संस्मरण पौड़ी के #1: शक्तिमान - एक किंवदन्ती

खेतों में पतंग कटकर आने का इन्तजार करते बच्चे। फोटो 17 जून 2021 को खींची गई


यह पतंग का मौसम है और शाम को पतंग बाजी खूब हो रही है। जब पेंच लड़ते हैं तो एक पतंग कटती है और उसे लूटने के लिए लड़के भी दौड़ते हैं। मैं उनको खेतों में दौड़ता हुआ देखता देखता रहता हूँ और मुस्कराता रहता हूँ। मेरे मन के कोने में मौजूद एक धुंधली सी याद साफ होने लगती है। 

कभी हम ऐसा ही दौड़ा करते थे और अगर भाग्यशाली होते तो किसी दिन कोई न कोई पतंग हाथ में आ भी जाती थी। कई बार पतंग के चक्कर में जब नीचे नहीं देख रहे होते थे तो एक खेत से दूसरे में गिर भी जाते थे।  आज ये लोग दौड़ रहे हैं और शायद कुछ वर्षों बाद दूसरे लोग दौड़ेंगे।


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समय का चक्र भी अजीब है। वह अपनी गति से घूमता है। कभी कभी ऐसा लगता है कि हम लोग यहाँ एक किरदार निभाने के लिए आये हैं। उस किरदार को कल कोई और निभा रहा था, आज हम निभा रहे हैं और आने वाले वक्त में कोई और निभाने वाला है। ऐसे में कई बार ऐसे व्यक्ति भी इस मंच पर आ जाते हैं जो कि उस किरदार को इस तरह निभा जाते हैं कि किंवदन्ती बन जाते हैं। ऐसा ही किंवदन्ती था शक्तिमान!


शक्तिमान एक आम सा दिखने वाला लड़का था जो कि हमारे बचपन के दिनों में जब पतंगबाजी का मौसम आता था तो इन खेतों में पाया जाता था।  उसका नाम क्या था ये मुझे नहीं पता लेकिन वह हमारे बीच शक्तिमान के नाम से प्रसिद्ध था। वह शायद पास के किसी गाँव यानी कांडे, च्यूंचा या पौड़ी गाँव में से किसी एक से यहाँ आता था। किस गाँव से हमें नहीं पता और सच बताऊँ तो उस वक्त जानने की इच्छा भी नहीं हुई थी।


इकहरे बदन और गेहुएं रंग का वह लड़का हमसे करीब दो तीन साल बढ़ा रहा होगा। वह अक्सर कमीज और बेलबोटम पेंट पहने हुए होता और उसकी पीठ पर पतंग लटकी हुई होती। उसका चेहरा लम्बा सा था और सिर के  बाल बड़े और बिखरे हुए होते। जब वह भागता तो उसके बाल हवा के वेग के कारण उड़ते से दिखते थे। 


जितनी भी मेरी स्मृति उस लड़के से जुड़ी हुई है उसमें मुझे याद आता है कि उसकी आँखें आसमान पर टिकी हुई होती। हवा के बहाव और पंतगों के झुकाव से वह यह अंदाजा लगा लेता कि कौन सी पतंग कटेगी और वह कहाँ जाकर गिरेगी। ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ऐसा कम ही होता कि वह कोई पतंग पाने में कामयाब न हुआ हो। एक खेत से दूसरे खेत कभी वह किसी सुपरमैन की तरह कूदता दिखता या कभी नीचे वाले खेतों से ऊपर वाले खेतों की तरफ फुर्ती से दौड़ता चला आता।  जब कई लड़के एक ही पतंग के पीछे  भागते तो पतंग उसे  मिलेगी यह लगभग तय ही होता। ऐसा नहीं है कि कभी दूसरो को न मिली हो लेकिन ऐसा होने का प्रतिशत काफी कम ही रहता था। 


शायद उसके अन्दर यह भांपने की नैर्स्गिक प्रतिभा थी। इसलिए वह जब शाम को तीन चार बजे के करीब जब खेतों में आता तो उसकी पीठ खाली होती और जब शाम को घर लौटता तो उसकी पीठ पर कई पतंगे टँगी होती। जब पतंग ज्यादा होती तो वह किसी छोटे बच्चे को उन्हें सम्भालकर रखने के लिए पकड़ा भी देता था। 


इन पतंगों का वह क्या करता था ये तो हमें नहीं पता था लेकिन अपनी इस खूबी के चलते वह हम लोगों के बीच शक्तिमान के नाम से मशहूर हो गया था। जिस प्रकार शक्तिमान एक जगह से दूसरी जगह पलक झपकते ही पहुँच जाता उसी प्रकार वह भी एक जगह से दूसरी जगह पहुँचता सा प्रतीत होता था। 


कई बार तो हम लोग पतंगों का पीछा करना केवल इसलिए छोड़े देते थे क्योंकि उसको पतंग के पीछे भागते देखना ज्यादा मनोरंजक होता था। किसी फिल्म देखने के समान। 


मुझे याद है ऐसा दो तीन साल तक निरंतर चलता रहा और फिर एक दिन अचानक गायब हो गया। अक्सर यही होता है। हम एक किरदार कुछ ही वक्त के लिए तो निभा पाते हैं। फिर हम कोई और किरदार निभाने में मशगूल हो जाते हैं और  दूसरे वह जगह ले लेते हैं। कई बार वह जगह खाली भी रह जाती है।


मुझे लगता है हमें कब निकलना है बस यह ही तय करना महत्वपूर्ण होता है। कई प्रतिभाशाली लोग जब सही समय पर अपने किरदारों से निकल नहीं पाते हैं तो वह आखिर में दया के पात्र ही रह जाते हैं और जो उन्होंने हासिल किया होता है वह भी कई बार गँवा देते हैं। 


खैर, मुझे लगता है शायद पतंगों से ज्यादा रोचक चीजें उसे मिल गयी होंगी लेकिन ये खेत शायद उसका इन्तजार करते होंगे। अब शायद ही किसी को वो याद हो। अगर उसके विषये में कुछ बोला भी जाये तो शायद लोगों को वो एक कोरी गप्प ही लगे। 

सोचता हूँ क्या उसे भी ये दिन याद आते होंगे। वो भी अपने घर की छत पर बैठा जब बच्चों को पतंग लूटते हुए देखता होगा तो अपने उन्हीं दिनों को याद जरूर करता होगा। शायद बच्चों को अपनी पतंग लूटने के किस्से भी सुनाता हो। 


मैं भी यहाँ खड़ा उन बच्चो को देखता हूँ तो कभी-कभी किसी बच्चे में उसकी झलक दिखती है। वह भागते हुए तेजी से आगे निकल जाता है, बिना सोचे समझे एक खेत से नीचे दूसरे में कूद जाता है और फिर कुछ देर गायब रहकर जब वापिस दिखायी देता है तो उसकी पीठ में पतंग रहती है और चेहरे पर शायद एक विजय मुस्कान।  शायद इन्हीं में से कोई हो जो एक नया शक्तिमान बने या किसी अन्य नाम से जाना जाये। और एक नई किंवदन्ती का निर्माण हो।


क्या आपके शहर या बचपन में ऐसे चरित्र हैं जो कि किंवदन्ती ही बनकर रह गये? हो तो जरूर बताइयेगा।


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21 टिप्पणियाँ

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  1. ऐसे चरित्र तो संसार में बिखरे होते हैं विकास जी। किसी को कोई याद रह जाता है, किसी को कोई और। आपने शक्तिमान के संदर्भ से जो विचार व्यक्त किए हैं, वे बिलकुल सटीक हैं और मनन करने योग्य हैं ।

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    1. जी सर...कभी कभी यादों के पिटारे से कुछ निकल ही जाता है।

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  2. दोड़ सतत है और चरित्र बदलते रहते हैंं। सुंदर्।

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  3. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (25-06-2021) को "पुरानी क़िताब के पन्नों-सी पीली पड़ी यादें" (चर्चा अंक- 4106 ) पर होगी।
    चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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    1. चर्चाअंक में मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार।

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  4. पौड़ी का शक्तिमान.... बहुत ही लाजवाब संस्मरण...काश आपको उसका नाम पता होता तो वह अपने को संस्मरण में पाकर कितना खुश होता...।
    वैसे गढ़वाल में एक से बढ़कर एक शक्तिमान देख सकते हैं कोई ऊँचे से ऊँचे पेड़ों पर चढ़ जाता है कोई ऊँचाई से कूदकर चलते घोड़े में बैठ जाता है।
    सच वहाँ के लोगों की सादगी साहस और जीवटता आश्चर्यचकित कर देती है...।
    लाज संस्मरण।

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    1. जी सही कहा....पेड़ों में चढ़ने के मामले में तो लोगों का कोई सानी ही नहीं है...हार्दिक आभार....

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  5. कहते हैं न कि -जिंदगी के राह पे चलते-चलते कितने लोग मिलते हैं उनमे से कुछ तो यूँ ही निकल जाते हैं कुछ यादों के जेहन में बस जाते हैं,बहुत ही सुंदर संस्मरण विकाश जी

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  6. व‍िकास जी, शक्तिमान एक संस्‍मरण नहीं हो सकता, कहानी तक स‍िमटा पात्र भी नहीं, इस जैसे कई वाकये हमारी ज‍िंदगी में भी घटे परंतु अध‍िकांश का अंत हमें अच्‍छे अनुभव नहीं दे गया। आपने फि‍र से ऐसा बहुत कुछ याद द‍िला द‍िया ज‍िसे शब्‍दों में ढाल कर कम से कम ज‍िंदा तो रखा ही जा सकता है। द‍िल को छू गया शक्‍त‍िमान और उसकी पीठ पर लदी पतंगें

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  7. स्ययद होते भी हों ऐसे किरदार तभी किवंदितियाँ भी हैं ...
    शायद वो मन की एक कल्पना भी हो ... पर जिसे जीने में आनद आए वो कुछ न कुछ तो होता ही है ...

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    1. जी होते तो हैं लेकिन चूँकि कम होते हैं तो शायद किंवदन्ति बन जाते हैं। या होते भी होंगे तो एक ही वक्त या उम्र में सिमटे हुए।

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  8. विकास भाई, जीवन में हम कभी न कभी शक्तिमान जैसे किरदारों से रूबरू होते ही है। बहुत सुंदर संस्मरण।

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  9. बहुत अपना सा लगा यह संस्मरण.. न जाने कितनी ही बार घर की छत से ऐसे दृश्य देखे हुए हैं । पौढ़ी के शक्तिमान के साथ वे सब साकार हो आए आँखों के समक्ष । अति सुन्दर सृजन ।

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