मैं और वो

मैं और वो - विकास नैनवाल
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मैं देखता हूँ,
ठहरता हूँ
सोचता हूँ 
फिर चलने लगता हूँ,
सोचकर 
कि मुझे क्या,



वो देखता है,
वो ठहरता है
वो सोचता है
फिर चलने लगता है
सोचकर 
कि उसे क्या,


और 
फिर मैं 
सड़कर पर गिरा 
तड़पता रह जाता हूँ
- विकास नैनवाल 'अंजान'


मेरी दूसरी रचनाएँ आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

© विकास नैनवाल 'अंजान'

10 टिप्पणियाँ

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  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 24 सितंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. जी, मेरी रचना को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार।

      हटाएं
  2. वाह शानदार, आखिर ऐसा होने तक सभी बचकर निकल ने का रास्ता अपनाते हैं।
    संवेदना हीन मानव।
    अप्रतिम।

    जवाब देंहटाएं
  3. एक-एक शब्द भावपूर्ण
    संवेदनाओं से भरी बहुत सुन्दर कविता.

    जवाब देंहटाएं
  4. लाजवाब भावाभिव्यक्ति ।

    जवाब देंहटाएं

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