बुधवार, 6 मार्च 2019

इंसा हूँ गिर गिर कर सम्भलता रहा हूँ

Image by annca on Pixabay

टूट टूट कर बार-बार मैं बनता रहा हूँ,
इंसा हूँ गिर गिर कर सम्भलता रहा हूँ

गमो के लिहाफ में लिपटी थी मेरी ज़िन्दगी,
मैं गमों पर अपने बेसाख्ता, हँसता रहा हूँ

तेरे इश्क का था कुछ ऐसा मुझ पर  सुरूर,
अश्को को समझ मैं शराब, पीता रहा हूँ,

न है मंजिल की अब कोई मुझे खबर,
सुकून ए तलाश में आवारा फिरता रहा हूँ

न हो हैरान देख ज़िंदा, अंजान को तू यूँ,
ये लाश है मेरी, जिसे ताउम्र ढोता रहा हूँ

©विकास नैनवाल ‘अंजान’

मेरी अन्य रचनाओं को आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
मेरी रचनायें

4 टिप्‍पणियां:

  1. टूट टूट कर बार-बार मैं बनता रहा हूँ,
    इंसा हूँ गिर गिर कर सम्भलता रहा हूँ
    बहुत सुन्दर...., मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति ।

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

    जवाब देंहटाएं

आपकी टिपण्णियाँ मुझे और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेंगी इसलिए हो सके तो पोस्ट के ऊपर अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।

लोकप्रिय पोस्ट्स