे। आपस में पूछने पर पता चला कि वे दोनों टॉयलेट करने गये हैं। इनमे एक को नवल जी थे और दूसरे व्यक्ति योगी भाई थे । अब हम लोग इतना इंतजार करने लगे। पाँच मिनट गुजरे, दस मिनट गुजरे,पन्द्रह मिनट गुजरे। ऐसे ही वक्त बीत रहा था। पहले तो हम आपस में मज़ाक कर रहे थे कि ऐसी क्या टॉयलेट है जो इतने देर तक ही खत्म नहीं हुई है। फिर टॉयलेट में क्या हो रहा होगा इसके कयास लगाकर मजाकिया सीन एक दूसरे को सुनाने लगे। काफी देर हो गयी तो हम थोड़ा परेशान हो चुके थे। अब सोचा कि उन्हें फोन मिलाया जाए। फोन मिलाया तो हमे ही झटका लगा। वे लोग तो पहले से ही गाड़ी के अन्दर बैठे हुए थे। और हम बेवकूफों की तरह उनकी राह तक रहे थे।हमारे फोन करने पर वो गाडी से बाहर निकले। अब हम ही लोग अपनी बेवकूफी पे झेप रहे थे। हमे पहले ही उन्हें फोन कर देना चाहिये था। अब इसी को लेकर थोड़ा बहुत मज़ाक हुआ और हमने उन्हें ही लताड़ दिया की जब देख रहे थे हम खड़े हैं तो गाड़ी में क्यों छुपे थे। वो क्या कम थे वो भी कहने लगे कि हमे क्या पता कि क्यों खड़े हो ? हम सोच रहे थे कि अब आएंगे अब आएंगे। उल्टा चोर कोतवाल को डाँट रह था और इसी तरह एक दूसरे की टांग खींचते और  हँसते खिलखिलाते हम अपनी अपनी गाड़ियों में बैठे और अगले पड़ाव की तरफ बढ़ चले।

अब हमे साईं मंदिर जाना था। वो इधर से २.५  किलोमीटर दूर था। कुछ ही देर में उधर पहुँच गये। मंदिर मुझे साधारण लगा और दूसरा अन्दर आरती भी हो रही थी तो मेरा उधर जाने का मन नहीं किया। मंदिर के बाहर ही एक रेहड़ी वाला भाई बैठा था। वो उबले चने, फलों का सलाद इत्यादि बेच रहा था। हममें से कुछ लोग मंदिर के अन्दर थे और हम बाहर थे। योगी भाई ने कहा कि उन्हें भूख लग रही है तो वो चने वगेरह लेंगे। मैं भी उधर गया लेकिन उस ठेले के आस पास खाफी मक्खियाँ थी तो मेरा खाने का विचार बदल गया। योगी भाई जब अपनी प्लेट ले रहे थे तो बाकी के लोग भी आ गये और अपने लिए प्लेट लगवाने लगे। कोई चना लेता तो कोई फलों का मिक्स सलाद। मुझे चाय पीने का मन कर रहा था। मैंने इस विषय में पुछा तो किसी ने मुझे बताया कि भारती जी चाय की तलाश में ही सड़क के पार की दुकानों में गये हैं। मैंने उन्हें देखा और उस दुकान की ओर चल पड़ा। वे चाय बनवा  ही रहे कि मैंने भी चाय का आर्डर दिया। अब हम चाय बनने का इंतजार करने लगे। साथ में चाय का शौक़ीन कोई निकल आये तो घूमने का मज़ा ही बढ़ जाता है। भारती चाय के शौक़ीन हैं ये पता चला तो अच्छा लगा। थोड़ी देर में ही चाय बन गयी और हम चाय की चुस्कियां लेने लगे। जब तक चाय पीते तब तक बाकी लोगों ने भी पेट पूजा कर ली थी। जिन्होंने दर्शन करने थे दर्शन कर लिए थे।

सब निपटने के बाद हमने तीसरे जगह जाने की सोची। मैं आश्रम में नहीं जाना चाहता था लेकिन पुनीत भाई और अंकुर भाई ने कहा कि आश्रम के अन्दर घूमने लायक जगह हैं इसलिए एक बार जाना तो बनता है। अब वो जाना चाहते थे तो हमने भी हाँ कर दिया। अब हमारा अगला पडाव सुधांशु आश्रम था।ये साई दरबार से साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी पर मौजूद था।  कुछ ही देर में हम उधर पहुँच गये। लेकिन उधर पहुंचे तो पता चला कि आधा पौने घंटे में आश्रम का दरवाजा खुलेगा। अब हम इतना इतंजार नहीं कर सकते थे इसलिए हमने उधर से निकलकर आज के आखिरी पडाव गंगा बैराज जाने की सोची। एक तरह से मैं खुश था कि आश्रम का चक्कर बच गया।

उधर से निकलकर गंगा बैराज की तरफ बढ़े जो कि उधर से आठ किलोमीटर की दूरी पर था। बैराज ६२१ मीटर लम्बा है और चार लेन हाईवे बाईपास की तरह काम करता है। इसका आधिकारिक नाम लव कुश बैराज है। पुल के ऊपर खोमचे वाले घूम रहे थे और काफी अन्य लोग भी थे जो कि उधर घूमने आये थे। उस दिन शायद सप्ताहंत था इसलिए भी भीड़ भाड़ थी। उधर देख कर लग रहा था कि ऑफिस के प्रेमी युगल उधर आते होंगे। हमे ये भी बताया कि उधर कई ऐसे स्पॉट भी हैं जिससे लोग आत्म हत्या कर चुके हैं इसलिए पुलिस भी उधर तैनात रहती है। हमने कुछ देर उधर बिताया।  बैराज के ऊपर काफी ठंडी ठंडी हवा बह रही थी। हम रोड के एक तरफ थे तो रोड क्रॉस करके दूसरी तरफ भी गये। पहले भारती जी ने रोड क्रॉस करी। मैं एक तरफ खड़ा खड़ा बोर हो गया था तो मैं भी रोड क्रॉस करके दूसरी तरफ चला गया। हमने पुल से नीचे झाँका तो उधर एक दो बन्दर बैठे हुए थे। मैंने उनकी फोटो लेनी चाही लेकिन वो मुंडी झुकाए बैठे थे। एक बंदरिया अपने बच्चे को गोदी में समेटे हुए बैठी थी। भारती जी ने मुझे फोटो खींचते हुए देखा तो थोडा सा पुल पे अपनी ऊँगली से खटखटाया। उनके हाथ में शायद अंगूठी थी जिसे खटखटाहट हुई और बंदरिया जी ने ऊपर देखा। मैंने यही मौका देखा और फट से एक फोटो खींच ली। इसके बाद थोड़े देर पुल से इधर उधर देखने के बाद हमने रोड क्रॉस करी तो बाकी लोग खोमचे वाले से कुछ चना जोर गरम टाइप ले रहे थे। योगी भाई ने मुझे दिया तो मैंने उसमे से थोडा चखा। मेरा लेना था कि योगी भाई ने मज़ाक किया कि इसके चारो ओर भी मक्खियाँ थी। अपने फ्रूट सलाद तो नहीं खाया और ये खा लिया। अब पेट का ख्याल रखना। मैं भी ये बात सुनकर हँस दिया। अब बोलने के लिए कुछ नहीं था। सही मौका देख कर चौका मारा था योगी भाई ने। ऐसे ही हमने थोडा और वक्त उधर काटा।यहाँ वहां की बातें की। थोड़ा हंसी ठट्ठा किया। दस पन्द्रह मिनट बाद हम लोग गाड़ी में बैठ गये और वापस होटल की तरफ जाने लगे।

अब हम लोगों को भूख भी लग गयी थी तो हल्का फुल्का नाश्ते की योजना बनाई। रास्ते में एक हलवाई की दुकान देखी और उसके सामने गाड़ी रोक दी गयी। दुकान का नाम था शुक्ला स्वीट्स एंड नमकीन। अब सब सुमोपाइयों ने अन्दर धावा बोल दिया। समोसे, गुजिया,ढोकला और छैना खाए गये। जिसकी जो मर्जी आती वो वो खा लेता। गुजिअ बड़ी टेस्टी थी। मैंने एक ली दूसरी लेने का मन था लेकिन नहीं लिया क्योंकि आजकल खाना कण्ट्रोल में खाता हूँ। इसके बाद चाय तो बनती थी तो चाय पी गयी और जब सबके पेट भर गये तो हम वापस जाने को तैयार थे।

अल्मास भाई को एक जगह जाना था तो उन्हें उधर छोड़ा। ये जगह कैंटोनमेंट के अन्दर थी। अल्मास भाई को छोड़कर हम लोग होटल की तरफ बढ़ गये।

आगे की योजना ये थी कि होटल में थोड़ा आराम होगा। अभी एक दो सुमोपाई आने वाले थे। इसके बाद शाम की महफ़िल जमनी थी।

कौन थे ये सुमोपाई जिन्होंने अब पधारना था? शाम की महफ़िल में क्या हुआ?
ये सब बातें जानने के लिए आपको अगली कड़ी पढनी होगी। तब तक आप इन तस्वीरों का लुत्फ़ उठाईये।

साई दरबार के बाहर चाट कहते हुए 

सुधांशु महाराज के आश्रम के गेट के बाहर राघव भाई। 

गंगा बैराज 

बैराज में मस्ती के पल

चने वाले भाई साहब के साथ राघव भाई 

पुल से नीच झाँकते भारती जी। इसके बाद मैं भी उधर चले गया था। 


भारती जी के ध्यानाकर्षण की कोशिश के बाद ऊपर देखतीं ये मोहतरमा 

बराज से एक दृश्य 

बराज के स्तम्भों के निकट ये घास उगी थी। 


पेट पूजा के बाद चाय का लुत्फ़ उठाते कुछ साथी 

कुछ साथी बाहर भी चाय का लुत्फ़ ले रहे थे 

गरमा गर्म समोसे निकालते हुए होटल के कारीगर। 

क्रमशः

कानपुर मीट की कड़ियाँ :
कानपुर मीट #१:शुक्रवार - स्टेशन रे स्टेशन बहुते कंफ्यूज़न
कानपुर मीट #२: आ गये भैया कानपुर नगरीया
कानपुर मीट #3: होटल में पदार्पण, एसएमपियंस से भेंट और ब्रह्मावर्त घाट
कानपूर मीट #4
कानपुर मीट # 5 : शाम की महफ़िल

8 टिप्‍पणियां:

  1. luv you bhai anjan ..
    a preety nice discription of a fentabulous day of our life ..
    thanks a ton ..
    बैराज के पास जो हरी चीज़ है वो घास नहीँ बल्कि जलकुम्भी है और पर्यावरण शत्रु के ही समान है ।

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    1. अरे वाह!! राघव भाई। मुझे जल कुम्भी के विषय में कुछ भी जानकारी नहीं थी। अभी इसके विषय में पढ़ा। उस वक्त तो पानी में तैरती कोई खूबसूरत घास ही मुझे लगी थी। ये कितनी खतरनाक है इसका ज्ञान अभी हुआ। शुक्रिया ज्ञानवर्धन करने के लिए।

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  2. बढ़िया पोस्ट...कुछ यादे ताजा हो गयी

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  3. उत्तर
    1. जी। मैं तो बार बार पढ़ लेता हूँ। मीट याद आ जाती है।

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