रविवार, 8 नवंबर 2020

सिग्नल मैन - चार्ल्स डिकिन्स

चार्ल्स डिकेन्स की कहानी द सिग्नल मैन का हिंदी अनुवाद (Hindi translation of Charles Dicken's The Signal Man)




चार्ल्स डिकिन्स ब्रिटेन के सबसे प्रसिद्ध और महानतम लेखकों में से एक रहे हैं। उनकी लिखी हुई रचनाएँ आज भी उतनी ही शिद्दत से पढ़ी जाती हैं जितना की तब जब वह इन्हें लिख रहे थे।

द सिग्नल मैन चार्ल्स डिकिन्स द्वारा लिखी गयी हॉरर और रहस्यकथा है जो कि सबसे पहली बार 1866 में  'आल द इयर राउंड' नामक सप्ताहिक पत्रिका के क्रिसमस संस्करण में प्रकाशित 'मगबी जंक्शन' नामक संकलन में प्रकाशित हुई थी।

मैंने यह कहानी प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग में मौजूद कहानी संग्रह थ्री घोस्ट स्टोरीज, जिसमें चार्ल्स डिकिन्स की तीन हॉरर कहानियों को संकलित किया गया है, में पहली बार पढ़ी थी। यह संग्रह मुझे उस वक्त रोचक लगा था। उस वक्त मेरा इनका अनुवाद करने का कोई इरादा नहीं था लेकिन अब चूँकि मैं अपनी वेबसाइट के लिए पब्लिक डोमेन में मौजूद अपनी पसंदीदा कहानियों का अनुवाद कर रहा हूँ तो सोचा इस संग्रह से भी एक कहानी का करना चाहिए और इस कारण द सिग्नल मैन का अनुवाद करने की मैंने कोशिश की है। 

उम्मीद है यह कोशिश आपको पसंद आएगी। 


*****

"हेल्लो! वहाँ नीचे!"

जब उसने अपने को बुलाती हुई यह आवाज़ सुनी, तो वो अपने केबिन के दरवाजे पर खड़ा था। उसके हाथ में एक छोटा सा झंडा था जिसका कपड़ा झंडे की छोटी सी छड़ (पोल) के इर्द गिर्द लिपटा हुआ था। वह जगह कुछ ऐसी थी कि आम तौर पर कोई भी सोचता कि उसे यह आसानी से पता लग जाना था कि मेरी आवाज़ किस दिशा से आई थी लेकिन मेरे तरफ ऊपर, जहाँ मैं इस वक्त खड़ा था, की दिशा में देखने के बजाय वह मुड़ा और पटरी की दिशा में देखने लगा। उसका यह अजीब व्यवहार मुझे उस वक्त साधारण नहीं लगा था लेकिन उसमें असाधारण क्या था इस बात का मैं रेखांकित नहीं कर पाया था। हाँ, मुझे इतना जरूर पता है कि भले ही वो काफी नीचे खड़ा था और उसका आकार धुंधला और छोटा नज़र आ रहा था और सूर्यास्त के कारण उस जगह पर उपजी तीव्र रोशनी के कारण उसे देखने से पहले मुझे अपनी आँखों पे हाथ से छाँव करने की आवश्यकता महसूस हो रही थी लेकिन फिर भी उस विशेष व्यवहार ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित जरूर किया था।

"हेल्लो! वहाँ नीचे!", मैं फिर एक बार चिल्लाया।

रेल की पटरियों की तरफ देखता वह व्यक्ति मुड़ा और उसने अपनी आँखें उठाकर मेरी तरफ देखा तो मैं बोला- "क्या इधर कोई रास्ता है जहाँ से उतरकर मैं आप के साथ कुछ बात कर सकूँ?"

उसने मुझे देखा और कुछ देर तक वह कुछ भी नहीं बोला। मैं भी उसके तरफ चुपचाप देखता रहा। मैं दोबारा इतनी जल्दी अपना प्रश्न नहीं दोहराना चाहता था। तभी धरती और हवा में एक हल्का कंपन सा हुआ जो जल्द ही तीव्र थरथराहट में बदलते हुए एक ऐसे बलशाली वेग की तरह मेरी ओर बढ़ा कि मुझे आश्चर्यचकित होकर पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा। मुझे लग रहा था कि इस वेग के अन्दर मुझे अपने साथ नीचे खींच लेने की ताकत थी। अब जब उस तेज गुजरती गाड़ी से निकलती भाप मेरी ऊँचाई तक पहुँच कर वातावरण में खो रही थी तो मैंने एक बार फिर नीचे देखा और पाया कि वह व्यक्ति अपने झंडे, जिसे कि उसने गुजरती हुई ट्रेन को अभी अभी दिखाया था, को वापस छड़ पर लपेट रहा था।

मैंने दोबारा अपना प्रश्न दौहराया। कुछ समय पश्चात, जिस दौरान वो मुझे गौर से देख रहा था, उसने अपने लिपटे हुए झंडे से मेरे मौजूदा जगह से दो तीन सौ यार्ड दूर पर मौजूद एक बिंदु की ओर इशारा किया। "ठीक है", मैं उससे बोला और निर्देशित जगह की तरफ बढ़ गया। वहाँ पहुँच कर ध्यान से देखने पर मुझे नीचे की तरफ जाता चट्टान पर कटाव करके बनाया गया एक घुमावदार रास्ता दिखा जिस पर मैं अब उतरने लगा।

यह रास्ता सीढ़ी नुमा था जिसकी पाए काफी गहरे और अप्रत्याशित तौर से कटे हुए थे। रास्ता एक चिपचिपी  चट्टान को काटकर बना हुआ था जिस पर जैसे जैसे मैं नीचे बढ़ता गया वह रास्ता और ज्यादा लिसलिसा और गीला सा होता गया। मैं धीरे धीरे ध्यान से इस रास्ते से उतर रहा था। शायद यही कारण था कि नीचे पहुँचने तक मुझे यह सोचने का वक्त मिल गया कि कैसे उसके रास्ते की तरफ इशारा करने में एक तरह की हिचकिचाहट थी।

जब मैं घुमावदार रास्ते पर बढ़ते हुए  इतने नीचे आ गया था कि उसे दोबारा देख सकूँ तो मैंने पाया कि वो रेल की पटरियों के बीच में कुछ इस तरह खड़ा था कि जैसे वो मेरा उधर प्रकट होने का इन्तजार कर रहा हो। उसका बायाँ हाथ उसकी ठुड्डी पर था और उसकी बायीं कोहनी उसके छाती के सामने आये दाएँ हाथ के ऊपर थी। वो ऐसी अपेक्षा और ध्यान से मेरी तरफ देख रहा था कि कुछ देर के लिए रूककर मैं उसके इस अजीब रवैये के विषय में सोचने लगा।

कुछ देर बाद मैंने दोबारा नीचे उतरना चालू किया और रेल की पटरियों के सतह पर पहुँचने के बाद जब उसके निकट पहुँचा तो देखा कि वो एक गहरे भूरे रंग का आदमी था जिसकी घनी दाढ़ी और घनी भौएं थी। मुझे ऐसा लगा जैसे वो दुनिया की सबसे एकाकी और उदास जगहों में से एक में नियुक्त था। उस जगह के दोनों तरफ ऊबड़ खाबड़ पत्थरों से बनी ऐसी गीली दीवारें थी जिनसे पानी रिस रहा था, जो एक छोटे से आकाश के टुकड़े को छोड़कर सब कुछ ढके हुए थीं। एक तरफ  देखने पर तो ऐसा लगता मानो किसी मनहूस कालकोठरी की तरफ जाता रास्ता हो और दूसरे तरफ का रास्ता एक उदास सी दिखती लाल रोशनी पर पहुँच कर खत्म होता। ये रोशनी एक सुरंग के मुहाने पर थी जो अपनी दैत्याकार बनावट के कारण निष्ठुर और अवसाद और घृणा पैदा करने वाली प्रतीत होती थी। एक तरफ तो यहाँ सूरज की इतनी कम रोशनी आती थी कि यहाँ से उठने वाली दुर्गंध मृत्यु का एहसास दिलाती थी, वहीं दूसरी तरफ इधर इतनी हाड़ कंपाने वाली ठंडी हवा चलती थी कि ऐसा लग रहा था मानो मैंने प्रकृतिक दुनिया छोड़कर किसी दूसरी दुनिया में कदम रख दिया हो।

जब तक की वो अपने जगह से हिलता तब तक मैं उसके इतने निकट पहुँच चुका था कि उसको छू सकता था। वो मेरे ऊपर से अपनी निगाहें हटायें बिना एक कदम पीछे हटा और उसने अपना हाथ उठाया।

मैंने उससे कहा कि कार्य करने के लिए यह एक अत्यंत एकाकी स्थान था और जब मैंने ऊपर से नीचे देखा तो इस जगह ने मेरा ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट कर लिया था। मेरा विचार था कि चूँकि इधर किसी व्यक्ति का आना असमान्य बात होगी तो शायद उसको मेरा आना इतना खटकेगा नहीं? मेरे अन्दर शायद उसने ऐसे आदमी को देखा जो अब तक अपने सीमित दायरे में कैद  रहा है और आखिरकार आज़ाद होकर इन महान कलाकृतियों में रूचि लेने लगा है। खैर, अब तो मुझे ढंग से याद भी नहीं है कि मैंने असल में क्या कहा था लेकिन मेरी बातों का लब्बोलबाब यही था जो ऊपर मैंने बताया है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उससे बातचीत करते हुए मुझे ख़ुशी का अहसास नहीं हो रहा था क्योंकि उस आदमी में कुछ ऐसा था जो मुझे उससे खुलकर बात करने से रोक रहा था। 

उसने सुरंग के पास जल रही लाल बत्ती की तरफ एक अजीब सी निगाह डाली और उसके आस पास इस तरह से देखने लगा मानो उधर कुछ ऐसा होना चाहिए था जो कि अब उधर नहीं था। फिर उसने मेरी तरफ देखा।

"वह लाल बत्ती भी उसके ही काम का हिस्सा है न?" -  मैंने उससे पूछा।

उसने धीमी आवाज में उत्तर दिया - "क्या तुम्हे पता नहीं है कि ऐसा ही है?"

जब मैंने उसकी वह घूरती हुई आँखें और दुखी चेहरे को देखा तो यह डरावना ख्याल मेरे मन में उपजा कि यह एक आदमी नहीं बल्कि एक भटकती रूह है। इस घटना के होने के बाद से मैंने इस बात पर काफी विचार किया है कि कहीं वह व्यक्ति किसी मानसिक रोग से ग्रसित तो नहीं था।

उसके प्रेत होने का ख्याल मन में  आते ही मैं डरकर कुछ कदम उससे दूर हो गया लेकिन जब मैं पीछे हो रहा था तो उसकी आँखों में मुझे एक दहशत सी दिखी। ऐसा लगा जैसे वो मुझसे डर रहा हो और इसी कारण मेरे जहन में उठते हुए भयावह ख्याल भी उड़नछू हो गये।

"तुम मुझे", मैंने अपने चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करते हुए कहा, "ऐसे क्यों देख रहे हो जैसे तुम्हे मुझसे डर लग रहा हो। "

"मुझे इस बात का संदेह था," वो बोला,"कि शायद मैंने तुम्हे पहले कहीं देखा है। "

"कहाँ?"

उसने लाल बत्ती की तरफ इशारा किया।

"वहाँ?", मैंने पूछा।

मुझे ध्यान से देखते हुए उसने बड़ी धीमी आवाज़ में कहा - “हाँ”

"मेरे भाई, मैं उधर क्या करूँगा? बहरहाल, जैसा भी हो,  मैं कभी उधर नहीं था, तुम इस बात को लेकर निश्चिन्त रहो। "

"मुझे भी लगता है मैं निश्चिन्त हो सकता हूँ।", उसने कहा, "हाँ, मुझे पूरा यकीन है कि मुझे कुछ गलतफहमी हुई थी। "

मेरे ही तरह उसके मन में उठ रहे शंका के बादल साफ हुए। वो अब तत्परता और बेहद चुने हुए शब्दों से मेरी टिप्पणियों के जवाब दे रहा था। क्या उसके करने के लिए उधर काफी कुछ था? हाँ, ऐसा कहा जा सकता था, उसके ऊपर काफी जिम्मेदारी थी; उससे सतर्कता और खरेपन की उम्मीद की जाती थी लेकिन हाँ शारीरिक श्रम न के बराबर था। उसे सिग्नल बदलना, थोड़ा रोशिनियों को कम कर देना और इस लोहे के हैंडल को कभी कभी घुमा देना होता था। जब मैंने उससे उन एकाकीपन से भरे घंटों के विषय में पूछा जो कि उसे इस काम के दौरान व्यतीत करने होते थे तो उसने कहा कि ज़िन्दगी ने उसको इसके लिए ढाल दिया था और वो इसका आदि हो गया था। उसने अपने आप को यहाँ रहते हुए एक नयी भाषा सिखा दी थी - अगर उस भाषा के अक्षरों को पहचाना और उच्चारण के विषय में एक साधारण ज्ञान होना, भाषा सीखना कहा जा सकता है तो। वो भाग और दशमलव के ऊपर भी काम करता था, उसने बीजगणित पे भी हाथ आजमाया था लेकिन उसने पाया था कि बचपन की तरह अभी भी गणित के मामले में उसका हाथ तंग था। क्या उसके लिए जरूरी था कि काम के दौरान वो इस सीलन भरी हवा में रहे और क्या वो कभी उन पथरीली दीवारों के पार चमक रहे सूरज की धूप में नहीं जा सकता था? ये सब वक्त और परिस्थिति की बात थी। कुछ परिस्थितियों में लाइन में काम कम होता और ऐसा ही दिन और रात के कुछ घंटों के विषय में कहा जा सकता था। जब धूप निकल रही होती तो वो कई बार इन परछाईयों से निकल कर बाहर की तरफ जाता था लेकिन फिर उसका ध्यान अपनी घंटी पर रहता और वो उसके बजने की ध्वनि को सुनने के लिए दोगुना व्यग्र हो उठता था। इससे उसे आराम कम ही मिलता था तो जाने का कोई लाभ उसे नहीं दिखता था।

वो मुझे अपने झोपड़ीनुमा कमरे में ले गया जहाँ अलाव जला हुआ था, एक अधिकारिक रजिस्टर,जिसमे उसे एंट्रीयाँ करनी होती थी, के लिए टेबल था, एक टेलीग्राफ का यंत्र  था और एक छोटी सी घंटी थी जिसके विषय में वो पहले ही बता चुका था। मैंने झिझकते हुए और यह सुनिश्चित करते हुए कि वह मेरे कथन को अन्यथा नहीं लेगा उससे कहा कि मुझे लगता है कि वह काफी उच्च शिक्षित था और इस कारण मुझे आश्चर्य हो रहा था कि उस जैसा पढ़ा लिखा और दार्शनिक व्यक्ति इस छोटी सी जगह पर काम कर रहा था। उसने माना कि उसने भी यह देखा है कि ऐसे सभी पेशों में जहाँ भी ज्यादा लोग काम करते हैं जैसे फैक्ट्रियाँ, पुलिस और फ़ौज या रेलवे जैसे महकमों में दार्शनिक लोग शायद नहीं पाए जाते थे। दर्शन में रूचि होना इन महकमों में काम करने वाले व्यक्तियों के लिए जरूरी नहीं था और न ही ऐसे महकमों में जाने वाले व्यक्ति ही दर्शन में रूचि रखते थे। फिर उसने कहा कि जब वह जवान था, अगर मैं इस बात पर विश्वास कर पाऊँ क्योंकि अब इस कमरे में बैठकर उसे खुद इस बात पर विश्वास करना मुश्किल होता था, तब वह  दर्शनशास्त्र का छात्र रहा था। उसने दर्शन शास्त्र से सम्बन्धित कई लेक्चर भी सुने थे लेकिन फिर अपनी जवानी में वह रास्ता भटक गया था। उसने अपने पास आने वाली अवसरों को गँवा दिया था और इस कारण अपनी लापरवाही और आवारगी के चलते उसका पतन हो गया था। लेकिन उसको ज़िन्दगी से कोई शिकायत नहीं थी। उसने अपना रास्ता खुद चुना था और अब जैसी उसकी ज़िन्दगी चल रही थी वह उसमें संतुष्ट था। अब जीवन की दिशा बदलने के लिए काफी देर हो चुकी थी।

जो  सब कुछ भी मैंने ऊपर बताया है वह उसने धीमे धीमे बड़ी गम्भीरता से कहा था और यह कहते हुए वह मेरे और कमरे में जलती आग की तरफ बराबर ध्यान दे रहा था। वह बात करते हुए बीच बीच में,विशेषकर तब जब वह अपनी जवानी के विषय में मुझे बता रहा था, 'साहब' शब्द का उपयोग करता रहता था। यह शायद इसलिए भी था क्योंकि वह शायद वह मुझे यह जताना चाहता था कि उसे अपने विषय में कोई मुगालता नहीं था। उसे पता था कि वह किस पद पर नौकरी कर रहा था और वह कोई बड़ा आदमी नहीं है। बीच बीच में जब उधर रखी वह छोटी घण्टी बजती तो वह अपनी बातें रोककर उधर से आ रहे संदेशों को सुनता था और फिर उनका जवाब भी देता था। एक बार उसे खड़ा भी होना पड़ा था। इस दौरान उसे  अपनी झोपड़ी के दरवाजे को खोलकर एक झंडे को जाती ट्रेन को दिखाकर उसमें मौजूद चालक को कुछ चीजें भी बतानी पड़ी थी। मैंने यह पाया था कि अपने काम के प्रति वह पूरी तरह सजग और जिम्मेदार था। काम करते वक्त उसका पूरा ध्यान अपने काम पर होता था, वह शांत हो जाता था और जब तक काम खत्म न हो जाए तब तक बात करनी जारी नहीं करता था।

यानी उसके काम के प्रति निष्ठा देखकर एक बार को मैं यह कह सकता था कि वह उस पद पर काम करने वाले सबसे जिम्मेदार लोगों में से एक था और उसके रहते कुछ भी अनहोनी होने की सम्भावना बिलकुल भी न थी। लेकिन मैं यह कह नहीं पा रहा था। ऐसा इसलिए था क्योंकि मेरे से बातचीत करते करते एक दो बार उसने बातों की कड़ी को एक दम से तोड़ दिया था और उस वक्त उसके चेहरे की हवाईयां उड़ी होती थी। वह उस वक्त घण्टी को देखता और जब वह नहीं बजती तो झोपड़ी के दरवाजे को, जिसे उसने सीलन से बचने के कारण बंद किया हुआ था, खोल देता और बाहर सुरंग के मुहाने पर जल रही लाल रंग की बत्ती की तरफ ताकने लगता। वह जब लौटकर आग की तरफ आता तो उसका व्यवहार मुझे वैसे ही अजीब लगता जैसे तब लगा था जब पहले मैंने उसे दूर से देखा था। उसकी परेशानी को मैं समझ नहीं पा रहा था।

जब मैं उसे विदा लेने के लिए उठा तो मैंने उससे कहा,"तुम्हारी बातें सुनकर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं एक संतुष्ट आदमी से मिल रहा हूँ। "

(यहाँ मुझे ये स्वीकार करना पड़ेगा कि मैंने उससे यह बात केवल इसीलिए कही थी ताकि वह मुझे बता सके कि उसे क्या चीज परेशान कर रही थी। )

"मुझे लगता है मैं कभी संतुष्ट हुआ करता था", उसने पहले की तुलना में धीमी आवाज़ से कहा,"लेकिन अब मैं परेशान हूँ,जी, बहुत परेशान हूँ। "

यह कहते ही उसने महसूस किया कि वो कुछ ज्यादा ही बोल गया था और अगर उसके बस में होता तो वह इन शब्दों को अपने मुँह से निकलने से पहले ही रोक देता। लेकिन चूँकि अब उसने कह दिया था तो मैंने उसकी बात का यह सिरा पकड़कर उससे आगे पूछा।

"परेशान? किस चीज से? तुम्हे क्या परेशान कर रहा है?"

"ये समझा पाना बहुत मुश्किल है, साहब। मेरे लिए उसके विषय में बात कर पाना बहुत बहुत कठिन है। अगर आप मुझसे मिलने कभी दोबारा आओगे तो मैं आपको बताने की कोशिश करूँगा। "

"लेकिन मैं तुमसे दोबारा मिलना चाहता हूँ। तुम बताओ, मैं कब आऊँ?"

"मेरी शिफ्ट सुबह जल्दी खत्म हो जाती है लेकिन कल रात को दस बजे के बाद मैं इधर ही अपनी ड्यूटी करता हुआ आपको मिलूँगा।", उसने मुझे कहा।

"फिर मैं ग्यारह बजे आऊँगा।", मैंने उससे वादा किया।

उसने मेरा शुक्रिया अदा किया और दरवाजे तक मेरे साथ बाहर आया। फिर  उसने अपनी अजीब सी धीमी आवाज में मुझसे कहा, "जब तक आपको रास्ता नहीं मिल जाता था तब तक मैं आपको अपनी सफ़ेद रोशनी से रास्ता दिखाऊँगा। लेकिन यह ध्यान रखियेगा कि रास्ता मिलने पर मुझे पुकारियेगा नहीं। आप जब ऊपर पहुँच जाएँ तो भी मुझे पुकारियेगा नहीं। "

उसके इस व्यवहार ने मेरे शरीर में एक झुरझुरी सी हुई लेकिन उस वक्त मैंने उसके इस अजीब व्यवहार के ऊपर कोई टिप्पणी न करके केवल इतना कहा- “अच्छी बात है।”

"और हाँ जब आप कल इधर आयेंगे तो भी मुझे पुकारियेगा नहीं!  अच्छा जाने से पहले क्या आप मेरे एक सवाल का जवाब देंगे कि आपने आज 'हेल्लो! वहाँ नीचे!' क्यों कहा था?"

"पता नहीं", मैंने कहा,"मैं ऐसा कुछ तो चिल्लाया था-"

"ऐसा कुछ नहीं, साहब। आपने यही शब्द बोले थे। मुझे ये अच्छी तरह पता है। "

"मैं मानता हूँ यही शब्द थे। मैंने उन्हें इसलिए कहा, क्योंकि मैंने तुम्हे नीचे देखा था। "

"किसी और कारण से नहीं ?"

"और क्या कारण हो सकता है मेरे पास?"

"आपको ऐसा नहीं लगता कि किसी अलौकिक शक्ति ने आपको ऐसा बोलने को बोला था?"

"नहीं। "

उसने मुझे शुभ रात्री कहा और अपनी रोशनी को ऊपर की तरफ उठया। मैं  पटरियों के बगल में चलता रहा, और इस दौरान मुझे न जाने क्यों यह खतरनाक अहसास होता रहा था कि कोई ट्रैन मेरे पीछे से आ रही है।  मैं तब तक चलता रहा जब तक मुझे ऊपर जाने का रास्ता नहीं मिल गया। उस रास्ते पर ऊपर चढ़ना नीचे उतरने की तुलना में काफी आसान था और मैं अपने सराय तक बिना किसी अन्य रोमांचक घटना से दो चार हुए पहुँच गया।

******

गली रात जब दूर मौजूद घड़ियाल ग्यारह बजा रहे थे मैं उन सीढ़ियों पर अपने वादे के मुताबिक मौजूद था। वह सीढ़ियों के अंत में, अपनी सफेद रोशनी जलाकर, मेरा इन्तजार कर रहा था। "मैंने इस बार आवाज़ नहीं लगाई”, मैंने उसके निकट पहुँचकर कहा,” क्या अब मैं बात कर सकता हूँ।”

“क्यों नहीं साहब। बिलकुल करिए।” उसने जवाब दिया।

“वाह! इसी बात पर हाथ मिलाईये।” कहकर मैंने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ाया।

“बिलकुल साहब।” कहते हुए उसने मेरी तरफ हाथ बढाया और हमने हाथ मिलाया।

फिर हम अगल बगल चलते हुए उसके कमरे तक पहुँचे और उसमें दाखिल होकर दरवाजा बंद करके अलाव के सामने बैठ गये।

“मैंने अपना मन बना लिया है, सहाब”, उसने मेरी तरफ झुकते हुए फुसफुसाहट से थोड़ी ही तेज आवाज़ में कहना जारी रखा, “अब आपको मुझसे बार बारे ये पूछने की जरूरत नहीं रहेगी कि मुझे क्या परेशानी है। वो क्या है कि मैंने कल शाम को गलती से आपको कोई और समझ लिया था। वही चीज मुझे परेशान कर रही थी। ”

"वो गलती?"

"नहीं। वो अलग व्यक्ति। "

"वो कौन है?"

"मुझे नहीं पता। "

"मेरी तरह दिखता है?"

"मुझे नहीं पता। मैंने कभी चेहरा नहीं देखा। उसका बाँया हाथ उसके चेहरे को ढके हुए थे और उसका दायाँ हाथ बहुत ही तेजी से वो हिला रहा था। कुछ इस तरह"

मैंने उसके द्वारा किये जारे इशारे को देखा और वह इशारा ऐसा लग रहा था जैसे कोई व्यक्ति बड़ी ही शिद्दत के साथ कह रहा हो, “भगवान के लिए, रास्ता खाली करो।”

“एक रात को जब चाँद आकाश में अपनी रोशनी बिखेर रहा था”, उस व्यक्ति ने कहा,”मैं यहाँ बैठा हुआ था जब कि मुझे वह आवाज़ सुनाई दी, "हेल्लो! वहाँ नीचे!" मैंने हैरत से उस दरवाजे से बाहर झाँका तो मुझे दिखाई दिया कि कोई व्यक्ति  सुरंग के पास मौजूद उस लाल बत्ती के निकट खड़ा अपने हाथ को उस तरह हिला रहा था जैसा कि मैंने आपको अभी हिलाकर दिखाया। वह आवाज़ फटी फटी सी लग रही है जैसे अत्यधिक चिल्लाने के कारण अक्सर गला बैठने पर हो जाया करता है। वह आवाज  कर्कश स्वर में दोबारा चिल्लाई, 'सम्भलो! सम्भलो!' और फिर दोबारा वही शब्द मुझे सुनाई दिये 'हेल्लो, वहाँ नीचे! सम्भलो!' मैंने अपना लैंप पकड़ा, उसे जलाकर उसकी रोशनी को लाल किया और फिर उस आवाज के मालिक की तरफ चिल्लाता हुआ भागा, "क्या हुआ? क्या दिक्कत है? खतरा किधर है?" वह साया बस सुरंग के मुहाने पर खड़ा रहा लेकिन फिर उसने कुछ नहीं बोला। मैं उसके इतने निकट पहुँच चुका था कि मैं सोच में पड़ गया था कि आखिर उसने अपनी आँखों के इर्द गिर्द अपने बाजू को क्यों रखा हुआ था? मैं उसके नजदीक पहुँचा और अपने हाथ को उसकी आँखों में मौजूद बाजू  को हटाने के लिए बढाया ही था कि वह गायब हो गया। अभी वो था और अभी नहीं।”

"सुरंग के अंदर?", मैंने पूछा।

"नहीं। मैं सुरंग के भीतर पाँच सौ  गज तक भागा था। फिर रूककर मैंने अपने लैंप को अपने सिर से ऊपर उठाया और न केवल दूरी दर्शाते अंकों को देखा बल्कि बहते पानी को दीवारों पर गीले निशान बनाते हुए और मेहराब से नीचे टपकते हुए भी देखा। अगर कोई नहीं था। मैं फिर जिस तेजी से अंदर आया था उससे तीव्र रफ़्तार से बाहर चला गया, क्योंकि मुझे उस जगह से एक अजीब से डर का अहसास हो रहा था। मैंने लाल बत्ती के चारों तरफ अपनी लाल बत्ती से देखा और फिर लोहे की सीढ़ियाँ लगाकर ऊपर बनी छत्ती पर भी जाकर देखा। मैं ऊपर से नीचे उतरा और भागते हुए यहाँ अपने कमरे में दाखिल हुआ और मैंने दोनों ही दिशाओं में लोगों को संदेश भेजा, 'यहाँ चेतावनी दी गयी थी। क्या उस तरफ कोई परेशानी है?'  दोनों ही दिशाओं से एक सा जवाब आया, 'इधर सब ठीक है।' ”

मुझे अपनी रीड की हड्डी पर सिहरन सी महसूस हो रही थी लेकिन फिर भी मैं उससे बोला कि हो न हो उधर कोई साया नहीं था बल्कि उसका वहम था। यह बात डॉक्टरों ने भी मानी थी कि कई बार आँखों में मजूद संवेदनशील कोशिकाओं की बिमारी के कारण मरीजों को ऐसी चीजें दिखने लगती हैं जो कि असल में होती नहीं है। ऐसे कई मरीजों को अपनी इस बिमारी का अहसास भी हो चुका था और उन्होंने अपने ऊपर प्रयोग कर इस बात की पुष्टि भी की थी।  "और रही बात उस विचित्र आवाज़ की", मैं उसे समझाते हुए बोला, "तो जरा ठहर कर इस अप्राकृतिक घाटी में मौजूद हवा को सुनो। हम इतनी धीमी आवाज़ में बात कर रहे हैं लेकिन हवा किस तरह टेलीग्राफ के तारों को हिलाकर किसी हार्प जैसी ध्वनि पैदा कर रही है।"

हम कुछ देर तक बैठकर उधर आती आवाजों को सुनते रहे और फिर उसने मेरी बातों का जवाब देते हुआ कहा
आपकी सभी बात ठीक है। उसने अपने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उसने अपने जीवन का काफी हिस्सा उधर बिताया था तो उसे हवा और तारों से पैदा होने वाली ध्वनि के विषय में काफी जानकारी थी। सर्दियों की कई लम्बी रातें उसने अकेले इधर बिताई थीं और उसने इन बातों को नोट किया था। लेकिन वह यह भी कहना चाहेगा कि उसकी बात अभी पूरी नहीं हुई है।

वह क्या कहना चाहता था जब मैंने उससे यह पूछा तो उसने मेरी बाँह को छूकर अपनी बात को आगे बढ़ाया-

"उस साये के दिखने के छः घंटे बाद ही इस रेलवे लाइन में एक काफी भयावह एक्सीडेंट हुआ था और उस साए के दिखने के दस घंटे बाद ही एक मृत व्यक्ति और एक जख्मी व्यक्ति को सुरंग के रास्ते उसी जगह पर लाया गया था जहाँ वो साया प्रकट हुआ था।"

मुझे अपने शरीर में एक कंपकपी सी महसूस हुई पर मैंने खुद पर किसी तरह काबू पाया। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, मैंने कहा,  कि यह एक हैरतंगेज इत्तेफाक था, और इसने उसके मस्तिष्क पर असर डाला था। लेकिन यह बात भी सच है कि ऐसे हैरतंगेज इत्तेफाक होते रहते हैं और इस तरह के मामलों में हमे इस चीज का ध्यान रखना चाहिए। मुझे ऐसा लग रहा था कि वह मेरी बात से सहमत नहीं था और इस कारण मैंने कहना जारी रखा-  "मैं यह भी मानता हूँ कि विद्वान व्यक्ति ज़िन्दगी के निर्णय लेते हुए लोग ऐसे इत्तेफाको को ज्यादा अहमियत नहीं देते हैं।"

उसने फिर माफ़ी मांगते हुए कहा कि उस की बात अभी पूरी नहीं हुई थी।

मैंने फिर उसकी बात के बीच में रुकावट पैदा करने के लिए माफ़ी मांगी और उसने दोबारा कहना शुरू किया।

"यह बात कुछ एक साल पहले की है।” उसने अपने हाथ को मेरी बाँह के ऊपर रखा और फिर अपने पीछे की तरफ  एक नज़र मार कर अपनी सूनी आँखों से मुझे देखते हुए बोलना जारी रखा। "इस घटना को हुए छः से सात महीने गुजर चुके थे और मैं अब सामान्य महसूस कर रहा था। फिर एक सुबह जैसे ही दिन खुलने लगा था और मैं दरवाजे पर खड़ा लाल बत्ती की तरफ देख रहा था तो मुझे वह साया दोबारा दिखाई दिया।" उसने रूककर मेरी तरफ ध्यान से देखा।

"क्या वो चिल्लाया था?"

"नहीं। वो चुप-चाप खड़ा था।"

"क्या उसने अपनी बाँहों को हिलाकर कुछ इशारा किया था?"

"नहीं। उसने रोशनी की किरण की तरफ झुककर,अपने दोनों हाथ अपने चेहरे पर लगा दिया था। कुछ इस तरह से।"

एक बार फिर मैंने उसके द्वारा किये गए इशारे को देखा। वह शोक व्यक्त करने का इशारा था। मैंने कई कब्रों पर ऐसे इशारों वाली पत्थर की मूर्तियाँ देखी थीं।

"क्या तुम उसके निकट गए थे?"

"नहीं, मैं कुछ देर के लिए अपने कमरे में वापस अंदर आया और बैठ गया। यह करना मेरे लिए जरूरी इसलिए था ताकि एक तो मैं अपने विचारों पर काबू पा लूँ और दूसरा इस घटना ने मेरे होश उड़ा दिए थे। मुझे लग रहा था कि मुझे चक्कर आ जायेगा। जब मैं दोबारा दरवाजे तक गया दिन चढ़ चुका था और वह प्रेत गायब हो चुका था।"

"लेकिन फिर कुछ नहीं हुआ? इस दृश्य का कुछ नतीजा नहीं निकला?"

उसने अपनी तर्जनी ऊँगली से मेरी बाँह को दो या तीन बार छुआ और हर बार उसने एक खौफनाक तरीके से अपनी गर्दन को झुकाव दिया-

“उसी दिन जैसे एक ट्रेन सुरंग से आई, मैंने देखा, कि एक डिब्बे की खिड़की में कोई मेरे को इशारा कर रहा था। इशारा क्या था ये तो मैं नहीं समझ पाया लेकिन मैंने गाड़ी चालक को रुकने का संदेश दे दिया।उसने गाड़ी रोकने के लिए ब्रेक लगाये लेकिन फिर भी गाड़ी सौ डेढ़ सौ गज आगे बढ़ गयी। मैंने ट्रेन के पीछे भागा और जैसे मैं भाग रहा था मुझे बड़ी डरावनी चीखें सुनाई दी। कोई बड़ी बुरी तरह से रो रहा था।मुझे पता लगा कि एक बेहद खूबसूरत जवान लड़की अचानक से ट्रेन के एक डिब्बे में मर गयी थी। उसकी लाश को यहाँ लाया गया और   उस लाश को यहीं हमारे बीच यह जो जगह है उधर रखा गया था।"

मैंने न चाहते हुए भी अपनी कुर्सी को पीछे धकेला और उस जगह को देखने लगा जिधर वो इशारा कर रहा था।

“ये एकदम सच्ची बात है साहब। जैसा मैं आपको बता रहा हूँ, बिलकुल वैसे ही हुआ था।”

मेरे पास उसकी बात का कोई जवाब नहीं था। मेरा मुँह सूख गया था। और हवाएं और तारें अपनी चीखो पुकार से इस कहानी की सच्चाई को इंगित करती सी प्रतीत हो रही थी।

उसने कहना जारी रखा, “अब आप ये सुनिए साहब और इस बात का अंदाजा लगाइए कि मैं क्यों इतना परेशान हूँ। एक हफ्ते पहले वह साया दोबारा लौट आया है। और तभी से वह उधर ही मौजूद है। थोड़े थोड़े वक्त में कभी वह मुझे दिखता है और कभी गायब हो जाता है।”

“बत्ती के सामने?”

“जी उसी बत्ती के सामने जो कि सुरक्षा के लिये लगाई गयी है।”

“वह क्या करता प्रतीत होता है?”

उसने उसी इशारे को पहले से भी ज्यादा जोर से करना चालू किया जिसका अर्थ केवल ये निकलता था,”भगवान के लिए रास्ता खाली करो।”

उसने फिर कहना जारी रखा,”मुझे न शांति है और न आराम ही है। वह मुझे कई मिनटों  तक बड़ी दर्द भरी आवाज में पुकारता है। "वहाँ नीचे! सम्भलो! सम्भलो!” वह मुझे इशारे करता रहता है। वह मेरे ऑफिस में मौजूद घण्टी को बजाते रहता है-”

मैं उसकी बात को बीच में टोका। "क्या कल शाम को जब मैं इधर था और तुम दरवाजे की तरफ गये थे तो उसने घण्टी बजाई थी?”

“हाँ, दो बार।”

“देखा, मैं न कहता था", मैंने खुश होते हुए कहा,”यह तुम्हारी कल्पना ही है जो तुम्हे इस तरह से परेशान कर रही है।  कल मेरी निगाहें और मेरे कान घण्टी पर ही केन्द्रित थे। और अगर तुम मुझे जिंदा व्यक्ति मानते हो तो मेरी बात पर विश्वास करो कि जब मैं इधर था उस दौरान एक बार भी घण्टी नहीं बजी थी। और न ही किसी और वक्त बजी होगी, सिवाय उस वक्त के जब दूसरे स्टेशनों में मौजूद लोग तुमसे बात करना चाहते होंगे।”

उसने अपनी गर्दन को हिलाते हुए कहा।"मैंने कभी इस तरह की गलती नहीं की है। मैंने साये द्वारा बजाई गयी घण्टी को इंसानों द्वारा बजाई गयी घण्टी नहीं समझा है। दोनों में फर्क मुझे मालूम है। जब साया उस घण्टी को बजाता है उस वक्त उस घण्टी से एक अजीब सा कम्पन उत्पन्न होता है जैसा किसी और चीज से नहीं होता है। मैंने कभी ये नहीं कहा कि उस घण्टी का बजना आँखों से देखा जा सकता है। मुझे इस बात से कोई आश्चर्य नहीं है कि आपने घण्टी को बजते हुए महसूस नहीं किया परन्तु मैंने किया है।”

“और क्या वो साया उधर तब भी दिखाई दे रहा था, जब तुमने उधर देखा?”

“वो वहाँ था।”

“दोनों वक्त?”

उसने दृढ़ता से अपनी बात फिर दोहराई, “दोनों वक्त।”

“क्या तुम मेरे साथ दरवाजे तक आओगे और अभी देखोगे कि वो है या नहीं?”

उसने अपना निचला होंठ इस तरह चबाया जैसे यह फैसला करना उसके लिए कठिन हो कि उसे जाना है या नहीं लेकिन फिर वह उठ ही गया। मैंने दरवाजा खोला और बाहर सीढ़ी पर खड़ा रहा जबकि वह दहलीज में ही खड़ा रहा। वहाँ पर लाल बत्ती थी। वहाँ पर सुरंग का वो मनहूस का दिखने वाला द्वार था। वहाँ पर ऊँची लिसलिसी दीवारें थी और उन सबके ऊपर टिमटिमाते सितारे थे। लेकिन किसी साये का नामोनिशान नहीं था।

“क्या तुम्हे वह दिख रहा है?”, मैंने उससे पूछा। उसे देखते हुए मैं  उसके चेहरे पर उभरे भावों को गौर से देख रहा था। उसकी आँखें उभरी हुई और तनाव में थी लेकिन यह सब कुछ मेरी आँखों की तरह ही था। चूँकि उधर अँधेरा था तो गौर से ही हमें उधर देखना पड़ रहा था।

“नहीं।” उसने जवाब दिया। “वो वहाँ नहीं है।”

“ठीक है। मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ।”, मैंने कहा।

हम दोबारा अंदर गये, किवाड़ लगाया और अपनी अपनी जगहों पर बैठ गये।अब मैं यही सोच रहा था कि मैं अब बातचीत को इस तरह से जारी रखूँ ताकि उसे समझा सकूँ कि जो कुछ भी वो महसूस कर रहा है वो उसका दिमागी फितूर है, कि उसने बातचीत का तार अपने हाथ में लेते हुए ऐसे कहना चालू किया जिससे मुझे यह समझ आ गया कि अभी तथ्यों पर बातचीत नहीं हो सकती थी। मुझे ऐसा लगा जैसे बातचीत के मामले में मैं उससे कमजोर स्थिति में था और अब मुझे उसकी बात को ही सुनना था।

“अब तक तो आप समझ ही गए होंगे साहब कि मुझे क्या खटक रहा है?”, उसने कहा। “मैं ये जानना चाहता हूँ कि आखिर वो साया मुझसे चाहता क्या है? वह क्यों मुझे बार बार दिखाई दे रहा है, साहब?”

"मैं इस मामले को पूरी तरह नहीं समझ पा रहा हूँ और इस कारण मेरे पास तो उसके प्रश्नों का उत्तर नहीं था।", मैंने उससे कहा।

“वह मुझे किस घटना के खिलाफ सावधान करना चाहता है”,वह अपनी सोचों की भँवर में डूबता हुआ बड़बड़ाया। "आखिर ऐसा क्या खतरा है? वह खतरा किधर है? मुझे यह तो एहसास है कि इस रेलवे लाइन में कोई न कोई खतरा तो है। कुछ न कुछ दुर्घटना इधर होने वाली है। पहले दो बार घटी घटनाओं के बरक्स में इस बार शक करने की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन वो चीज क्या है? ये मुझे परेशान कर रही है। मैं आखिर क्या कर सकता हूँ?” वह काफी देर तक इस बार विचार करता रहा और इस दौरान उसकी आँखें सामने जलते हुए अलाव को देख रही थी और कभी कभी ही ऐसा होता था जब वह मेरी तरफ मुड़कर देखता था। 

उसने अपना रुमाल निकाला और अपने माथे पर उभर आये पसीने की बूँदों को पोछा।

“अगर मैं अपने दोनों तरफ मौजूद लोगों को आगाह करने के लिए खतरे का संदेश देता भी हूँ तो मैं इसके पीछे का कारण उन्हें नहीं बता पाऊँगा।" वह अपनी हथेलियों से पसीने को पोछते हुए कह रहा था। "यह करने से मेरे पर ही मुसीबत आ सकती है और किसी का भला नहीं होगा। वो सोचेंगे के मैं पागल हो गया हूँ। यह कुछ इस तरह घटित होगा। संदेश- 'खतरा! ख्याल रखिये'। जवाब- 'कैसा खतरा? कहाँ?' संदेश - 'पता नहीं! लेकिन भगवान के लिए ध्यान दीजिये!'  वो मुझे नौकरी से निकाल देंगे। और वो इस मामले में गलत भी नहीं होंगे। उनके जगह मैं भी होता तो शायद यही करता।"

उसकी मानसिक पीड़ा देखना दयनीय था। यह एक जमीर वाले इनसान का मानसिक दर्द था जिसे मालूम था कि उसके ऊपर किसी ज़िन्दगी का दारोमदार था और वह उस ज़िन्दगी को बचाने के लिए कुछ भी करने में अपने आप को असमर्थ पा रहा था। यह एक ईमानदार और दयालु आदमी की बेबसी से उपजा दर्द था।

“जब वह मुझे उस लाल बत्ती के नीचे खड़ा पहली बार दिखा", उसने अपने हाथों से अपने स्याह बालों को पीछे की तरफ धकेला और अपनी हाथों को बाहर की तरफ निकालते हुए उसने अपनी कनपट्टी को अपनी उँगलियों से मसलते हुए कहना जारी रखा, “तो उसने मुझे क्यों नहीं बताया कि अगर कोई दुर्घटना होने वाली है तो वह किधर होगी? मुझे यह क्यों नहीं बताया कि इस दुर्घटना को मैं कैसे रोक सकता हूँ? जब दूसरी बार आया तो उसने अपना चेहरा क्यों छुपाया। उसने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि वह मरने वाली है और उन्हें उसे घर से निकलने नहीं देना चाहिए। अगर वह पिछले दोनों बार केवल यह दर्शाने आया कि उसकी चेतावनी सच साबित होती है ताकि मैं उसकी तीसरी भविष्यवाणी को मजाक में न लूँ तो अब तीसरी बार वह क्यों नहीं मुझे साफ़ साफ़ चीजें बता रहा है। और  सबसे जरूरी बात वह मेरे पास ही क्यों आ रहा है। मैं एक आम सिग्नल मैन हूँ जो कि इस बियाबान स्टेशन में तैनात है। वह किसी ऐसे व्यक्ति के पास क्यों नहीं जाता जो किसी ऐसे ऊँचे पद पर बैठा है जिसकी बात लोग सुनेंगे और जो इन चेतावनियों को जानकर उन्हें रोकने की कोशिश करने की ताकत रखता है? मुझे यह सब बातें परेशान कर रही हैं। मैं इन बातों का अर्थ समझ नहीं पा रहा हूँ।"

जब मैंने उस व्यक्ति को इतना उद्विग्न देखा तो मुझे लगा कि उसके और लोगों की सुरक्षा के लिए मुझे ऐसा कुछ तो करना चाहिए जो उसे फिलहाल कुछ वक्त के लिए मानसिक रूप से शांत कर सके। उसे सुकून पहुँचा सके। इसलिए यथार्थ और कल्पना के सवालों को दरकिनार रखते हुए मैंने उसे कहा कि जो अपने काम को जिम्मेदारी के साथ निभाता है उसका भला होता है और उसे इस बात पर खुश होना चाहिए कि उसने अपने काम को समझा भले ही वह इन घटनाओं का मतलब न समझ पाया हो। अपनी इस कोशिश में मैं ज्यादा कामयाब हुआ। मैं उसे इसका यकीन को नहीं दिला पाया कि  इधर कोई साया नहीं था लेकिन उसे इस बात का अहसास करा दिया कि वह इस मामले में जितना कर सकता था उतना कर रहा था और उसे इस चीज से संतुष्ट होना चाहिए। वह शांत हो गया। फिर उसकी पेशेगत जिम्मेदारियाँ उसका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने लगी और जैसे जैसे रात बीतती गयी वह उनमें मसरूफ हो गया। मैं सुबह के दो बजे उधर से निकला। वैसे तो मैं पूरी रात उधर रुकने के तैयार था लेकिन वह नहीं चाहता था कि उसके वजह से मुझे कोई कष्ट हो।

मुझे  इस बात को छुपाने की कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही है कि मैं वापस जाते हुए कई बार मुड़ मुड़ कर उस लाल बत्ती को देख रहा था। वह लाल बत्ती मुझे किसी होने वाले अपशकुन का अहसास करा रही थी और अगर मुझे उस बत्ती के नजदीक सोना पड़ता तो मुझे यकीन है कि मैं चैन की नींद नहीं सो सकता था। मुझे यह बात बताने में भी कोई झिझक नहीं है कि उन दो घटनाओं और उस लड़की के विषय में जानकर एक तरह का अनजाना सा भय मेरे मन के किसी कोने में व्याप्त हो चुका था। अगर वह जानकारी मुझे न मिलती तो मैं ज्यादा खुश और सुकून से रहता।

लेकिन इन सब बातों से इतर जो ख्याल मेरे दिमाग में घूम रहा था वो यह था कि अब मेरा अगला कदम क्या होना चाहिए? इन सब चीजों से वाकिफ होने के बाद मुझे क्या करना चाहिए। मुझे यह तो पता था कि वह व्यक्ति बुद्धिमान था, सावधान था और अपने कार्य के प्रति समर्पित था लेकिन जैसी उसकी मानसिक स्थिति थी इस हालत में वह कब तक ऐसा रह सकता था यह कहना मुश्किल था। भले ही वह इतने ऊँचे पद पर कार्यरत नहीं था लेकिन उसका काम ऐसा था जो कि विश्वास पर चलता था और अगर उसकी मानसिक हालत में सुधार नहीं हुआ तो मुझे नहीं लगता था  कि वह अपने कार्य को उतनी ही जिम्मेदारी से निभा सकता था। वह लोगों के जीवन के लिए खतरा बन सकता था।

मैं नहीं चाहता था कि मैं उसकी जानकारी के बिना उसके उच्च अधिकारियों से इस मामले में कोई बात करूँ। यह उसे धोखा देना होता। इस कारण मैंने फैसला किया कि मैं एक मध्य मार्ग अपनाऊँगा। मैं  उसको कहूँगा कि मैं उसके साथ किसी अच्छे डॉक्टर के पास चल सकता हूँ। हम उस डॉक्टर से उसके साथ हो रहे अनुभवों के ऊपर बात कर सकते थे और आगे हमें क्या करना है इसका निर्णय ले सकते थे। उसने मुझे बताया था कि अगली रात को दोबारा उसकी ड्यूटी लगने वाली थी। वह अगले दिन सूर्योदय होने के एक दो घण्टे के पश्चात अपने कार्य से फारिग होने वाला था और फिर शाम को सूर्य ढलने के करीब वापस अपनी जगह पर वापिस आने वाला था। मैंने शाम को उससे मिलने जाने का फैसला किया।

********

गले दिन की शाम बहुत ही सुहावनी शाम थी और मैं उस शाम का आनन्द लेने के लिए घर से जल्द ही निकल गया। अभी सूर्यास्त भी नहीं हुआ था जबकि मैं उस जगह पर पहुँच गया जहाँ से उस व्यक्ति की कुटिया नुमा दफ्तर तक जाने का रास्ता जाता था। चूँकि उस सिग्नलमैन के आने में अभी भी तकरीबन एक घण्टे लग सकता था तो मैंने फैसला किया कि मैं इस एक घण्टे में आस पास टहल लूँगा। मैं आगे की तरफ आधे घण्टे चल सकता था और जब तक मैं वापिस लौटता तब तक सिग्नल मैन अपने दफ्तर तक पहुँच ही जाता। फिर मैं नीचे उतर कर उसके दफ्तर जा सकता था।

घूमने जाने से पहले मैंने सोचा कि क्यों न एक नज़र नीचे की तरफ मार ही ली जाए। मैं किनारे तक पहुँचा और वहीं से, जहाँ से पहली बार मैंने उसे देखा था, एक सरसरी निगाह नीचे को डाली। मैं बता नहीं सकता कि मुझे उस वक्त कैसा झटका लगा जब मैंने सुरंग के मुहाने पर एक ऐसे व्यक्ति को प्रकट होते देखा जिसकी एक बाजू से उसकी आँखें ढकी हुई  थी और उसका बायाँ  हाथ बड़ी तेजी से हिल रहा था। 

एक अनजाना सा खौफ जिसने मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया था उसके चंगुल से मैंने खुद को तब आज़ाद पाया जब मुझे इस बात का अहसास हुआ कि वह हाथ हिलाता हुआ साया असल में एक ज़िंदा इनसान था। उसकी मौजूद जगह से कुछ दूरी पर ऐसे व्यक्तियों का समूह था जिन्हें देखकर वो वह इशारा करने का अभ्यास करता सा प्रतीत हो रहा था। खतरा बताने वाली लाल बत्ती अभी तक जलाई नहीं गयी थी। वह लाल बत्ती जिस शाफ़्ट पर खड़ी थी  उससे टिकाकर  एक छोटा सा झोपड़ीनुमा ढाँचा तिरपाल और बल्लियों की मदद से बनाया गया था।यह ढाँचा किसी बिस्तर से बड़ा नहीं लग रहा था।

न जाने क्यों मुझे लगने लगा था कि कुछ न कुछ अन्होने जरूर घटित हो चुकी है। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि हो न हो उस व्यक्ति के कुछ न कुछ गलत हो गया था। मुझे लगने लगा था कि मुझे उसे यूँ अकेला छोड़कर नहीं जाना चाहिए था और अगर मैं चले भी गया था तो मुझे किसी न किसी को तो उसकी परेशानी के विषय में बताना चाहिए था। मुझसे यह गलती हो चुकी थी और अपने इस लापरवाह रवैये के लिए खुद को कोसता हुआ मैं जितनी तेजी से हो सके नीचे की तरफ जाती सीढ़ियाँ उतरने लगा।

“क्या  बात है?”, मैंने उन लोगों के पास  पहुँचकर उनसे पूछा।

“सिग्नल मैन आज मारा गया, साहब।”

“कहीं तुम उस व्यक्ति की बात तो नहीं कर रहे जो उस छोटे से ऑफिस में रहता था?”

“जी साहब।”

“कहीं वो तो नहीं जिसे मैं जानता था?”

“अगर आप उसे जानते थे तो आप उसे पहचान जायेंगे”, मुझसे वो व्यक्ति बोला जो उनका नेता लग रहा था। उसने अपनी टोपी उतारी और तिरपाल का एक कोना उठाते हुए मुझसे बोला, "क्योंकि उसका चेहरा अभी भी सही सलामत है।"

वह वही सिग्नल मैन था और वह मर चुका था। मैं उसे बचा नहीं पाया था।

“ओह, लेकिन ऐसा कैसे हो गया? कैसे हो गया ऐसे?”, उसके ऑफिस के तरफ बढ़ते हुए मैंने एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति की तरफ देखते हुए कहा। 

"उसे ट्रेन के इंजन ने काट दिया साहब। इंग्लैंड में उससे बेहतर अपने काम की समझ किसी को नहीं थी लेकिन न जाने ऐसा क्या हुआ कि वह बाहरी पटरी से खुद को हटा नहीं पाया। उस वक्त दिन का उजाला मौजूद था। उसने रोशनी जला और लैंप भी उसके हाथ में ही था।  जब तेजी से आता इंजन सुरंग से बाहर निकला तो उसकी पीठ इंजन की तरफ थी और उसने उसे रौंद दिया। वह व्यक्ति ट्रेन को चला रहा था और वह यही दिखा रहा था कि यह कैसे हुआ। टॉम जरा साहब को बताओ कि यह सब आखिर कैसे हुआ?

वह व्यक्ति, जिसने एक गहरे रंग वर्दी पहनी थी, सुरंग के मुहाने पर वापस चला गया।

“सुरंग के घुमावदार मोड़ से जब मैं आ रहा था तो मैंने उसे सुरंग के आखिर में देखा। ऐसा लग रहा था जैसे मैं उसे ऊँचाई से किसी पर्सपेक्टिव-ग्लास (एक तरह का पुराना टेलेस्कोप) के नीचे की तरफ देख रहा हूँ। अपनी गति रोकने का मेरे पास वक्त नहीं था और मुझे यह भी मालूम था कि वह एक सावधान और जिम्मेदार व्यक्ति है। मैं बार बार घण्टी बजाए जा रहा था और चूँकि उस घण्टी का उस पर असर नहीं हो रहा था तो मैं उस घण्टी को बंद कर दिया और जब मैं उसके नजदीक पहुँचा तो मैं अपनी पूरी ताकत लगाकर चिल्लाया।”

"तुमने क्या कहा था?"

मैंने कहा था,"वहाँ नीचे! सम्भलो! सम्भलो! भगवान के लिए रास्ते से हट जाओ!”

मुझे यह सुनकर झटका सा लगा।

“ओह! वो बहुत ही खौफनाक मंजर था, साहब। मैं उसे आवाज़ लगाते रहा था। मैंने अपने इस हाथ को अपनी आँखों के ऊपर रख दिया था क्योंकि मैं उस दृश्य को नहीं देखना चाहता था। अपनी आँखों को ढके ढके मैं अपने दूसरे हाथ को अंत तक उसका ध्यान खींचने के लिए हिलाता रहा लेकिन अफ़सोस उसका कोई फायदा नहीं हुआ।”

इस घटना को ज्यादा लम्बा न खींचते हुए यहाँ यह कहना ही मुनासिब होगा कि यह एक अजीब घटना थी कि इंजन ड्राईवर ने जिन शब्दों से सिग्नल मैन को सावधान करने की कोशिश की थी वह वही शब्द थे जिन्होंने सिग्नल मैन को इतने दिनों से परेशान किया हुआ था। वहीं उसके वक्तव्य में वो शब्द भी शामिल थे जिन्हें मेरे मस्तिष्क ने - सिग्नल मैन ने नहीं -  उन इशारों के साथ स्वतः ही जोड़ दिया था। 

आप इस घटना का क्या अर्थ निकालते हैं, यह फैसला आपको करना है।

समाप्त

तो यह था चार्ल्स डिकेन्स की कहानी द सिग्नल मैन का मेरे द्वारा किया गया अनुवाद। यह अनुवाद आपको कैसा लगा मुझे अवश्य बताइयेगा। आपकी टिप्पणियाँ मुझे और बेहतर लिखने के लिए और नई नई रोचक कहानियाँ आपके समक्ष लाने के लिए प्रेरित करती हैं। 

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दुई बात में मौजूद अन्य हिन्दी अनुवादों को आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
हिन्दी अनुवाद

© विकास नैनवाल 'अंजान'

8 टिप्‍पणियां:

  1. कई घटनाएं ऐसी होती है जिनका रहस्य हम नही समझ पाते।

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  2. बहुत सुन्दर अनुवाद।
    चार्ल्स डिकेन के लेखन से रूबरू कराने के लिए धन्यवाद।

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    1. अनुवाद आपको पसंद आया यह जानकर अच्छा लगा सर। आभार।

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  3. चार्ल्स डिंंकिन्स कहानी का अनुवाद.. पढ़ कर प्रतिक्रिया के लिए पुनः उपस्थिति लगेगी । आपको सपरिवार दीपपर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ।

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    1. जी आभार मैम। दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  4. बेहतरीन अनुवाद । आपके द्वारा अनुवाद की गई कहानियों में भाषा व कहानी के विषयवस्तु के प्रवाह में कहीं कोई अवरोध नहीं आता...जारी रखियेगा अन्य भाषाओं में लिखे साहित्य का अनुवाद करना ।

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    1. जी आभार मैम। अनुवाद का कार्य निरन्तर चलता रहेगा। आभार।

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