रविवार, 27 अक्तूबर 2019

नेता,प्रचार,इलेक्शन और ईमानदारी की उम्मीद

चलो हरियाणा में चुनाव खत्म हो ही गये। अब नेताओं को बस जोड़ तोड़ करके थोड़ी खरीद फरोख्त करके सरकार बनानी बाकी है। इसी के साथ आम जनता को भी थोड़ी राहत मिलेगी और वह भी अगले पाँच सालों तक के लिए चैन की बंसी बजा पाएंगे।

चुनाव की तिथि निर्धारित होने से काफी पहले से ही मेरे आस पास ऐसे बदलाव आने लगे थे कि मन में रह रहकर एक ख्याल आ रहा था। पहले सोचा उसी वक्त इसे लिख दूँ लेकिन फिर सोचा पहले यह चुनावी खेल खत्म होने दूँ और उसके बाद ही कुछ लिखा जाए।


बात ऐसी है कि चुनावी तैयारियों के चलते ही गुरुग्राम के जिस इलाके में मैं रहता हूँ उसमे चारों तरफ मुझे कुछ नेताओं के होअर्डिंगस दिखने लगे थे। सड़क में मौजूद स्ट्रीट लाइट्स हों या आते जाते ऑटो रिक्शे या टी शर्ट पहने कुछ लोग सभी उन नेताओं के मुस्कराते चेहरे ढो रहे थे। समाज सेवा उन तस्वीरों से टपक रही थी और फोटो में झलकते तेज को देखकर मन में यह आश्वासन भी होता था कि चलो भले ही गुरुग्राम की सड़के चमक-दमक वाली न हो, भले ही थोड़ा सा पानी पड़ने पर गुरुग्राम ऐसे थम जाता हो जैसे हम अभी भी मध्यकालीन युग में जी रहे हों, भले ही अपराध दिनों दिन बढ़ते जा रहे हों लेकिन इन सब के बीच हमारे नेता तो चमक रहे हैं, उनकी प्रचार की गाड़ी सरपट दौड़ रही है, वह न तो स्थगित होती हैं और न ही रूकती है। और यह प्रचार सड़कों पर ही नहीं आभासी गलियारों में देखने को मिलता है। मेरी फेसबुक की टाइम लाइन हो या किसी साईट का बैनर। हर जगह से उन नेताओं के चेहरे मुस्कराते हुए मेरे तरफ झाँक रहे थे और मुझे विश्वास दिला रहे थे कि वह मेरे लिए ही तो खड़े हैं। बस मुझे उन्हें चुनना है और फिर मेरी सारी परेशानियाँ वो हर लेने वाले हैं। उनसे पहले जो आये वो लुटेरे थे नाकामयाब थे लेकिन वो ऐसे नहीं है। फेसबुक में उनके विडियो आते जिसमें वो दर्शाते कि कैसे वो समाज का साथ दे रहे हैं। किस प्रकार वो समस्याओं से लड़ने वाले हैं। किस प्रकार एक बार उन्हें कमान थमा दी तो बस सब बढ़िया ही बढ़िया होगा। मैं यही सोचता था कि ऐसे ऐसे विज़नरी हमारे बीच हैं जो चुनावी बिगुल बजाते ही बाहर निकल पड़े हैं और मैं अब तक इससे अंजान था। मुझे अपने अंजान होने का यकीन अब हो ही चुका था।

यह सब मैं देखता जा रहा था। और देखते देखते मैं एक बार यह सोचने लगा कि कितनी मेहनत ये बेचारे कर रहे हैं। बारिश में जितना पानी गुरुग्राम में नहीं बहता है उतना पैसा ये प्रचार में बहा रहे हैं। होअर्डिंग का पैसा, रिक्शे का पैसा,आभासी दुनिया का पैसा। इतना पैसा ये लोग लगा रहे हैं।

पहला प्रश्न तो मन में ये आया कि इतना पैसा आखिर आया कहाँ से? और फिर दूसरा प्रश्न मन में ये आया कि क्या इतना पैसा लगाने के बाद जो व्यक्ति ताकत पायेगा तो क्या वह सचमुच ईमानदार होगा? क्या एक नागरिक के नाते मेरा उससे ईमानदार होने की उम्मीद करना हास्यास्पद नहीं है? जो इतना पैसा लगाएगा वह दोबारा इतना पैसा कमाने की कोशिश करेगा ही। नहीं करेगा तो अगली बार लड़ेगा कैसे? एक जनप्रतिनिधि को आखिरकार तनख्वाह मिलती ही कितनी है? उतने की तो महीने में वो लोग शराब और काजू ही बाँट देते होंगे अपने सहयोगियों को। 

 ऐसे में अगर हमे ईमानदारी चाहिए तो क्या हमे ये सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि कम से कम खर्चे में चुनाव लड़ा जा सके? क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो आम आदमी चुनाव कैसे लड़ पायेगा? फिर तो यह पूंजीपतियों का ही काम नहीं रह जायेगा?

सरकार अगर ईमानदार चाहिए तो सरकार चुनने के तरीके को कम खर्चीला बनाना ही हितकर न  होगा। शायद प्रचार का बजट निर्धारित रहता है लेकिन लागू कितना होता है ये तो इलेक्शन कमीशन ही मालिक है। 

पर क्या ऐसा मुमकिन है? शायद नहीं?

और मेरे ये सब सोचते सोचते ही इलेक्शन का दिन आ गया। मुझे थोड़ी राहत मिली क्योंकि उससे पहले सभी मुख्य प्रचार सामग्री हटा दी गयी थी लेकिन फिर भी यदा कदा उन नेताओं के चेहरे किसी की टी शर्ट से झांकते हुए दिख जाते जैसे मुस्कराकर कह रहे बच्चू जब तक वोट न ले लें तुमसे तब तक पीछा तो नहीं छोड़ेंगे। और मेरे मन में वो गाना बजने लगता था...

तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती, नजारे हम क्या देखें...

बस फर्क इतना था कि मैंने चेहरा नहीं देखना चाहता, पर वो फिर भी दिखाने में कामयाब हो जाते थे क्योंकि कुछ दिनों पहले तक हर नजारे में तो उनका ही चेहरा लगा हुआ था। पर अब सुकून है। भले ही कुछ देर के लिए ही सही।

© विकास नैनवाल 'अंजान'

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