रविवार, 3 नवंबर 2019

साहित्य आजतक 2019 - 1

2 नवम्बर 2019,शनिवार

क्या: साहित्य आजतक दूसरा दिन
कहाँ: आईजीएनसीए(इंदिरा गाँधी नेशनल सेण्टर ऑफ़ आर्ट्स)
कैसे पहुँचे: केन्द्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन से गेट नम्बर से निकल कर किसी से भी पूछ लिए। ऑटो चालीस रूपये में पहुँचा देगा



नवम्बर का महीना है और जब भी मैं इस समय दिल्ली में होता हूँ तो एक ऐसा साहित्यिक मेला है जिसमें शिरकत करने की हमेशा कोशिश करता हूँ। यह एक ऐसी जगह है जहाँ साहित्य में रूचि में रखने वाले मेरे दोस्त भी मिल जाते हैं और हम लोगों को साहित्य रचने वाली विभूतियों के विचारों से अवगत होने का मौका मिलता है। जिन लोगों को हम पढ़ते आये हैं उन्हें सजीव अपने समक्ष देखना और उनके विचारों को जानना सच में ही एक अतुलनीय अनुभव होता है।

इस साल भी नवम्बर आया और साहित्य आजतक भी आया। 2 नवम्बर को भारतीय अपराध साहित्य के मेरे पसंदीदा लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का सेशन इधर होना निर्धारित था तो इसी के चलते मैंने साहित्य आजतक में शिरकत करने का फैसला किया।

मैं सुबह सुबह उठा तो देखा आसामान पर कोहरे की एक परत लगी हुई थी और सूरज महाशय को इस कोहरे को भेदने में दिक्कत महसूस हो रही थी। एक तरह से यह मौसम दिल्ली एन सी आर के प्रदूशण स्तर की चुगली कर रहा था।


दीवाली कुछ ही दिनों पहले होकर गुजरी थी। मैं 31 को ही अपने घर गढ़वाल से फिर जब गुरुग्राम पहुँचा तो यकीन मानिए लगा था कि जैसे एक सुन्दर वातावरण से किसी ऐसे गैस चैम्बर में दाखिल हो रहा हूँ जहाँ आँखे  जल रही थी और गले में खरखराहट महसूस कर रही थी। लेकिन यह सब हमारा ही किया धरा तो है। हम ही इसके जिम्मेदार हैं और इसलिए हम ही भुगत रहे हैं। हम डाल काट रहे हैं और बस देखना यह है कि कब यह डाल कटकर पेड़ से अलग होगी और हम लोग जो इस डाल को काट रहे हैं वो अपने किये की सजा पाएंगे।

लेकिन फिर चूँकि साहित्य आजतक था तो जाना था ही। मैंने इन विचारों को अपने मन से झटका और मैंने इस हाल का सकारात्मक बिंदु देखने की कोशिश की और सोचा कि चूँकि कोहरा है तो शायद गर्मी नहीं होगी और इस कारण चलने फिरने और साहित्य आजतक में घूमने में ज्यादा सहूलियत होगी।

इस तरह से मैंने दिल को तसल्ली दे दी थी। सुबह के काम निपटाने और एक ब्लॉग पोस्ट लिखने के बाद जब मैं घर से निकला तो ग्यारह बज गये थे। निकलते हुए ही व्हाट्सएप्प ग्रुप में बातचीत चल रही थी जिससे पता चला कि कुछ मित्र भी उधर पहुँचने वाले हैं। इसलिए जब मैं निकला तो मैंने एक संदेश डाल दिया कि मैं भी रूम से निकल रहा हूँ।

व्हाट्सएप्प के माध्यम से ही मुझे एक खबर मुझे एक दिन पहले ही मिली थी कि राजन इकबाल सीरीज के रचियाता एस सी बेदी जी नहीं रहे। यह जानकर पहले तो एक झटका लगा क्योंकि उन्होंने कई वर्षों के बाद दोबारा लिखना शुरू किया और उनके उपन्यास लगातार आ रहे थे।  इस साल भी उनका उपन्यास आना था। पर फिर जब बात की पुष्टि हुई तो समझ नहीं आया क्या किया जाए। बेदी जी के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने तकरीबन 1500 बाल उपन्यासों की रचना की थी और अगर आप बचपन में हिन्दी बाल उपन्यास पढने के शौक़ीन थे तो शायद आपने भी उनके उपन्यासों को बढ़े चाव से पढ़ा होगा। मैंने उनके उपन्यास काफी देर में पढने शुरू किये लेकिन जब किये तो मैं उनके ज्यादातर उपन्यास पढ़ने का ख्वाहिशमंद हो गया। बेदी जी ने अपनी रचनाओं से नन्हे मुन्हे पाठक वर्ग के मन में अपनी जगह बनाई थी और यह जगह हमेशा कायम रहेंगी। मैं केवल इतना ही कहूँगा कि बेदी जी हमेशा हमारे मन में अपने रचनाओं के माध्यम से हमेशा मौजूद रहेंगे। खबर पढ़कर मन तो दुखी था लेकिन फिर यही सृष्टि का नियम है। एक दिन इनसान आता है। अपने को मिले वर्षों में कर्म करता है और फिर चला जाता है। बची रह जाती हैं तो उसकी यादें और उसके द्वारा किये गये कार्य। बेदी जी निरंतर लिखते रहे। बीच में पॉकेट बुक ट्रेड के बुरे दिन थे तो शायद उन्होंने लिखना कम किया था लेकिन फिर जैसे ही उन्हें दोबारा मौक़ा मिला वो दोबारा अपनी कलम के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन और उन्हें नेतिक शिक्षा देने के लिए जीजान से जुट गये। हम उनसे काफी कुछ सीख सकते हैं और हमे सीखना भी चाहिए। मुझे लगता है यही हमारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी।

मैं घर से निकला और साढ़े ग्यारह बजे तक मैं मेट्रो स्टेशन में था और फिर उधर से मैंने केन्द्रीय सचिवालय के लिए येलो लाइन मेट्रो पकड़ ली थी। साहित्य आजतक इंदिरा गाँधी सेण्टर और आर्ट्स में आयोजित हो रहा था। मैंने गूगल पहले कर लिया था तो मुझे पता था कि केन्द्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन के गेट नम्बर 2 से कुछ ही दूरी पर यह सेण्टर मौजूद था। चूँकि पहले भी आया था तो इतना पता था कि पैदल ही उधर आसानी से जाया जा सकता था। मेट्रो में अपने साथ सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का उपन्यास 50-50 लेकर चला था। यह उपन्यास मैं फिलहाल पढ़ रहा था और उपन्यास बड़े रोचक मोड़ पर था।

 शोभना और धर्मेश मुंबई आये तो फिल्मों में काम करने थे लेकिन अपने इस सपने को पूरा करने में कामयाब नही हो पाए थे। अब उन्होंने अपने इस काम को तिलांजली दे दी थी। हालात कुछ ऐसे बने  थे कि शोभना ने कुछ दिनों तक हाई सोसाइटी कॉल गर्ल का काम किया था और धर्मेश उस वक्त उसके लिए ग्राहक तय करता था। लेकिन छः महीने पहले शोभना ने अपने इस पेशे से किनारे कर लिया था क्योंकि जामवंत राव पाटिल नाम का शख्स उस पर फ़िदा था और उसके खर्चे उठाने को तैयार था। फिर जब जामवंत राव की चिट्ठी आई और उस चिट्ठी के चलते दो मवाली शोभना के पीछे पड़े तो उसे अपने दोस्त धर्मेश की याद आई। चिट्ठी के मुताबिक उन्हें करोड़ों का माल मिल सकता था और इस माल पाने की खातिर शोभना और धर्मेश पचास पचास प्रतिशत के पार्टनर के रूप में अब गोवा जा रहे थे। लेकिन यह सफर इतना आसान नहीं था। वो दो मवाली खुद को भाई का आदमी बताते थे और उन्हें कत्ल करने में भी कोई गुरेज नहीं था।  वो धर्मेश और शोभना के रास्ते के रोड़े थे जिन्हें हटाना उन्हें अपने बूते की बात नहीं लग रही थी। आगे क्या हुआ यही इस उपन्यास की कहानी थी।


मेट्रो में दाखिल होते ही मैंने एक कोने की जगह पकड़ी और उपन्यास लेकर पढने लगा। वहीं पर मौजूद सीट्स पर दो प्यारी बच्चियाँ और उनका परिवार बैठा था। परिवार बंगाली था। मैंने कुछ दिनों पहले बांग्ला सीखनी शुरू की है तो उनकी कुछ कुछ बोली मैं समझ पा रहा था। किताब तो मेरा मनोरंजन कर ही रही थी लेकिन उसके साथ उन बच्चियों की नटखट हरकतें भी ध्यानाकर्षण करके मेरे चेहरे पर बरबस ही मुस्कान ला देती थी। सचमुच बच्चो की मासूम हरकतें किसी पाषाण का मन पिघलाने की हैसियत रखती है और उन्हें देखते हुए मेरे मन में बस यही आ रहा था कि ये बच्चियाँ हमेशा ऐसी ही मुस्कराती रहें और ऐसी ही शरारते करती रहे। एक बार बीच में उन बच्चियों के पिता ने शरारतों से थोड़ा सा परेशान होकर सबसे छोटी, जो कि शायद तीन चार साल की रही होगी, को शट अप कह दिया था तो जिस तरह से उस बच्ची ने आँख नचाते हुए और मुँह बनाते हुए अपनी तुतलाती आवाज़ में कहा- "शट अप मत तहो मुझे।" यकीन मानिए दिन का सबसे खूबसूरत और सबसे यादगार पल वही था। उसके ऐसा कहने से वहाँ मौजूद सबसे चेहरों पर मुस्कान आ गयी थी।  कोई व्यक्ति परेशान होता तो उस वक्त अपनी परेशानी भूल सा जाता।


उपन्यास एक रोमांचक और तेज गति के कथानक लिए हुए था। बच्चियाँ अपनी शरारतों से आस पास के लोगों का ध्यानाकर्षण और मनोरंजन कर रही थी। और इन दोनो चीजों का लुत्फ़ लेते हुए मुझे मुझे पता ही नही लगा  कब केन्द्रीय सचिवालय आया। मैं सचिवालय उतरा और गेट नम्बर 2 से निकल कर वेन्यू की तरफ बढ़ गया।


गेट नम्बर दो से बाहर निकलते हुए 

कोहरा कोहरा सा है चारो तरफ


गेट के बाहर ही ऑटो वाले भाई भी मौजूद थे जो कि चालीस रूपये में सेंटर तक पहुँचा रहे थे। मुझे तो पैदल चलना था तो मैं पैदल चलता मैं कुछ ही देर में सेंटर के बाहर मौजूद था।  वहाँ पहुँच कर मैंने अपने परिचित राजीव सिन्हा जी, जिन्हें हम गुरूजी कहते हैं, को कॉल लगाया जो कि पहले से ही अंदर थे। वो बाहर आये तो पहले हमने चाय पी और फिर अंदर दाखिल हुए। एक बज गये थे। पौने दो पर पाठक साहब का सेशन होना था। तब तक हमे वक्त काटना था।

बाहर रजिस्ट्रेशन हो रहा था और स्टाम्प लगाकर अंदर आने दिया जा रहा था। मैंने ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराया तो सीधा स्टाम्प लगवाकर अंदर दाखिल हुआ। गुरूजी ने पहले ही यह कार्य कर दिया था।

अंदर पहुँचकर हम लोग रेडग्रैब बुक्स के स्टाल पर पहुँचे जहाँ हमे संदीप नैयर जी मिले। संदीप जी लन्दन में रहते हैं और समरसिद्धा और डार्क नाईट नाम के उपन्यास के लेखक हैं। वोअपनी नई अंग्रेजी की किताब रिवेंज ऑफ़ चंडालस के सिसिले में और साहित्य आजतक में अपने सेशन के लिए इधर आये हैं।  उनसे कुछ देर बात हुई। वहीं पर डॉक्टर दीपक जी थे जिन्होंने अभी राहत इन्दौरी जी की जीवनी राहत साहब: मुझे सुनाते रहे लोग मेरा वाकिया लिखी है। कुछ देर उनसे कुछ विषयों पर बातचीत हुई जिसमें प्रदूषण और उसमें दीवाली का योगदान पर भी हुई। बातचीत चल ही रही थी कि पता चला कि पाठक साहब  आ गये हैं और उनके साथ कुछ और मित्रगण भी आ चुके हैं। तो हम लोगों ने संदीप जी से विदा ली और उधर की ओर बढ़ चले।

पाठक साहब से मिले। पाठक साहब के विशी जी और कुलभूषण जी भी थे। कुलभूषण जी ने मुझे पाठक साहब के दो उपन्यास एक जी रास्ता और खतरे की घण्टी दी जो कि मैं समूह में मौजूद समीक्षा लिखो प्रतियोगिता में जीता था। मेरा तो दिन बन गया। पाठक सहाब के पुराने उपन्यास हार्डकॉपी में मिलना कितनी टेढ़ी खीर है यह तो केवल वही जान सकते हैं जिन्होंने इन्हें हासिल करने की कोशिश की है।

कुल्भूषण जी द्वारा दिए गये नगीने

पाठक साहब के सेशन में कुछ वक्त था तो उन्हें वी आई पी लाउन्ज में बैठाया गया और हम लोग एक बार वहीं आस पास बैठ गये। कुछ किताबों पर चर्चा हुई। साहित्य पर चर्चा हुई । चाय पीने का मन किया तो हम लोग एक बार फिर बाहर को निकले और चाय के ठीये पर पहुँचे। उस दौरान गुरूजी ही मेरे साथ थे और हम लोगों ने यात्रा वृत्तान्त पर बातें की। मुझे वृत्तांत की भाषा में ज्यादा कृत्रिमता पसंद नहीं रही है। उपन्यास में भी मेरा मत ऐसा ही रहा है। मेरे लिए कथ्य जरूरी है। कई बार लोग भाषा की खूबसूरती के चलते कथ्य को हद से ज्यादा बोझिल बना देते हैं और पाठक वो पकड़ नहीं पाता है जो कि लेखक कहना चाह रहा है। लेकिन मैंने यह भी देखा है कि कई लोग इस भाषा की खूबसूरती को ज्यादा तरजीह देते हैं। खैर, अपने अपने विचार है। हिन्दी गंभीर साहित्य में भी ऐसा ही होता है और शायद इस कारण उनके पाठक उन्हें मिल नहीं पाते हैं। मुझे लगता है कि दोनों का अच्छा संतुलन होना चाहिए। पठनीयता पर ज्यादा तवज्जो दी जानी चाहिए। खैर, गुरूजी ने निर्मल वर्मा जी के कुछ यात्रा वृत्तांत पढ़ने की सलाह दी तो उन्हें जरूर पढूँगा।

ऐसी बातें करते करते हम लोग अंदर पहुँचे। अन्दर गोपाल गिरधानी जी हमे मिले जो कि पाठक साहब का सेशन अटेंड करने विशेष रूप से भोपाल से आये थे। हितेश भाई से मिले जो कि अपनी क्लाइंट मीट का जुगाड़ करके सेशन के लिए वक्त निकाल कर आये थे। अब हम लोग स्टेज 3 की तरफ बढ़ गये जहाँ पाठक साहब का सेशन होना था। इस स्टेज का नाम संवाद रखा हुआ था।

हम उधर पहुँचे तो उधर पंजाबी के लेखन पर बातचीत चल रही थी। हम सेशन के आखिरी में ही पहुँचे और कुछ ही बातें हमने ग्रहण की। माँ के ऊपर बात हुई। जनरेशन गैप के ऊपर भी बात हुई। इस प्रोग्राम का नाम सोणे पंजाब दे शब्द था। इस सेशन में पंजाबी कवि प्रो. सतीश कुमार वर्मा के अलावा प्रोफेसर कृपाल कजाक और  नछत्तर जी ने अपने विचार श्रोताओं के समक्ष रखे ।



सोने पंजाब दे शब्द सेशन

सोने पंजाब दे शब्द सेशन - पुस्तक क लोकार्पण


सोने पंजाब दे शब्द सेशन खत्म हुआ तो पाठक साहब का सेशन शुरू हुआ।  उनके सेशन का नाम  मेरे पसंदीदा किरदार था और बातचीत पाठक साहब और मंजीत ठाकुर के बीच में हो रही थी। ये मंजीत जी शायद वही  जिनका ब्लॉग गुस्ताख मैं पढ़ता रहा हूँ। वो अच्छे ब्लॉग लिखते हैं। उन्होंने पाठक साहब से उनके सभी किरदारों के विषय में बात की। सुनील,सुधीर, विमल, जीतसिंह, विवेक अगाशे, मुकेश माथुर और विकास गुप्ता। लेखन से जुड़ी बातें और आत्मकथा की बातें भी इस बातचीत का हिस्सा थी। पाठक साहब जिस बेबाकी के लिए जाने जाते हैं उन्होंने वैसे ही जवाब दिए। अच्छा सेशन था और लोगों को काफी कुछ सीखने को मिला होगा।

हाँ, इस सेशन के दौरान एक अजीब वाक्या हुआ। सेशन के बीच में तेजी से ढोल नगाड़े बजाने की आवाज़ गूंजने लगी।  और एक झांकी सी वी आई पी लाउन्ज से होती हुई किसी अन्य औडोटोरियम की तरफ बढने लगी। सभी उचक उचक कर उधर देखने लगे और मैं  भारतीय सिविक सेंस के विषय में सोचने लगा। हम एक साहित्यिक महोस्तव में थे। अलग अलग स्टेज में गम्भीर या हल्की फुलकी चर्चाएँ चल रही थी। वहाँ क्या ऐसा शोर शराबा करने का कोई तुक था जिससे वो सेशन बाधित हों? यह ऐसे प्रश्न था जो कि आयोजकों को खुद से पूछना चाहिए था? जिसने भी यह व्यवस्था की थी उसे इस विषय में सोचना चाहिए था कि वो किधर है।  बातचीत करने और सुनने के लिए शांति चाहिए होती है और बात का फ्लो बिगड़ जाए तो अच्छा खासे सेशन का मजा किरकिरा हो जाता है। वो तो मंजीत जी और पाठक जी ने बात सम्भाल दी लेकिन फिर भी कई लोग चलते सेशन को छोड़ उधर ही ध्यान देने लगे थे।  आम फेस्ट होता तो कोई बात नहीं थी लेकिन मेरा मत है कि साहित्यिक महोत्सव में ऐसे शोर शराबे की गतिविधियों से बचना चाहिए। यहाँ अपने विचारों और बातों से ध्यानाकर्षण किया जाना चाहिए न कि ढोल नगाड़े बजाकर।

मेरे पसंदीदा किरदार सेशन में पाठक साहब

मेरे पसंदीदा किरदार सेशन में पाठक साहब

इसके बाद इसी स्टेज पर एक और सेशन होना था। पधारो मारे देश: राजस्थानी साहित्य का उत्सव नाम से यह सेशन था जिसमें हेमंत शेष जी, त्रिभुवन जी और रीना मेनारिया जी ने रास्थानी सहित्य के ऊपर बातचीत की। यह साहित्य कितना समृद्ध है, कैसे लोक भाषा में हर चीज को व्यक्त करने के ऐसे ऐसे शब्द हैं जो कि उस चीज का इतना सटीक विवरण देते हैं जबकि कि आम भाषा में वो शब्द खोते जा रहे हैं। अपनी इस बात को और साफ़ करने के लिए वक्ता ने दर्द के लिए प्रयोग किये जाने वाले कई शब्दों के विषय में बताया।  राजस्थानी की समस्याओं के ऊपर भी बातचीत हुई। हाँ, कई बार मुझे रीना जी के लहजे से लगा कि जैसे वो हिन्दी को राजस्थानी की प्रतिद्वंदी की तरह देखते हैं।  ऐसे अक्सर ज्यादतर भारतीय भाषाओ में होता है जबकि मेरा मानना है कि ऐसा नहीं है। मैं खुद गढ़वाली हूँ और मैंने वहाँ भी हिन्दी के प्रति ऐसा ही माहोल यदा कदा बनाते बड़े लेखकों को देखा  हैं लेकिन मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि हिन्दी को साथ लेकर चलने से ही भारतीय भाषाओं का उत्थान हो पायेगा। जितना ज्यादा राजस्थानी साहित्य हिन्दी में उपलब्ध होगा उतना ही राजस्थानी लेखकों के लिए मंच तो बनेगा ही इसके अलावा अनुवादको के रूप में जीविका चलाने वालों का भी भला होगा। मुझे नहीं पता कितने लोग मेरे इस कथन से सहमत होंगे लेकिन मुझे कई अन्य भारतीय भाषाओं में लिखी रचना हिन्दी में पढने में ज्यादा मज़ा आता है बजाय अंगेजी के। मुझे यह लगता है कि हमारा ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि जो भाषा जो समाज बोलता है उसमे प्रचुर साहित्य हो (मूल और अनुवाद) और उस भाषा का साहित्य भी अनुवाद के रूप में हिन्दी में मौजूद हो।  हिन्दी को दुश्मन बनाकर नहीं होगा। उसे अपनाकर, साथ मिलकर चलने से ही दोनों भाषाएँ समृद्ध होंगी। मेरा तो यह विचार है।

पधारो म्हारे देश राजस्थान सेशन


इसके बाद एक और सेशन शुरू होना था। सेशन में भालचंद्र जोशी जी, उर्मिला शिरीश जी और  मधु काँकरिया जी थे। मैंने  मधु काँकरिया जी  को पढ़ा है लेकिन हमे भूख लग आई थी तो हम बाहर को चले गये। उधर  काफी स्टाल लगे थे और हमने उधर थोड़ा नास्ता किया।

वापस आये तो पता चला कि डावर सर आ रहे हैं। वो देर में पहुँच रहे थे। गुरूजी उनको लेने जा रहे थे तो उन्हें बीच में कोई मिल गये तो उन्होंने मुझे जाने को कहा। मैं बाहर गया तो बाहर कोई नही  था। डावर सर को फोन लागाया और एक दो बार की कोशिशों के बाद जब वो मिला तो उन्होंने बताया कि वो अंदर ही हैं। मैं अन्दर पहुँचा। बातचीत हुई।  सुबह मैंने इस मौसम का सकारत्मक पक्ष ये सोचा था था कि ठण्ड होगी तो पसीने से बचेंगे लेकिन वो भी सही साबित नहीं हुआ। बातचीत में इस मौसम में आते पसीने का जिक्र भी शामिल था। हमने एक सेल्फी भी खींची। यह मेरी इस महोत्सव में किसी के साथ खिचाई और पहली और आखिरी सेल्फी थी। जब वापिस घर की तरफ आ रहा था तो सोच रहा था कि यार थोड़ी और फोटो और खिंचवानी चाहिए थी। चलिए कोई नहीं अगला मौका पड़ने पर इसे कार्य को पूरा किया जाएगा।

राजीव सिन्हा जी, मैं कुल्भूषण चौहान जी और विकास डावर जी 


वापस आये तो सीधी बात में मधु जी वाला पैनल डिस्कशन चल ही रहा था। भालचंद्र जोशी जी, उर्मिला शिरीश जी और मधु कंकारिया जी कितना जरूरी है बाजार के ऊपर बात चीत कर रहे थे। मैं इस बातचीत में शामिल होने का इच्छुक था तो सभी को छोड़कर थोड़ी देर के लिए इधर पहुँच गया। जब पहुँचा तो मधु जी एक उदाहरण के जरिये  बाज़ार की कुरूपता को दर्शा रही थीं।  उन्होंने बताया कि किस तरह स्विट्ज़रलैंड में मृत्यु तक का बाजारिकरण हो चुका है और बाकायदा आप कैसे मरने के इच्छुक हैं इसके लिए ऐसी जगहें हैं जो मेनू की तरह आपको मरने के तरीकों की सूची देते हैं। अपनी बात को रखते हुए उन्होंने धर्म के बाजारिकरण को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि किस तरह उधर भी आप पैसे दीजिये और भगवान के दर्शन जल्दी कर सकते हैं।  और किस तरह यह खुद को दोखा देने के बराबर ही है क्योंकि जो व्यक्ति ऐसा कर रहा है क्या वो सच  में भगवान की श्रद्धा रखता है। शायद नहीं।

कितना जरूरी है बाज़ार सेशन


यह बात खत्म हुई थी और लेखन से जीविका उपार्जन की बात चल रही थी कि गुरूजी ने बताया कि वो जा रहे हैं। मैं उन्हें कुलभूषण जी और विकास डावर जी को बातचीत करता छोड़ इस सेशन में शामिल होने आया था। मुझे भी घर में काम और चार बज गये थे तो मैंने भी जाने का विचार किया।

हम लोगों ने सबसे विदा ली और फिर बाहर जाकर चाय पी और पैदल ही स्टेशन की तरफ चल दिए।

एक दिन समाप्त हो चुका था। अब अगले दिन का इन्तजार था।
     

                                                                  समाप्त  

© विकास नैनवाल 'अंजान'

6 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया पोस्ट विकास जी।
    लगा जैसे मैं भी घूम आई वहां। वो भी दूषित हवा झेले बगैर। आज वाली पोस्ट की भी प्रतीक्षा रहेगी।

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  2. बहुत बढ़िया। एक राय है कि एस सी बेदी साहब के बारे में एक डेडीकेटेड ब्लॉग पोस्ट लिखे।

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    1. जी आभार। एस सी बेदी जी के विषय  में लिखने की कोशिश रहेगी।

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