शनिवार, 6 अप्रैल 2019

रहस्यमय खबरी

अनुवाद : विकास नैनवाल 'अंजान'

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नोट: 'रहस्यमय खबरी' A Burglar's Ghost  नाम की कहानी का हिन्दी अनुवाद है। यह कहानी डब्ल्यू बॉब हॉलैंड द्वारा सम्पादित किताब ट्वेंटी फाइव घोस्ट स्टोरीज में मौजूद थी। इस किताब में लेखक का नाम तो दर्ज नहीं था लेकिन कहानी मुझे रोचक लगी थी तो सोचा इसका हिन्दी अनुवाद कर दूँ। यह किताब पब्लिक डोमेन में है।

इस ब्लॉग में मेरा एक मकसद पब्लिक डोमेन में मौजूद कहानियों का हिन्दी अनुवाद करना भी है। ऐसी कई कहानियों से मैं वाकिफ हूँ जो पठनीय हैं लेकिन चूँकि प्रसिद्ध नहीं है तो उनका अनुवाद कोई नहीं करता है। यह काम मैंने करने की ठानी है।  

यह काम मैं क्यों कर रहा हूँ इसके पीछे कई कारण हैं। पहला मुझे ऐसी कहानियाँ पसंद आती है तो मैं चाहता हूँ कि मेरे जैसे दूसरे लोग भी इनका आनंद ले सके। इसके  साथ साथ मैं अपने अनुवाद की कला को पोलिश भी करना चाहता हूँ ताकि आगे जब वक्त लगे तो समसमायिक हॉरर साहित्य को भी हिन्दी में अनूदित कर सकूँ। इसके अलावा ब्लॉग के लिए एक समाग्री भी मिल जाती है। ब्लॉगर वैसे भी कंटेंट की तलाश में रहते ही हैं। हा हा। 

जोक्स  अपार्ट, आशा है मेरा यह प्रयास आपको पसंद आएगा। अगर आपको यह कहानी पसंद आती है मुझे बताइयेगा। अब पढ़िये  रहस्यमय खबरी


                                                             
मैं कोई कल्पनाशील इनसान नहीं हूँ और जो कोई भी मुझे जानता है वो यह बता सकता है कि मैंने किसी भी विषय के ऊपर कभी भावुकता में बहकर विचार नहीं किया है। मेरा स्वभाव ही ऐसा है कि मैं हर चीज को व्यवाहरिक दृष्टिकोण से देखता हूँ। मेरा यह गुण अब और ज्यादा इसलिए भी विकसित हो चुका है क्योंकि मैं पिछले बीस सालों से वेस्टफोर्ड, जो कि हमारे सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक जिले का एक बड़ा सा क़स्बा है, की डिटेक्टिव पुलिस फाॅर्स में कार्यरत हूँ। एक पुलिसवाले को, जैसा की आप सभी लोग मानेंगे भी, अपने काम के सिलसिले में अक्सर इतनी वास्तविक ज़िन्दगी से जूझना पड़ता है कि अक्सर उसके अन्दर व्यवहारिकता के गुण ही विकसित हो पाते हैं। इस चीज के कारण इस बात की सम्भावना काफी बढ़ जाती है कि वो केवल वास्तिविक चीजों पर ही विशवास करे न कि ऐसी चीजों पर जो कि अलौकिक हों। परन्तु इन सब चीजों के बावजूद भी काफी समय तक मेरा इस बात पर विश्वास था कि मैंने अपने जीवन में जितनी तरक्की पाई है उसमें काफी बड़ा हाथ एक काफी नाम चीन चोर के प्रेत का भी रहा है। मैंने अपने यह कहानी बहुत लोगों को सुनाई है और उन लोगों से इस कहानी के ऊपर अलग अलग तरह की टिप्पणियाँ मुझे सुनने को मिलती रही हैं। भले ही सुनने वालों की टिप्पणियों में व्यंग्य रहा हो या वो मेरी बात से सहमत रहे हों; सच पूछो तो मुझे इस बात से कभी ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। मुझे अपनी कहानी की सत्यता पर पूर्ण विश्वास रहा है और यही चीज मेरे लिए महत्वपूर्ण है।


अट्ठारह साल पहले वेस्टफोर्ड में मैं एक आम वर्दीवाला पुलिस अफसर था। मैं उस वक्त तेईस साल था और दो मामलों के प्रति मैं काफी संजीदा था। पहली तो अपनी तरक्की को लेकर  और दूसरी अपनी शादी को लेकर। हाँ, इसमें को दो राय नहीं है मुझे अपनी पदोन्नति से ज्यादा  चिंता अपनी शादी की थी क्योंकि मेरी प्रेमिका ऐलिस मूर, वेस्टफोर्ड की सबसे खूबसूरत और सबसे होशियार लड़कियों में से एक थी। मेरा पदोन्नति को शादी से पहले रखने का कारण केवल यही था कि मुझे अफसर बनकर ही शादी रचानी थी। मैं यह जानता था और इसलिए हमेशा ऐसे मामलों के ताक में रहता था जिससे मैं अपने साथी सहकर्मचारियों से विशिष्ठ दिख सकूँ। इस कारण मैं अपने कार्य के प्रति इतना सजग था कि मेरे आला अफसरों की नज़रों में मैं आने लगा था और इस कारण अपने कार्यक्षेत्र में कामयाबी हासिल करने की सम्भावना मेरे लिए ज्यादा होने लगी थी।

यह सितम्बर अट्ठारह सौ तिहत्तर की एक शाम थी जब मैं अपने घर में बैठा हुआ था और इस बात पर मंथन कर रहा था कि ऐसा मुझे क्या करना चाहिए कि मुझे वो पदोन्नति मिल सके जिसके इच्छा मैं मन में दबाए बैठा था। वेस्टफोर्ड में उन दिनों शान्ति थी और मुझे यह कहते हुए शर्म तो आती है लेकिन मन के किसी कोने में मेरी यह इच्छा था कि काश इधर कुछ ऐसा खौफनाक घटना हो जाये जिससे हलचल मच जाये और उसको सुलझाने में मेरा कोई बड़ा हिस्सा हो। मैं इन्ही विचारों में खोया हुआ था कि अचानक मुझे एक आवाज़ सुनाई थी, "गुड इवनिंग, ऑफिसर?"

मैं  झटके से मुड़ा। उस वक्त लगभग सूरज ढल चुका था और मैंने घर की बत्ती नहीं जलाई हुई थी। लेकिन इस सबके बावजूद मैं आसानी से यह देख पा रहा था कि खिड़की और दरवाजे के बीच में मौजूद संदूकची के बगल में एक मानव आकृति बैठी हुई थी। उसकी कुर्सी सन्दूकची और दरवाजे  के बीच में मौजूद थी और मैंने यह अनुमान लगाया कि वह बेहद चुपचाप तरीके  से कमरे में दाखिल हुआ था और मुझसे बात करने से पहले ही कुर्सी पर बैठ चुका था।

"गुड इवनिंग" मैंने जवाब दिया।"तुम कब आये? मुझे इसका कोई अहसास नहीं हुआ।" मैंने हैरत जताते हुए उससे प्रश्न किया।

मेरे प्रश्न करने पर वह हँसा। उसकी  हँसी बहुत धीमी थी और मुझे उसमें धूर्तता का अहसास हो रहा था। "नहीं। मुझे लगता है आपको अहसास नहीं हुआ। मैं स्वभाव से बहुत शांत किस्म का आदमी हूँ। आप ये भी कह सकते हो कि मैं निःशब्द  हूँ। "

मैंने उसे गौर से देखा। मैं उसकी मौजूदगी से आश्चर्यचकित महसूस कर रहा था। वह एक तगड़ा आदमी था। उसका चेहरा चौकोर था और उसकी नाक छोटी और नोकीली थी, उसकी आँखें छोटी थी और भौं मोटी मोटी थी। जब वह बोलता था तो उसकी आँखों में एक खास तरह की चमक को मैं देख पा रहा था।  उसके कपड़े उसके चेहरे से मेल खा रहे थे।

उसने एक मोटे कपड़े का बेढंगा सा सूट पहना हुआ था। उसकी मोटी गर्दन के चारो तरफ एक चटकीले रंगों वाला गुलूबंद बंधा हुआ था। अपनी बड़े बड़े हाथों की मोटी मोटी उँगलियों से वह अपनी ऊनी टोपी घुमाए जा रहा था। टोपी भी सस्ती सी लग रही थी। उसके चेहरे पर एक तरह की मुस्कराहट थी जिसके कारण मैं असहज महसूस कर रहा था।

"तुम मुझसे क्या चाहते हो?", मैंने पूछा।

"बस आपसे थोड़ा सा काम था।", उसने जवाब दिया।

"तुम्हे दफ्तर में जाना चाहिए था।", मैंने उसे समझाया,"हमे घर में रिपोर्ट लिखने की इजाजत नहीं है।"

"आप ठीक कह रहे हैं,साहब ", उसने जवाब दिया, "लेकिन मुझे खास आपसे ही काम था। आप ही ऐसे व्यक्ति हैं जो मेरा काम कर सकते हैं। अगर मैंने आपके दफ्तर में सुप्रीटेंडेंट से बात की होती तो ऐसा मुमकिन था कि वो किसी और को मेरे कार्य में लगा देते। लेकिन यह चीज मुझे स्वीकार नहीं होती। वो क्या है न अफसर आप अभी जवान हैं और आपको पदोन्नति भी चाहिए होगी? चाहते है न,आप?"

"तुम्हे आखिर चाहिए क्या?" मैंने फिर से सवाल किया।

"क्या आप तरक्की नहीं चाहते हैं?" उसने अपनी बात दोहराई।"सच सच बताइये,साहब।"

मैंने उसकी बात सुनी और मुझे नहीं लगा कि मुझे अपनी तरक्की की चाह को उससे छुपाना चाहिए। मैंने उसे बताया कि मुझे तरक्की की चाह है।

"बेहतर", उसने संतुष्ट होते हुए मुस्कराकर कहा। "मुझे खुशी हुई यह जानकर। यकीन मानिए साहब जो ख़ास बात मैं आपको बताने वाला हूँ उसे जानकर आपकी चाहत आपकी मुट्ठी में होगी। अगर आप इस काम को करने में सफल हो जाते हैं तो कुछ ही दिनों में आप एक सार्जेट बन जायेंगे। आपके अफसर आपकी चतुराई की तारीफ़ करते नहीं थकेंगे। आप यह बात मुझसे लिखवा कर ले भी सकते हैं।"

"तुम जो कहना चाहते हो साफ़ साफ़ कहो।" मैंने उससे इस तरह कहा जैसे मुझे मालूम हो कि उसके कहने का मतलब क्या है। "तुम अपने जोड़ीदारों की मुखबिरी करना चाहते हो और इस काम के लिए शायद तुम्हें कुछ ईनाम विनाम भी चाहिए होगा।" मैंने अपनी चतुराई का प्रदर्शन करते हुए उससे कहा।

उसने अपनी गर्दन हिलाते हुए कहा- "ईनाम!! नहीं वो मेरे किसी काम का नहीं है। अगर ईनाम के तौर पर मुझे हजार पौंड भी मिलते हैं तो भी मेरे लिए उनकी कोई उपयोगिता नहीं है। मैं यह काम किसी ईनाम के चक्कर में नहीं कर रहा हूँ, साहब। अच्छा आपने किसी 'शातिर' जिम का नाम सुना है?"

'शातिर' जिम। मेरे दिमाग में एक छनाका सा हुआ। मैं एक बुरा जासूस होता अगरचे मैंने शातिर जिम का नाम नहीं सुना होता। शातिर जिम इंग्लैंड के सबसे चालाक चोर का उपनाम था। वह अपने चोरी के कारनामों के कारण इतना कुख्यात था कि घर घर में उसकी बात होती थी।  वह इस तरह से चोरी को अंजाम देता था कि किसी को कानो कान खबर नहीं होती थी और इस कारण उसका यह नाम मशहूर हो गया था। उस दौरान उससे जुड़ी हुई एक और जरूरी बात हुई थी जिसके कारण उसका नाम काफी उछला था। 1871 में नार्थमिनिस्टर में हुई एक चोरी के लिए उसे दस साल कठोर कारावास की सजा हुई थी लेकिन शातिर जिम दो साल की सजा काटने के बाद ही इतनी चालाकी से जेल से फरार हो गया था कि उसका उसके बाद नामओनिशान नहीं मिला था। वो इस वक्त कहाँ है इसके विषय में कोई कुछ नहीं जानता था परन्तु पुलिस महकमे में यह बात आम थी कि हो न हो वो अपने पुराने धंधे में वापस लग चुका था।

"शातिर जिम", मैंने हैरत से उसकी बात दोहराई,"हाँ, मैंने उसका नामा तो सुना है। क्या तुम उसके विषय में कुछ जानते हो?"

वो मुस्कराया और उसने सहमति दर्शाने के लिए अपनी गर्दन को जुम्बिश दी,"शातिर जिम अभी इस क्षण वेस्टफोर्ड में है। मेरी बात सुनिए ऑफिसर। आज की रात शातिर जिम एक जगह सेंध मारने वाला है। उसका शिकार मेपलटन रोड पर रहने वाली बूढी मिस सिंगलटन होने वाली है। आपको तो मालूम ही होगा कि वो कितनी अमीर है। उस जगह पर केवल महिला नौकर चाकर और जानवर ही रहते हैं। उधर एक बहुत ही बेशकीमती प्लेट मौजूद है। शातिर जिम उसी के फ़िराक में है। वह रसोईघर के पीछे बर्तन मांझने वाली जगह में मौजूद  खिड़की के माध्यम से करीब एक बजे भीतर दाखिल होगा। वह पिछले और अगले रसोईघर से होता हुआ, खाने के भंडारघर में दाखिल होगा और उधर मौजूद तिजोरी पर काम करना चालू करेगा। उधर ही वह प्लेट मौजूद है जिसके विषय में उसके दोस्तों ने पोर्टलैंड में उसे बताया था।"

"तुम यह सब कैसे जानते हो?" मैंने उससे प्रश्न किया।

"आप आम खाईये, गुठलियाँ क्यों गिनते हैं, साहब। वैसे भी अगर मैं आपको बताना भी चाहूँ तो भी आपके पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा। मैं केवल यह चाहता हूँ कि आप आज की रात उधर मौजूद रहें और शातिर जिम को रंगे हाथ पकड़ लें। इससे आपको पदोन्नति मिल जाएगी और मेरा काम भी बन जाएगा। आपको उधर पहले से मौजूद होना पड़ेगा ताकि आप उसे भीतर जाते देख सको। फिर आपको उसका पीछा करना है ताकि आप उसे चोरी की वारदात को अंजाम देते हुए पकड़ लें। हाँ, इस बात का ख्याल रखियेगा का साहब कि आपके पास हथियार हो। जिम बेहद खूँखार आदमी है और अगर आपके पास हथियार न हुआ तो उस पर काबू पाने में मुश्किल हो सकती है। आपकी जान लेने में वह  बिलकुल भी नहीं हिचकिचाएगा।"

"तुम मेरी बात सुनो, भले आदमी। तुम्हे मालूम है यह सब कितना अजीब है। मैं तुम पर कैसे विश्वास कर लूँ। तुम मुझे अपने विषय में बताओ और यह भी कि तुम्हे यह जानकारी कैसे प्राप्त हुई। तुम्हे शातिर जिम के मंसूबों का कैसे पता चला? मैं यह दर्ज करूँगा और यकीन मानो तुम्हे किसी भी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।" मैं यह कहकर रिपोर्ट दर्ज करने के लिए सामान लाने के लिए मुड़ गया।

सामान ढूँढने में मुझे कुछ ही क्षण लगे होंगे लेकिन जब मैं वापिस मुड़ा तो वह व्यक्ति गायब हो चुका था। दरवाज़ा बंद था। मैंने दरवाजे के खुलने और बंद होने की आवाज़ भी नहीं सुनी थी। मैं तेजी से दरवाजे पर गया और मैंने उसे खोलकर नीची जाती पतली सीढ़ियों पर नज़र फिराई। उधर कोई नहीं था। मैं सीढ़ियों से होता हुआ नीचे रास्ते तक पहुँचा तो मुझे उधर मेरी मकान मालकिन मिसेज मेरिनर मिलीं। वह इमारत के खुले दरवाजे के निकट थीं और अपने किसी महिला मित्र के साथ थीं। मैंने उनकी बातचीत के बीच में दखल देते हुए उनसे  पूछा,"वह आदमी जो अभी नीचे आया था वो किस दिशा में गया है?"

मिसेज मेरिनर ने मुझे अजीब निगाहों से देखा और कहा- "इधर से अभी कोई आदमी नहीं आया है, मिस्टर पार्कर। कम से कम पिछले पौने घंटे से तो कोई अंदर से बाहर नहीं आया है। मैं कुछ देर के लिए हवा खाने के लिए आई थी और मिस हिग्गिंस के साथ तब से इधर ही खड़ी हूँ। वहीं मिस हिग्गिंस इधर पूरे दिन भर कपड़ों पर स्त्री कर रही थी और यही खड़ी रहीं हैं। उन्होंने भी किसी अपरिचित को अंदर से आते जाते नहीं देखा है।"

"आप ये कैसी बकवास कर रही हैं", मैंने झुँझलाते हुए कहा,"एक आदमी मेरे कमरे से अभी अभी नीचे आया होगा। तकरीबन बीस मिनट पहले आपने ही तो उसे ऊपर भेजा होगा। उसने मुझसे बात की और अब आप ये बेतुकी बात कर रही हैं।"

मिसेज मेरिनेर ने मुझे घोर आश्चर्य से देखा और फिर एक गहरी साँस लेकर बोलीं- "मिस्टर पार्कर, मुझे माफ़ कीजियेगा पर मुझे लग रहा है या तो आप नशे में हैं या आपको कोई ऐसी चीजें दिखाई देने लगी हैं जिनका अस्तित्व नहीं है। पिछले एक घंटे से इस दरवाजे से न कोई अंदर घुसा है और न ही कोई बाहर गया है। मैं और मिसेज हिग्गिंस इस बात पर पवित्र बाइबिल की कसम भी खा लेंगे। हम सच कह रहे हैं। हमे आपसे झूठ बोलकर क्या मिलेगा?"

मैं ऊपर गया और अपने कमरे के अगल बगल के कमरों में मैंने उसे ढूँढा। उस आदमी का कहीं नामोनिशान  नहीं था। मैंने अपने बिस्तर के नीचे देखा तो वह उधर भी नहीं था। हो न हो वो नीचे ही गया था। लेकिन अगर ऐसा होता तो उन औरतों की नज़रों में वह जरूर आता। घर में घुसने का केवल एक ही दरवाजा था। लेकिन फिर वो औरतें मुझसे झूठ क्यों बोलेंगी। उसके पीछे कोई कारण नहीं था। आखिर हुआ क्या था? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। जब मुझे कुछ भी नहीं सूझा तो मैंने इस विषय में सोचना छोड़ दिया और मैं अपना पाइप पीने लगा। जब तक मेरे पाइप का आखिरी कश मैंने लिया तब तक मैं यह निर्णय ले चुका था कि हो न हो मिसेज मेरिनेर और मिसेज हिग्गिंस ही नशे में रहे होंगे और वह आदमी उन्हें गच्चा देकर उस दरवाजे से बाहर निकल गया रहा होगा। इसके अलावा और कोई चीज मुझे इस वक्त सूझ नहीं रही थी। मैं यह तो बिलकुल नहीं समझता था कि इस घटना में कुछ अलौकिक तत्व छुपे हुए हैं। वह आदमी एक जीते जागते आदमी के सिवाय कोई प्रेत वगेरह था यह चीज मैं सोच भी नहीं सकता था।

उस रात मेरी ड्यूटी नहीं थी और जैसे जैसे दिन ढलता गया मैंने इस चीज का दृढ निश्चय ले लिया कि मैं एक बार तो मिस सिंगलटन के घर जाऊँगा और देखूँगा कि मेरे उस अजनबी खबरी की बातें सही थीं या नहीं। मेरा यह मानना था कि हो न हो वो आदमी शातिर जिम का कोई पुराना साथी थी। उनका आपस में कुछ छत्तीस का आँकड़ा रहा होगा और जब उसे जिम की इस योजना के विषय में पता लगा तो उसने ऐसे अपना हिसाब बराबर करने की ठानी थी। खैर, दो चोरों की बीच की लड़ाई से एक अपराधिक शख्स अगर सलाखों के पीछे पहुँचता है तो इसमें समाज का ही फायदा था। मैंने ठान लिया था कि मैं इस कहानी की सच्चाई का पता लगाकर रहूँगा। मैंने यह भी निर्णय कर लिया था कि मैं इस विषय में अपने बड़े साहब को कुछ नहीं बताऊंगा। अगर यह कहानी झूठी निकली तो बेवजह मेरी किरकिरी उनके सामने हो जायेगी। इसके उलट अगर कहानी सही निकलती है तो मैं शातिर जिम को सबके सामने लाकर अपने लिए काफी नाम कमा सकता हूँ। सभी मेरी इस सफलता से भौंचक रह जायेंगे।

मैंने काफी तेजी से अपनी योजना बना ली थी। अपने साथ एक रिवॉल्वर लेकर मैं मिस सिंगलटन के घर की तरफ निकल पड़ा था। वहाँ की नौकरानी को मैं जानता था- वह एक अधेढ़ उम्र की तेज तर्रार महिला थी जो आसानी से डरने वाली नहीं थी। यह मेरे लिए अच्छी बात थी। मैंने उसे वह सब बता दिया था जो मुझे उसे बताना जरूरी लगा था। वह मुझे उस कमरे में छुपाकर रखने के लिए राजी हो गई थी जहाँ पर तिजोरी और तिजोरी में मौजूद प्लेट थी। तिजोरी के सामने ही एक छोटी सी अलमारी थी जिसके अंदर से मुझे चोर की सारी  गतिविधियाँ दिख सकती थी और मैं उसे सही वक्त पर गिरफ्तार कर सकता था। बस अब अगर उस अजीब आदमी की बात में कुछ भी सच्चाई होती तो शातिर जिम को रंगे हाथों पकड़ने और उसे फिर जेल से ठूँसने से मुझे कोई नहीं रोक सकता था।

आधी रात गुजर चुकी थी। पूरा घर शांत था। मैं चुपचाप भंडारघर गया और उधर मौजूद आलमारी में मैंने खुद को बंद कर दिया। उधर दो छोटी छोटी झिर्रियाँ थी जिनमें से किसी में से भी मुझे कमरे का पूरा नज़ारा मिल रहा था। अलमारी में जगह ज्यादा नहीं थी तो मैं जैसे तैसे उसमें फँसा हुआ था। धीरे धीरे वक्त गुजर रहा था। मेरे दिमाग में यही बात चल रही थी कि क्या यह वह अवसर होगा जिसमें मुझे अपने आप को साबित करने का मौक़ा मिलेगा। शाम को जैसी अजीब घटनाएं हुई थी उसके कारण इस मामले में एक अलग तरह का अहसास था जो कि मुझे परेशान कर रहा था। मुझे सच क्या है और झूठ क्या इस पर विश्वास करने में थोड़ा दिक्कत महसूस हो रही थी।

मैं यही सब बातें सोच रहा था कि अचानक से एक आवाज हुई और मैं चौकन्ना हो गया। आवाज़ किसी दरवाजे या तख्ते की चरमराने की थी लेकिन चूँकि मैं इसकी अपेक्षा कर रहा था तो इस हल्की सी आवाज़ पर भी मेरा ध्यान चला गया था। मैंने अपने आपको अलमारी के दरवाजे के निकट पहुँचा दिया और मैं अब झिर्रियों से कमरे में सब देख रहा था। मैंने अलमारी के दरवाजे में मौजूद चाबी इस तरह से लगा दी थी कि वो खुलने में वक्त न लगाये और मैंने अपने एक हाथ की उँगलियों को उस पर टिका दिया था ताकि मौका देखकर मैं बिना वक्त गँवाये दरवाजा खोलकर चोर पर धावा बोल सकूँ। कुछ देर बाद मुझे भंडारघर के दरवाजे में मौजूद ताले लगाने वाले छेद से किसी रोशनी के आने का अहसास हुआ। वह दरवाजा खुला और एक आदमी एक छोटी सी लालटेन लिए हल्के क़दमों से भंडारघर में दाखिल हुआ। पहले तो मैं लालटेन की धुंधली चमक के कारण घुसने वाले आदमी के चेहरे को नहीं देख पाया लेकिन जब मैं उस धुंधली रोशनी में देखने का आदि हुआ तो मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि वह और कोई नहीं कुख्यात चोर शातिर जिम ही था।

जैसे जैसे मैं शातिर जिम को काम करते हुए देख रहा था तो उसके काम करने की तरीके से मैं प्रभावित होने से खुद को नहीं रोक सका। बिना हड़बड़ी और डर के वो बेहद आत्मविश्वास से वो अपना काम करने में मग्न था। पहले वह खिड़की की तरफ गया और उसने बाहर का जायजा लिया। फिर उसने उस अलमारी को देखा जिसमें मैं मौजूद था और यह सुनिश्चित किया कि वो बंद थी। उस वक्त मैं साँस रोककर खड़ा था और यह उम्मीद कर रहा था कि वह अलमारी को खोलकर उसके खाली होने की तसल्ली न करे। उसने अलमारी को बंद पाया और फिर आगे बढ़ गया। आखिरकार उसने भंडारघर के दरवाजे को बंद किया और अपना पूरा ध्यान तिजोरी की तरफ केन्द्रित कर दिया। उसने अपनी लालटेन को तिजोरी के ताले के सामने एक कुर्सी पर रखा और फिर अपने जेब से अपने काम के लिए अपने औजार निकाले। फिर वह चुपचाप अपने काम को अंजाम देने लगा।

शातिर जिम शरीर के मामले में एक पतला सा आदमी था; उसके उल्टा मैं एक लम्बा चौड़ा आदमी हूँ। मुझे इस बात का अंदेशा था कि अगर लड़ाई की नौबत आई तो जिम को मैं आसानी से पछाड़ सकता था। लेकिन मुझे यह भी पता था कि जिम हाथापाई करने में कोई रूचि नहीं दिखायेगा। मुझे इस बात का अहसास  था कि हो न हो जिम के पास रिवॉल्वर जरूर होगी और उसको इस्तेमाल करने से पहले वो सोचने वाला भी नहीं था। इसलिए मैंने यह योजना बनाई थी कि जब वह ताले के ऊपर झुका हुआ अपने काम में तल्लीन होगा तो मैं आराम से बिना आवाज़ किये अलमारी के दरवाजे को खोल दूँगा और फिर बिना वक्त गवाए उसके ऊपर कूद जाऊँगा। उसे मैं अपने भारी शरीर से जमीन पर गिरा दूँगा ताकि उसे रिवॉल्वर निकालने का मौका ही न मिले।

थोड़ी ही देर में जिस क्षण का मुझे इन्तजार था वह भी आ गया। उसका पूरा ध्यान ताला खोलने में लगा हुआ था। उसकी ड्रिल से आती हल्की आवाज़ मेरे चाबी घुमाने की आवाज़ को आसानी से ढक सकती थी। मुझे यकीन था कि उसे इस बात का अहसास भी नहीं होना था कि उसके साथ क्या हुआ। मैंने चाबी घुमाई और सेकंड के कुछ हिस्सों में ही मैंने उसके ऊपर छलाँग लगा दी। मैं उसके ऊपर इतनी तेजी से गिरा कि उसके हाथ से उसका हथियार छिटक कर दूर जा गिरा और वह मेरे बोझ तले दबे कुछ ही देर में ढेर होकर तिजोरी के सामने पसरा हुआ था। उसने गुस्से में एक भद्दी सी गाली बकी और इससे ज्यादा गिरने से पहले कुछ करने का उसे मौक़ा नहीं मिल पाया था। परन्तु थोड़ी ही देर में वह ईल मछली की भाँती मेरे नीचे से निकलने के लिए छटपटाने लगा। वहीं मैं उसे अपने एक हाथ से स्थिर करने की कोशिश कर रहा था और दूसरे हाथ से अपने जेब से मैं हथकड़ियां निकाल रहा था। वह अपनी कोशिशों से पेट के बल के बजाय अब पीठ के बल हो गया था था और जब तक मुझे इस बात का अहसास होता वह अपने हाथ में मौजूद एक धारदार चाकू से मुझ पर वार करने लगा था। उस वक्त मुझे अहसास हुआ कि उसे पकड़ने के लिए हमे अब लड़ना ही होगा। वह आसानी से काबू में आने वाला नहीं था। मैं इस बात के लिए खुद को तैयार कर लिया था। उसने चाकू को मेरे बगल में मारना चाहा लेकिन मैंने उसके वार को झटक दिया लेकिन चाकू के फल ने मेरे बायें हाथ को काट दिया और मुझे  तेज पीड़ा के साथ अपने हाथ से बहते रक्त का अहसास हुआ।

इस बात ने मुझे एक दम से इतना उत्तेजित कर दिया था कि मैंने  आस पास हाथ मारने शुरू कर दिये। मेरे हाथ में एक नजदीक ही पड़ी ड्रिल आई और मैंने गुस्से में उसका इतना तेज प्रहार जिम पर किया था कि उसके सारे कस बल निकल गये। वह एक दम से ऐसे शांत हो गया था जैसे उसके प्राण पखेरू उड़ चुके हों। मैंने बिना वक्त गँवाये उसके हाथों में हथकड़ियाँ डाली और सुरक्षा के तौर पर मैंने उसके टखनों को भी आपस में बाँध दिया। उसके बाद ही मैं उठा और मैंने अपनी बाँह का जायजा लिया। चाकू ने एक गहरा वार किया था और खून बेतरतीब तरीके से बह जरूर रहा था लेकिन इतना गम्भीर मामला नहीं था। उधर तब तक नौकरानी भी पहुँच चुकी थी और उसने मेरे बाँह की मरहम पट्टी कर दी थी। फिर मैं बाहर गया और मुझे जो सबसे पहला पुलिसवाला गश्त लगाते मिला, उसकी मदद लेकर मैं शातिर जिम को लेकर अपने दफ्तर की तरफ बढ़ चला।

मैंने जब इस मामले की खबर अपने अफसर को दी तो मुझे बहुत गर्व महसूस हो रहा था।

"शातिर जिम? यानी जेम्स ब्लेंड को तुमने गिरफ्तार किया है? क्या हवाई बात कर रहे हो पार्कर?" पहले तो मेरे अफसर को इस बात पर ही यकीन नहीं आ रहा था। लेकिन फिर जब मैं उसे वहाँ ले गया जहाँ डॉक्टर जिम की दवा दारु कर रहा था तो उसे मेरे बात पर यकीन आया।

"वाह पार्कर। शाबाश। यह वही आदमी है। तुमने तो कमाल कर दिया।" उसने मेरे काम से प्रसन्न होकर कहा।

अब इधर मेरा कोई काम नहीं बचा था और मैं थकान भी महसूस करने लगा था तो मैं अपने घर के तरफ बढ़ गया। अब मैं सोना चाहता था। सर्जन ने मेरी बाँह को देख लिया था और उसने कहा था कि यह बाहरी घाव है जिसमे कोई घबराने की बात नहीं है। लेकिन फिर भी मेरी बाँह में काफी दर्द हो रहा था।

मैंने अपने घर पहुँचा ही था कि मुझे अपनी आराम कुर्सी पर वही  रहस्यमय आदमी, जो शाम को मेरे पास आया था, दोबारा बैठा  दिखा। जब मैं भीतर दाखिल हुआ तो वह खड़ा हुआ। मैं हैरत से उसे देख रहा था।

"तो साहब", उसने कहा,"मुझे लग रहा है आप उसे पकड़ने में कामयाब हो गये हैं। क्यों, मैं सही हूँ न?"

"हाँ,"मैंने जवाब दिया।

"बहुत बढ़िया!" उसने संतुष्टि की एक लंबी आह लेते हुए कहा। "अब मुझे चैन मिल गया है। मुझे नहीं पता मैं इसके अलावा और क्या बोल सकता हूँ। शातिर जिम और मेरे बीच का हिसाब किताब बराबर हो गया है।"

इस बार मैं इस आदमी को इतने आसानी से जाने नहीं देना चाहता था। मैं इसके विषय में सब कुछ जानना चाहता था। "बैठ जाओ", मैंने उससे कहा। "मुझे तुमसे एक दो सवाल करने हैं जो कि जरूरी हैं। मुझे अपना कोट उतारने दो और फिर मैं तुमसे आराम से बात करता हूँ।" मैंने अपना कोट उतारा और फिर उसे बिस्तर में रखने गया। "तो मैं क्या कह रहा था...." कहते हुए मैं मुड़ा ही था कि मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वो कमबख्त फिर गायब हो गया था।

मुझे अजीब सा महसूस होने लगा और मैं नीचे दरवाजे की तरफ भागा तो मैंने बहार जाने वाले दरवाजे को बंद पाया। वह ऐसे ही दिख रहा था जैसे उसे मैं कुछ मिनट पहले बंद करने के पश्चात ऊपर चढ़ा था। आखिर वो कौन था? किधर से आता था और फिर इतने कम वक्त में किधर चला जाता था? मैं अगले एक घंटे इस बात पर सिर खपाता रहा लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं सूझा।

अगले दिन जब मैं दफ्तर पहुँचा तो मुझे बताया गया कि जिम मुझसे मिलना चाहता था। मैं उसकी कोठरी में गया जहाँ वह बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसके सिर पर पट्टी बंधी हुई थी। मैंने उसे बहुत तेज मारा था और मुझे लग रहा था कि शायद इस कारण उसे काफी दिनों तक आराम की जरूरत पड़ने वाली थी। "तो साहब कल आप मुझसे बेहतर साबित हुए। आपने बड़ी जोर से मुझे मारा था।" उसने हँसते हुआ कहा।

"क्या करूँ? मुझे मारना पड़ा, भई।" मैंने उसी के लहजे में जवाब दिया,"वरना तुम तो मुझे छीलने में लगे हुए थे। न जाने कितने छेद कर देते तुम उस चाकू से मेरे अन्दर।"


"हाँ, वो तो है। ", उसने कहा। "अच्छा, जरा नजदीक आईये साहब। कल से एक चीज ने मुझे परेशान करके रखा हुआ है। क्या आप मेरे एक सवाल का उत्तर दे पाएंगे? आपको कैसे पता लगा कि मैं कहाँ सेंध मारने वाला हूँ। भगवान झूठ न बुलवाये लेकिन  उस जगह के विषय में  किसी को खबर नहीं थी। मैंने इस विषय में किसी से बात करना तो दूर किसी के सामने इसके विषय में सोचा भी नहीं था। आपको इस चीज के विषय में कैसे पता लगा, साहब? सच सच बताइए।  मैं तो सोच सोच कर परेशान हो चुका हूँ।"

उस कोठरी में हम दोनों के अलावा और कोई नहीं था। मुझे लगा मैं जिम से  उस रहस्यमय शख्स के विषय में जान सकता था। यही कारण था कि मैंने जिम से कहा,"वह तुम्हारा ही कोई पुराना साथी था जिसने मुझे जानकारी दी थी।"

"हो ही नहीं सकता साहब। आप कम से कम मेरे साथ तो ऐसे बहाने न बनाये। अगर नहीं बताना है तो सीधे मना कर दीजिये। मेरा कोई साथी नहीं है- अपने पेशे से तो कतई नहीं है।"

"क्या तुम कभी ऐसे किसी व्यक्ति को जानते थे?" कहकर मैं जिम को उस आदमी का विवरण देता गया।जैसे जैसे मैं उस व्यक्ति के रंग रूप, कपड़े और उसके चेहरे मोहरे के विषय में बताता गया जिम के चेहरे पर खौफ बढ़ता गया।"हाँ, हाँ" उसने घबराकर तेजी से बोला,"अब मुझे मालूम चल गया है वो कौन है। उसका नाम बार्कसी बिल है। मैंने एक बार उसके साथ काम किया था। और आपने क्या कहा? उसने आपसे कहा कि उसने मुझसे हिसाब चुकता करना था? और यह भी कहा कि आखिर हम लोगों के बीच हिसाब पूरा हो गया था? आप सही कहते हैं। उसके पास मेरे से बदला लेने का कारण था। पर साहब वह बार्कसी बिल नहीं हो सकता है। वह जरूर उसका प्रेत रहा होगा क्योंकि बिल को मरे हुए तो तीन साल हो गये हैं।"

इस घटना ने जिस प्रकार का अजीब रुख अख्तियार किया था उसने मुझे उस वक्त काफी परेशान किया था। मैं इस घटना के विषय में काफी दिनों तक सोचता रहा। कुछ दिनों बाद शातिर जिम को भी वेस्टफोर्ड से पोर्टलैंड की एक सुरक्षित और निर्जन जेल में ले जाया गया था। जब तक जिम उधर था तब तक मैंने जिम से बार्कसी बिल के विषय में और जानकरी हासिल करने की कोशिश की थी लेकिन जिम ने उस दिन के बाद इस मामले पर बात न करने की ठान ली थी। मेरी लाख कोशिशों के बाद भी वह कुछ और कुछ बताने को तैयार नहीं हुआ था। मेरे हर सवाल पर उसका एक ही जवाब होता था कि "बिल मर चुका था और उसे दफनाये हुए तीन साल हो गये थे।" और मुझे उसके इसी जवाब से संतुष्ट होना पड़ा था। धीरे-धीरे मुझे भी इस बात पर विश्वास हो गया था कि उस दिन मुझे मिलने जो आया था वो बार्कसी बिल का प्रेत था। मैं अपनी यह दास्तान अपने काफी साथी अफसरों को सुनाई थी और कई बार इस कारण मैं उनके मज़ाक का विषय भी बन जाता था। लेकिन मुझे इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मुझे यकीन था कि अगर मेरे जगह कोई और भी ऐसे अनुभवों से गुजरता तो उसके विचार भी मेरे ही तरह के होते।

हाँ, मुझे इस घटना के लिए पदोन्नति मिल गई थी और मैंने कुछ दिनों बाद विवाह भी कर लिया था। मैं खुश था और तरक्की की सीढियाँ चढ़ता जा रहा था। मन के किसी कोने में मेरे अन्दर यह ख्याल जरूर था कि अपनी तरक्की की शुरुआत के लिए मैं एक चोर के भूत का आभारी था। मेरे मन में यह ख्याल ताजिंदगी रहता अगरचे वह घटना नहीं हुई होती। शातिर जिम को पकड़ने के पाँच वर्ष बाद मेरे साथ ऐसा कुछ घटित हुआ जिसने कि मुझे उस दिन की घटना के विषय में दूसरे तरह से सोचने पर मजबूर कर दिया।

मुझे किसी काम के लिए वेस्टफोर्ड से शेफील्ड जाना था और इसलिए मुझे लीड्स में ट्रेन बदलनी थी। मैं जिस बोगी में दाखिल हुआ उसमें मेरे सिवा केवल एक ही सज्जन विराजमान थे। जब मैं अपनी सीट पर बैठा तो उस बोगी में मौजूद आदमी ने मेरे तरफ अपना सिर घुमाया। हालाँकि, वह व्यक्ति उस वक्त काफी अच्छे कपड़े पहने हुए था लेकिन फिर भी मुझे उसे पहचानने में किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा। वह वही रहस्यमय व्यक्ति था जो मेरे घर पाँच साल पहले आया था। पहले उसे देखकर एक बार को तो मैं डर सा गया था और मेरे चेहरे पर मेरे मन के भाव प्रदर्शित होने भी लगे थे क्योंकि वह आदमी मुझे डरा देखकर हँसने लगा था।

"हेल्लो, साहब जी।", उसने हँसते हुए कहा। "आप मुझे आते ही पहचान गये। आखिर क्यों न हो? मेरे आपके ऊपर अहसान जो हैं? हा हा।"

"तुमने तो मुझे डरा ही दिया था।", मैंने उससे कहा,"पिछले पाँच सालों से मुझे लग रहा था कि उस दिन मुझसे मिलने तुम नहीं तुम्हारा भूत आया था। अच्छा ये तो बताओ, तुम इतनी जल्दी मेरे घर से गायब कैसे हो जाते थे? क्या जादू टोना किया हुआ था भाई तुमने।"

"क्या कहा मेरा भूत?" उसने मेरी बात दोहराई और बहुत देर तक इस बात पर हँसते रहा। "अच्छा मजाक कर लेते हैं आप भी साहब जी। मैं घर से निकला ही कहाँ था। मैं तो  एक दो दिनों से उसी इमारत में रह रहा था। और फिर अपने पेशे के चलते हम लोगों को बिना आवाज किये दरवाजा खोलने और बंद करने की आदत होती है। उसी आदत के चलते मैं आता था और फिर चले भी जाता था।"

"लेकिन मैंने तुम्हारा पीछा किया था और तुम्हे इधर उधर देखा भी था लेकिन तब भी तुम मुझे नहीं मिले थे।"

"बात आपकी सही है लेकिन आप मुझे ढूँढने नीचे गये थे और मैं तो उलटी दिशा यानी ऊपर की ओर गया था। आपको ऊपर मौजूद अटारी पर आना चाहिए था। अगर आप आते तो आपको मैं मिल जाता। तो आपने समझा मेरा भूत आपसे मिला। सच बताऊँ इससे मजेदार बात मैंने आजतक नहीं सुनी।"

फिर मैंने उसे वह बताया जो जिम ने मुझे बताया था।

"हम्म", उसने कहा,"देखिये साहब जी इसमें जिम की भी गलती नहीं थी। असल में मैं मरा नहीं था। उसने मुझे मारने की कोशिश जरूर की थी। उसने अपनी पूरी कोशिश की थी और मुझे मरा हुआ समझकर चला आया था। लेकिन मैं बच गया था। उस वक्त मैंने फैसला किया कि अगर कभी मुझे जिम से बदला लेने का मौका मिला तो मैं यह काम जरूर करूँगा। उस दिन के बाद मैंने चोरी का धंधा छोड़ दिया था क्योंकि जिम से मिले धोखे के कारण मुझे इस धंधे से नफरत सी हो गई थी।  मैंने ईमानदारी का रास्ता अपनाने की ठान ली थी और मैं अपने पिछले धंधे, जिसमें कि मैं पाइप्स की मरम्मत करता था और नालियों की व्यवस्था करता था, में चला गया। उन दिनों मैं मिस सिंगलटन के घर के सामने ही एक काम कर रहा था कि मुझे उधर जिम दिखाई दिया। मुझे उधर मौजूद प्लेट के विषय में पता ही था तो मैंने अंदाजा लगाया कि हो न हो वह उसी के फिराक में था। मैंने एक-दो  रात तक उसकी निगरानी करी और इस बात का आईडिया लगाया कि वह इस काम को किस तरह अंजाम देगा। एक बार मुझे यह समझ आ गया तो क्योंकि आप मेरे नजदीक थे तो मैंने आपको इस चीज की खबर कर दी। फिर तो आपको पता ही है कि आगे क्या हुआ?"

"लेकिन तुम्हे इस बात की जानकारी कैसे लगी कि वह चोरी किस दिन करने वाला है और कितने बजे करने वाला है?"

"आसान सी बात है साहब जी मैं काफी चोरियों में शामिल रहा था। मुझे इसका अनुभव था और मैंने जिम कि शुरुआती गतिविधियों से अंदाजा लगा दिया कि सारी चीजें कैसे घटित होंगी। मैं खुद भी होता तो ऐसे ही करता जैसे जिम ने किया था। लेकिन भूत!! हा हा हा। सच में आप उस वक्त काफी नौसीखिए रहे होंगे जो आपने इस  तरह की बात पर विश्वास कर लिया था।"

अब सोचता हूँ तो शायद मैं नौसीखिया ही था। लेकिन मैंने  रिटायर चोर बार्कसी बिल से एक चीज तो सीख ही ली थी कि अगर घर की तलाशी लेनी हो तो नीचे ऊपर दोनों जगह तलाश लो और फिर किसी नतीजे पर पहुँचो।

                                                                     समाप्त  

मैंने कुछ और अनुवाद भी किये हुए हैं। आप इन्हें निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं।
अनुवाद

आपके विचारों का इन्तजार रहेगा।

© विकास नैनवाल 'अंजान'

22 टिप्‍पणियां:

  1. शानदार, बहुत बढ़िया। मुझे पसंद आयी कहानी और उम्मीद है बाकी फॉलोअर्स की भी पसंद आएगी। आपके अगले अनुवाद के इंतजार में..........

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    1. जी आभार हितेश, भाई। जल्द ही आपको अगला अनुवाद पढ़ने को मिलेगा।

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  2. बहुत रोमांचक कहानी, खासतौर से अगर अंतिम हिस्से को न पढ़ें तो ये एक अच्छी डरावनी कहानी ही है।
    अनुवाद बहुत अच्छा है। धन्यवाद इस कहानी को अनुवादित कर के हम लोगों तक पहुंचाने के लिये।

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    1. जी शुक्रिया रजनीश जी। ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आते रहियेगा।

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  3. काफी शानदार अनुवाद किया है आपने। बस एक आध वर्तिनी की गलती के अलावा कोई दिक्कत नहीं। आपके अनुवाद कला की तो वार्निश पोलिश हो चुकी इसके ऊपर और कोई पोलिश न बैठेंगी इसलिए आप तुरंत समसामयिक का काम शुरू कर सकते है और इन अनुवादों का इन्तज़ार रहेगा। शुभकामनाएं🌹🌹

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    1. जी हार्दिक आभार अमित जी। उन गलतियों को भी बता देते तो अच्छा रहता। एक्चुअली लिखते समय कुछ न कुछ आँख से रह जाता है। दिमाग गलत को भी सही पढ़ता है।

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  4. ब्लॉग बुलेटिन टीम और मेरी ओर से आप सब को नव संवत्सर, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा व चैत्र नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएँ |

    ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 06/04/2019 की बुलेटिन, " नव संवत्सर, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा व चैत्र नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएँ “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. बुलेटिन में ब्लॉग पोस्ट को शामिल करने के लिए शुक्रिया शिवम जी। आभार।

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  5. बहुत बढ़िया अनुवाद । कहानी की लय में कहीं भी अवरोध नही । लेखक और पाठक होने के साथ साथ आप बहुत अच्छे अनुवादक भी हैं ।

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  6. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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    1. नहीं अभी ऐसी कुछ सेवा की तलाश में नहीं हूँ। अगर कभी हुआ तो आपको तकलीफ जरूर दूँगा।

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  7. बहुत बढिया अनुवाद किया है आपने विकास जी.. . कहानी भी पसंद आई...

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  8. Achchhi kahani hai. Anuwad bahut achchha kiya hai. ab to aaoke dvara anuwad kiya hua novel padhane ki ichchha hai.

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    1. जी आभार राकेश भाई। मेरी कोशिश रहेगी कि आपको ऐसी और कहानियाँ पढने को मिलती रहें। हाँ, मैं उपन्यासों का अनुवाद करना चाहूँगा लेकिन उसमें वक्त काफी लगता है लेकिन लघु उपन्यासों को जरूर ब्लॉग में अनूदित करूँगा। साथ बने रहियेगा।

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  9. आपका कहानी अनुवाद का कार्य वास्तव में सराहनीय है।
    हार्दिक धन्यवाद।

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  10. हितेष रोहिल्ला20 दिसंबर 2019 को 1:03 pm

    बहुत बढ़िया अनुवाद। आपके प्रयास को साधुवाद।

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  11. शानदार अनुवाद...कहानी बस ठीक ही है...पर,आप के रोचक अनुवाद ने उत्सुकता बनाई रखी

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    1. जी, आभार। कहानी करीबन सौ साल पहले लिखी गयी थी। मुझे लगता है उसी हिसाब से इसे देखा जाना चाहिए। ब्लॉग पर आते रहियेगा।

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आपकी टिपण्णियाँ मुझे और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेंगी इसलिए हो सके तो पोस्ट के ऊपर अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।

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