शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

अंततोगत्वा - एक लेख

Image by Sasin Tipchai from Pixabay


कई बार कुछ शब्द आप ऐसे सुन लेते हैं कि आपको उनसे प्रेम सा हो जाता है। आप उन्हें फिर हमेशा इस्तेमाल करते हैं। बार बार इस्तेमाल करते हैं। इतना इस्तेमाल करते हैं कि लोग आपको उन शब्दों से जानने लगते हैं।

जैसे कुछ दिनों पहले तक 'यकायक' और 'कदाचित' मेरे प्रिय शब्द थे। मेरी ज़िंदगी में कुछ भी अचानक या सडनली नहीं होता था, जो होता था वो यकायक होता था। मेरे लिए कोई भी बाद शायद या परहैप्स नहीं होती थी वो कदाचित होती थी। मैं कहीं जा सकता था और कदाचित नहीं भी जा सकता था। सूरज पूरब से उगता था या कदाचित नहीं भी उगता था। क्योंकि ज्यादातर तो मैंने सूरज को उगते नहीं देखा था और कभी भूल भटके देखा भी होता था तो मुझे यह नहीं पता होता था कि वो पूरब है या पश्चिम। मसलन आपको यह बात हास्यास्पद लग सकती है और कदाचित नहीं भी लग सकती है।

लेकिन अब अंततोगत्वा ने इन दोनों ठेल कर अपने लिए जगह बना दी है।सही भी है शब्द ही ऐसा है कि दो की जगह लेता है। यह शब्द बोलते हुए तो जबान कलाबाजी खाती है लिखते हुए भी दो तीन बार गूगल बाबा की शरण में जाना पड़ता है कि सही ही तो लिख रहा हूँ। लेकिन बात यह है कि अंततोगत्वा के अंततोगत्वा मेरी ज़िंदगी में आने के कारण काफी बदलाव हो गए हैं। यह बदलाव अच्छे हैं जिनसे मैं काफी खुश हूँ। 

अब बर्तन धुलने के बाद अपने आप ही मुँह से निकल जाता है- "अंततोगत्वा मैंने बर्तन धो ही लिया।"  फिर एक कटोरी,एक चम्मच और एक थाली को धोने के बाद भी ऐसा अहसास होता है कि कोई बड़ा काम कर दिया है। एक संतुष्टि का अहसास मन में होने लगता है। मैं बिस्तर में लेट कर आधा घंटा सोने का हक रखता हूँ इसका अहसास मुझे हो जाता है। 

आजकल चाय बनती नहीं है अंततोगत्वा वह तैयार होती है। यकीन मानिए जब चाय को कप में डालकर; चाय के कप को अपने साथ ले जाकर अपनी कुर्सी में बैठकर उसकी पहली चुस्की लेकर कहता हूँ कि अंततोगत्वा चाय बन ही गयी तो ऐसा अहसास होता है कि मानों मैंने चाय की पत्ती को चाय के बगानों में उगाने से लेकर उसे प्रोसेस करने और फिर गुरुग्राम तक पहुंचाने के कार्यों को अपने इन कोमल हाथों से पूरा किया हो। बड़ा अच्छा लगता है। 

आजकल ऑफिस से कमरे में पहुँचने के लिए दस सीढ़ियाँ चढ़ता हूँ तो मुखारबिंद से अनायास ही निकल जाता है अंततोगत्वा ऊपर पहुँच ही गया। इसके बाद एक गहरी साँस छूट जाती है और मुझे इतनी ख़ुशी होती है जितनी किसी पर्वतारोही को किसी पहाड़ी के चोटी पर पहुँचने पर भी क्या होती होगी।

ऐसे ही काफी चीजें हैं लेकिन आखिर में बस यही कहूँगा कि अंततोगत्वा यह लेख भी खत्म हो ही गया। विचार के मन की जमीन पर  प्रस्फुटित होने से लेकर इस लेख को बनाने में मुझे बहुत मेहनत लगी। अब नींद आ रही है। शरीर थका हुआ है। चाय बनानी है लेकिन वो भी अंततोगत्वा बन ही जाएगी। तब तक अपनी इन माँस पेशियों को आराम दे दूँ। 

आशा है आप यहाँ तक पहुँच गए होंगे। अंततोगत्वा पहुँचना ही था। अब कहिये अंततोगत्वा यह लेख भी खत्म हुआ। अपनी पीठ थपथपाइए और खुश हो जाइये कि आप आपने कुछ मेहनत वाला काम किया है।

#मने_कह_रहे_हैं

© विकास नैनवाल 'अंजान' 

11 टिप्‍पणियां:

  1. अंततोगत्वा हमने आपका लेख पढ़ ही लिया।

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  2. आप गुरुग्राम में रहते हैं क्या?

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. बहुत से लोग आपकी तरह कुछ वाक्यांशों को कदाचित पसन्द कर अपनी दिनचर्या का अंग बना लेते हैं और अंततोगत्वा भूल जाते हैं । बहुत सुन्दर लेख विकास जी ।

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  5.  जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 30 नवंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद! ,

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    1. सांध्य दैनिक मुखरित मौन में मेरी रचना को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार श्वेता जी।

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