रविवार, 27 जनवरी 2019

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2019



नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला समाप्त हो गया है। यह एशिया का सबसे बड़ा पुस्तक मेला है। और जब से मैं दिल्ली आया हूँ इसमें जरूर जाने की कोशिश करता हूँ। पिछले साल की तरह भी इस साल मैं उधर गया और मैंने कुछ किताबें उधर से ली। पिछले साल  मैं तीन बार पुस्तक मेले में गया था और इस साल मैं दो बार पुस्तक मेले में गया। हाँ, किताबों के मामले में इस साल थोड़ी खरीद कम करी। ऐसा इसलिए भी किया क्योंकि पिछले साल ली गई किताबों में अभी भी कई ऐसी हैं जिन्हें पढ़ना रह गया है। और फिर गाहे बगाहे पुस्तकें मैं ऑनलाइन विक्रेताओं से पुस्तकें मँगवाता रहता हूँ।

खैर, अब आते हैं पुस्तक मेले के भ्रमण पर।



6/01/2018

जीडीएस मीट से निपट कर मैं प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन पर उतरा था। प्लेटफार्म से नीचे उतरा और एग्जिट किया तो सामने ही पुस्तक मेले के टिकट मिल रहे थे। मेरा फोन स्विच ऑफ हो गया था तो अब कुछ नहीं किया जा सकता था। मेले में कोई दोस्त मौजूद होता तो उससे सम्पर्क भी नहीं साधा जा सकता था। मैं कई दिनों से दो किताब खोज रहा था और मैंने सोचा कि इस बार उन्ही  दो किताबों को लेकर लौट जाऊँगा। फिर अगले हफ्ते आराम से पूरा मेला घूमूँगा। ये सोचकर मैंने टिकट लिया। 20 रूपये का टिकेट था,जो कि पिछले वर्ष के मुकाबले 10 रूपये सस्ता था, और मैं टिकेट लेकर पुस्तक मेले की तरफ गया। फोन निपट चुका था तो फोटो वगेरह ले नहीं सकता था।


मैं अन्दर दाखिल हुआ और उसके पश्चात हॉल 12 a में गया। सबसे पहले मैं वाणी के स्टाल में गया। उधर जाकर मैंने विवेक शानबाग की घाचर घोचर का हिन्दी संस्करण ढूँढा लेकिन मुझे नहीं मिला। मैं उधर से निकला और राजकमल प्रकाशन पर पहुँचा। उधर पहुँच कर मैंने सोपान जोशी की जल थल मल के विषय में पता किया। पहले वो मुझे दिखी नहीं थी। फिर इन्क्वायरी में पता किया तो उन्होंने सही निर्देश दिये। मुझे किताब दिखी। दो ही प्रतियाँ बची हुई थी और मैंने एक उठा ली। दूसरे की हालत वैसे ही थोड़ा बहुत खराब थी।

इस किताब को मैं कब से ढूँढ रहा था। रवीश कुमार जी ने इस किताब के लेखक के साथ इंटरव्यू भी किया था और उस प्रोग्राम ने मेरी रूचि इस किताब में जगा दी थी। उस वक्त उन्होंने इसे स्वयं प्रकाशित किया था और प्रतियाँ जल्द ही आउट ऑफ़ स्टॉक चली गयीं थी। खैर, उसके बाद कुछ ही दिनों पहले मुझे पता लगा था कि अब राजकमल वालों ने इस किताब को निकाला है। तब ही मैंने इस किताब को लेने का मन बना लिया था। और अब यह किताब मेरे पास थी।

मैंने किताब उठाई और उसे लेकर काउंटर पर पहुँचा। उधर एक रोचक वाकया हुआ।

मैं किताब की पेमेंट कर ही रहा था कि एक युवक आया।

वहाँ आकर उसने पूछा: "एक्सक्यूज़ मी, इधर इंग्लिश में किताब किधर रखी हैं?"

मैंने जब उसे कहा यह हिन्दी का प्रकाशन है तो उसने हैरानी से मुझे देखते हुए कहा - "क्या इधर इंग्लिश की एक भी किताब नहीं है?"

उसकी आँखों मे दिखते आश्चर्य को देखकर मैं अभिभूत हो गया। वो शायद भीड़ देखकर अंदर आया था और शायद उसे यकीन नहीं हो रहा था कि सारी भीड़ हिन्दी की किताब लेने वालों की है।

मैंने और कैश काउंटर में मौजूद व्यक्ति ने उसे यकीन दिलाया कि राजकमल ने अंग्रेजी की किताबें छुपाकर नहीं रखी है और उसे दूसरे स्टाल्स में जाकर अंग्रेजी की किताब को तलाशना होगा। वो हताश सा चला गया।

मैं उस वक्त सोच रहा था कि किताब ऑनलाइन न मंगाकर ऐसे खरीदने का भी अपना मज़ा है। नये नये किस्से मिल जाते हैं।

खैर, मैं जो खरीदने आया था वो मुझे मिल ही गया था। अब मैं ज्यादा देर इधर रुकना नहीं चाहता था। रुकता तो खुद को कुछ न कुछ खरीदने से नहीं रोक पाता। मुझे रूम में जाना था तो मैं पुस्तक मेले से निकला और फिर स्टेशन की तरफ बढने लगा।

कुछ ही देर में मैं मेट्रो में बैठकर अनीता : अ ट्राफी वाइफ नामक उपन्यास के पृष्ठों में खोया हुआ था।

छः तारीक को पुस्तक मेले में मैंने यही किया था।

जल थल मल - सोपान जोशी


13/01/2019
13 को  पुस्तक मेले का आखिरी दिन था तो जाना बनता ही था। शनिवार को मुझे कुछ काम आ था तो मैंने पुस्तक मेले जाने की योजना तो रविवार को धकेल दिया था। मैं उठा और उठकर मैंने ब्लॉग का कुछ काम किया।

पिछले हफ्ते की तरह इस हफ्ते भी एक अजीब बात हुई। लाइट भाग गई। अब क्या हो सकता था।

पहले मेरा विचार था कि रूम से जल्दी निकला जाये और पुस्तक मेले के अलावा भी दिल्ली में कुछ और देखा जाये लेकिन फिर चीजें कुछ इस तरह से हुई कि ग्यारह बजे करीब तो मैं रूम से ही निकला। ऐसे में पुस्तक मेले के अलावा कहीं और घूमने का प्लान मैंने त्याग ही दिया।

इस बार मैं अपने साथ कमलेश्वर जी का उपन्यास काली आँधी लाया था। काली आँधी कहानी है एक अति महत्वाकांक्षी नेत्री की। जब उसकी राजनितिक महत्वाकांक्षा के कारण वो अपने पति को भी बदलने के लिए कहती है तो उनके रास्ते अलग हो आते हैं। फिर कई सालो बाद वो दोबारा मिलते हैं। इस बार का मिलना दोबारा पति के जीवन में आँधी के सामान होता है जो उसकी गृहस्थी को उड़ाने की कोशिश करता है। क्या वो इससे बच पाते हैं। यही ये कहानी है। कहते हैं कि इंदिरा गांधी जी के जीवन से प्रेरित होकर कमलेश्वर जी ने इस उपन्यास को लिखा था। यह उपन्यास मैंने पिछले साल हुए पुस्तक मेले में खरीदी थी। तो यह रोचक बात  थी कि इस पुस्तक को लेकर मैं उधर जा रहा था।

काली आँधी - कमलेश्वर

मैं रूम से निकला और पहले पैदल गुडगाँव बस स्टैंड पहुँचा और फिर उसके पश्चात उधर से सिकन्दरपुर पहुँचा। मेरा ख्याल था कि सिकंदरपुर में जाकर चाय पी जायेगी।  पिछले हफ्ते भी यही किया था। थोड़ी ठंड भी थी तो एक चाय बनती थी। लेकिन उधर पहुँचते ही मेरे अरमानों में पानी फिर गया। चाय वाली टपरी ही गायब थी। मैं थोड़ा परेशान हुआ। मैंने इधर उधर देखा तो मुझे कुछ नहीं मिला। अब क्या हो सकता था? थोड़ा निराशा हुई और मैं मेट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ गया। मैंने स्टेशन में प्रवेश किया। ज्यादा भीड़ नहीं थी और मैं आराम से कुछ देर में प्लेटफार्म पर था। अब ट्रेन राजीव चौक पर बदलनी थी तो मैंने अपने लिए एक कोना ढूँढा और मैं उधर जाकर काली आँधी में खो गया।

राजनितिक गठजोड़, आडम्बर सब कुछ इस कहानी में था और मैं किरदारों के बीच रमा रहा। मुझे पता ही नहीं लगा कि कब राजीव चौक आ गया। राजीव चौक पहुँचा और फिर उधर से प्रगति मैदान के लिए ब्लू लाइन मेट्रो पकड़ ली। अब मेट्रो नॉएडा जाये या वैशाली मुझे इससे क्या लेना देना था। दो तीन स्टेशन बाद ही मेरा स्टेशन था। मैंने एक दो पृष्ठ पढ़े ही होंगे कि प्रगति मैदान भी आ गया।

मैं उतरा और प्लेटफार्म से उतरा। स्टेशन में ही टिकेट मिल रहे थे। मैंने बीस का एक टिकेट लिया और आगे बढ़ा। पहले मैं गेट के तरफ बढ़ गया था कि अचानक मुझे ध्यान आया कि अन्दर ढंग की चाय मिलना काफी मुश्किल होगा। मुझे चाय चाहिए थी। सिकन्दरपुर  की नाकामयाबी के बाद अब मैं बिना चाय पिए अन्दर नहीं जाना चाहता था। मैं गेट के बाहर से ही वापस मुड़ गया। वापस मुड़कर मैं चाय की तलाश में जा रहा था कि मुझे पराग डिमरी जी दिखे। उन्होंने मुझसे पूछा कि किधर जा रहा हूँ। मैंने चाय के विषय में बताया। वो अबने स्वभाव के अनुरूप जल्दी जल्दी में थे और उनसे अन्दर मिलने का वादा करके मैं चाय ढूँढने लगा। बड़ी मुश्किल से भीड़ में एक जगह चाय दिखी और मैंने चाय बोली। चाय का कप आया और मैंने एक चुस्की ली। आह!! आनन्द आ गया। सच बताऊँ चलने फिरने के बाद ठंड के मौसम में एक अदरक वाली मसाला चाय से अच्छा शायद ही कुछ और हो। इधर मैं बड़े वाले चाय के चेन्स की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि टपरी वाली चाय की बात कर रहा हूँ।

चाय पीनी मैंने खत्म की और अंदर की तरफ बढ़ा। भीड़ थी तो लाइन में लगना पड़ा। टिकेट चेक हुआ और आगे बढ़ा। बैग और बिना बैग वालों को अलग दिशाओं से भेजा जा रहा था। मैं चूँकि बैग के साथ तो मैं बैग वाली जगह की तरफ बढ़ गया जहाँ मशीन से बैग की जांच हुई और मैं आगे बढ़ा। एक महिला लाउडस्पीकर लेकर लोगों को अलग अलग दिशाओं के विषय में निर्देश दे रही थीं।

बैग चेक कराकर आगे बढ़ा। पुस्तक मेले के बड़े बड़े बोर्ड लगे हुए थे और लोग उनके आगे फोटो खिंचवा रहे थे। मैंने बोर्ड की एक फोटो ली और आगे बढ़ गया। कुछ धार्मिक लोग भी अपने धर्म का प्रचार कर रहे थे। अब ये प्रचार इधर हमेशा का काम हो गया है। पुस्तक मेले में आपको मुफ्त में बाइबिल, कुरआन,सत्यार्थ प्रकाश (दस रूपये में) मिल जायेंगे। मैं इन सब लोगों को देखकर यही सोचता हूँ कि इन धर्म को मानने वाले लोगों की परेशानी तो उनका भगवान हर नहीं पा रहा है। वो ही लोग दुखी हैं। फिर ये नये लोग जुड़ेंगे तो कैसे वो इनका बोझ झेल पायेगा। यह सोचते हुए मेरे दिमाग में एक सरकारी दफ्तर का चित्र उभरा। भगवान कुर्सी के पीछे बैठा है और उसकी डेस्क में लोगों की परेशानियों और दुआओं की फाइल रखी हैं। कमरे में चारों तरफ फाइलों का अम्बार है और भगवान उन्हें जी जान से पूरी करने में लगा है। तभी उसे पता चलता है कि  फाइलों की तादात बढाने के लिए लोग जी जान से लगे हुए हैं। उस बेचारे के क्या होते होंगे। वो तो परेशान हो जाते होंगे। कल्पना बचकानी तो थी लेकिन मुझे सत्य ही लग रही थी।



अब मुझे वो स्टाल देखना था जहाँ मुझे जाना था। पहले मेरा इरादा 11 नंबर हॉल में जाने का था। यह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि सूरज पॉकेट बुक के लेखक भी इधर मौजूद थे। 12 नंबर वाले दोनों हॉल तो मैंने पहले ही देख लिए थे। अब सोचा इधर का जायजा ले लूँ। मैं हॉल में दाखिल हुआ तो सामने ही राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) का स्टाल था। मैं उसमें दाखिल हुआ। अक्सर इधर से अच्छे अनुवाद मिल जाते हैं। अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियों के अनुवाद पढने की बात होती है तो मैं अंग्रेजी से ज्यादा तरजीह हिन्दी को देता हूँ। पिछले साल भी मैंने इधर से कुछ किताबें खरीदी थी और इस साल भी मैंने इधर से कुछ किताबें खरीदी।



राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से ली गई पुस्तकें:

काली मिट्टी - पालगुम्मि पद्मराजु (तेलुगु से हिन्दी में अनूदित)
पानी पड़े पत्ता हिले - गौरकिशोर घोष (बांग्ला से हिन्दी में अनूदित)
गोरी - गुरुदेव सिंह राणा (पंजाबी से हिन्दी में अनूदित)
पात्र-विपात्र - एस सोज (पंजाबी से हिन्दी में अनूदित)
करिसल - पोन्नीलन (तमिल से हिन्दी में अनूदित)


इसके पश्चात मैं आगे बढ़ा और साहित्य अकादमी के स्टाल में गया। इधर का स्टाल मुझे थोडा छोटा लगा। किताबें भी ऐसे ही रखी हुई थी जैसे खाना पूर्ती करी गई हों। ये पता लगाना मुश्किल था कि उपन्यास किधर है और कहानी संग्रह किधर है। सब गडमड था। खैर, इधर देखने में मुझे पाँच से छः मिनट ही लगे होंगे और मैंने निम्न पुस्तकें ले ली।


साहित्य अकादमी से ली पुस्तकें:

पतझड़ - नील पद्मनाभन (तमिळ से हिन्दी में अनूदित)
अग्निसाक्षी - ललितांबिका अंतर्जनम् (मलयालम से हिन्दी में अनूदित)
पितरों के हाड़ - नवकांत बरुआ (असमिया से हिन्दी में अनूदित)

अब साहित्य अकादेमी से निकलकर मुझे स्टाल नम्बर 330 में जाना था। उधर सूरज पॉकेट बुक्स की किताबें और मीत भाई मौजूद थे। मैं एक एक स्टाल देखते हुए जा रहा था। कई स्टाल्स के बाहर बड़ी बड़ी कृत्रिम किताबें रखी थी जिनके आगे लोग बाग़ फोटो खिंचवा रहे थे। स्टाल ने कई तरह से लोगों को लुभाने का कार्य किया हुआ था। बच्चे हो या अधेढ़ सभी उनके सामने जाकर  फोटो खिचाने में व्यस्त थे। स्टाल पार करता हुआ मैं 328 पर पहुँचा तो मैंने देखा कि सामने तो वाशरूम है और आगे के स्टाल का कुछ पता नहीं लग रहा है।

फिर मीत भाई को कॉल किया तो उन्होंने बताया कि उधर से सीधा आकर दायें तरफ मुड़ेंगे तो उनका स्टाल आ जायेगा। उधर पहुँचा। मीत भाई और मनमोहन जी भी उधर थे। मनमोहन जी को प्रतिलिपि और उनके ब्लॉग पर मैं पढ़ता आया हूँ।उधर अनुराग जी से भी मिला। उनकी किताब मुखोटों का रहस्य अभी हाल फिलहाल में सूरज से आई है। उनकी किताब मैंने मेरठ वाले आयोजन में भी ली थी लेकिन जब उस दिन मैं रूम में पहुँचा था तो मुझे वो नहीं मिली थी। न जाने मेरठ से दिल्ली के सफ़र के दौरान वो कहाँ गायब हो गई थी। मुखुटों का रहस्य मेरे लिए एक रहस्य बनकर रह गई थी। यही हालत मंजरी शुक्ला जी के कहानी संग्रह जादुई चश्मों के साथ हुआ था। वो भी न जाने कहाँ गायब हो गई थी।

खैर, अब मैंने ये दोबारा मँगवा ली है। यहीं पर मुझे फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन के संस्थापक जयंत जी भी मिले। जयंत जी से मैं जैसलमेर ट्रिप के दौरान भी मिला था। उनसे उस वक्त भी काफी बातचीत हुई थी। इधर भी काफी बातचीत हुई। मनमोहन जी ने बताया उनकी नई किताब का काम लगभग पूरा हो चुका है और वो जल्द ही आएगी। मीत जी के साथ व्योमा जी थी जो कि मीत जी ने बताया इन्दोर से आई थीं। वो लेखक और अनुवादक हैं। हम लोग बात कर रहे थे कि ज्योति जी भी आई। ज्योति जी पेंटर, इलस्ट्रेटर हैं और सूरज के लिए कवरआर्ट भी बनाती हैं। उनसे मेरठ में भी मुलाकात हुई थी। बातचीत का दौर चल रहा था। उधर शोभित भाई भी पहुँच गये थे। उनसे भी बातचीत हुई। शोभित भाई से पहली बार पाठक साहब के फेन मीट में मुलाकात हुई थी। तब से लेकर आज तक बात चीत होती रहती है।

कुछ देर बाद जयंत जी से पुस्तकों के ऊपर बातचीत चल रही थी कि बातचीत का रुख अंग्रेजी पुस्तकों के ऊपर चल निकला। बात होते होते ये आई कि सामने किसी स्टाल में 100 में तीन पुस्तकें मिल रही थी। मैंने हिन्दी की तो काफी पुस्तकें ले ली थीं लेकिन अब अंग्रेजी की पुस्तकें लेने का मन बना लिया था। हम लोग उधर गये तो काफी भीड़ थी। किताबें छाँटने में सभी लोग व्यस्त थे। मैं भी उस भीड़ में शामिल हो गया। कुछ ही देर में जैसे तैसे करके मैंने तीन पुस्तकों का चुनाव कर लिया।

जब पुस्तके चुनने से मुझे होश आया तो जयंत जी अदृश्य हो चुके थे। मैंने यहाँ वहाँ देखा तो उन्हें कहीं भी नहीं पाया। तब तक योगेश्वर भाई जिनसे मैंने पुस्तक मेले में घुसने से पहले बात की थी और जो एक घंटे में आने वाले थे, पुस्तक मेले में पहुँचकर मुझे फोन कर रहे थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं किस स्टाल में हूँ और आँखे घुमाकर जयंत जी को तलाश करने लगा। थोड़ा बहुत और को-ऑर्डिनेट करके योगेश्वर भाई भी मेरे तक पहुँच गये थे। लेकिन जयंत जी अभी भी गायब थे। मैंने वापस उसी स्टाल में जाने का प्लान बनाया जहाँ से हम आये थे। मैं उधर पहूँचा तो पता चला कि जयंत जी किताबों के बवंडर से निकल कर इस स्टाल रूपी साहिल में अपनी किश्ती पार्क किये हुए थे। अभी कुछ देर पहले ही वो कहीं गये थे। कुछ ही देर में वो भी आ गये। उन्होंने कहा भीड़ के कारण वो निकल आये थे। मैंने निम्न किताबें उस स्टाल से खरीदी थी :

Tamarind City by Bishwnath ghosh
PostDamer Platz by Buddy Giovinazzo
Blood in Brooklyn by Gari Lovisi



मैं हार्ड बॉयल्ड श्रेणी की किताबें लेना चाहता था तो दो मेरे इस मापदंड पर खरी उतरी थीं। एक किताब और चुननी थी तो मेरी नज़र बिश्वनाथ घोष जी की किताब पर पड़ गई थी। उसे मैं वैसे भी लेना चाहता था तो मैंने वही उठा ली।

अब योगी भाई भी साथ थे। उन्होंने कुछ विशेष किताब लेनी थी। मीत भाई और बाकी लोग अब चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट जा रहे थे। बच्चो के लिए किताबें सात नम्बर स्टाल पर थीं। मैंने उनसे विदा ली और थोड़ी देर में उधर मिलने का वादा किया। वो लोग उधर बढ़ गये और मैं और योगेश्वर भाई उस स्टाल को ढूँढने लगे जिसकी तलाश वो कर रहे थे। काफी घूमे लेकिन जब अपने मतलब की चीजें नहीं मिली तो हम लोग अब बच्चों वाले स्टाल की तरफ चले गये।

वहाँ मैं एक स्टाल में गया तो उधर मुझे कुछ पसंद की किताबें  दिखीं  और मैंने वो ले लीं:
सीपियाँ (कहानी संग्रह)
गणित के पंख (ए एस चौधरी)
मास्टर साहब - मृणालिनी श्रीवास्तव

ये किताबें लेने के बाद हम उधर ही मौजूद एनबीटी के स्टोर की तरफ बढ़ने लगे। उधर मीत भाई और बाकी लोग भी थे। इधर बढ़ने से पहले मेरी बात कुलभूषण चौहान सर से भी हुई थी। वो इधर पहुँच गये थे लेकिन अपनी किसी दोस्त के साथ बातचीत करने में मशरूफ थे। उनसे बातचीत करके वो मिलने वाले थे। हमने ये ही सोचा था कि तब तक सामने मौजूद एन बी टी के स्टाल की तरफ बढ़ा जाये। हम उधर गये और उधर सभी लोग मौजूद थे। मीत भाई,व्योमा जी, ज्योति जी,अनुराग जी। सभी पुस्तकें देखने में व्यस्त थे। उधर ही हमे शशिभूषण जी और उनके भाई मिले। उनसे थोड़ी बहुत बात हुई। फिर उधर से ही मैंने निम्न पुस्तकें ली:

बर्फ के आदमी - सूर्यनाथ सिंह
क्ली टापू पर रोमांच - तनुका भौमिक एंडो (अंग्रेजी से हिन्दी में अनूदित)


ये दो पुस्तकें ली ही थी कि कुलभूषण सर का कॉल आ गया। हमने बाकी लोगों से विदा ली। मीत भाई ने काफी कुछ खरीदारी कर ली थी। मैंने अपनी किताबों का बिल अदा किया और हॉल से निकले। इस बार पुस्तक मेले का थीम दिव्यांगों के लिए पठन सामग्री था। इससे जुड़ा थीम हॉल भी इधर था। उधर जाने की सोच रहे थे कि कुलभूषण जी का कॉल आया। हमने ये विचार त्यागा और उनकी तरफ गये। वो बारह नंबर हॉल देखकर निपटे थे। थोडा बहुत पूछताछ और जगहों के विषय में कंफ्यूजन होती रही लेकिन आखिर में हम लोग मिल ही गये। उन्होंने बताया कि आज उनका भी पहला ही दिन था। पहले वो पाठक साहब के प्रोग्राम के लिए आये थे लेकिन उस वक्त उन्हें घूमने का मौक़ा नहीं मिला था।

अब हमने उनके साथ 8 से 10 नंबर हॉल के चक्कर मारे। एन बी टी और साहित्य अकादेमी में गये। थोडा बहुत घूमे। फिर जब ज्यादातर हॉल हो गये थे,-12 वाला हॉल तो वो देख आये थे, तो हम लोग पुस्तक मेले से बाहर आ गये। सुबह से हम चल ही रहे थे और कुछ खाया पिया नहीं था। कुलभूषण सर को एअरपोर्ट जाना था क्योंकि मैम आ रहीं थीं इसलिए वो लंच पर हमारे साथ नहीं आये। मैं और योगी भाई अब आई टी ओ की तरफ बढ़ गये। उधर एक उडुपी रेस्तौरेंट था जहाँ जाकर पेट पूजा करने का मन था। आज के लिए काफी खरीदारी हो गई थी। काफी पुस्तकें ले ली थीं। इन्हें पढ़ना कब होगा ये तो कहना मुश्किल है लेकिन घूमकर मजा जरूर आया था।

अब अगले पुस्तक मेले का इन्तजार करना था। बस मुझे एक चीज का पछतावा रहा। जितने लोगों से मिला उनकी फोटो नहीं खींच पाया। किताबों में ही मशरूफ रह गया।

क्या आप लोग भी पुस्तक मेले गये थे? आपको उधर जाना क्यों पसंद है? कौन कौन सी किताबें आपने ली थी?

मुझे कमेन्ट में जरूर बताइयेगा।

सभी किताबें एक साथ 

समाप्त

पुस्तक मेले के दूसरी घुमक्कड़ी के वृत्तांत आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

दिल्ली में की दूसरी घुमक्कड़ी के वृत्तात आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

मेरे दूसरे घुमक्कड़ी के वृत्तांत आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

4 टिप्‍पणियां:

  1. पुस्तक मेले की रोचक जानकारी और बहुत सी नई किताबोंं की जानकारी । बहुत बहुत धन्यवाद ।

    जवाब देंहटाएं
  2. ​बहुत बढ़िया जानकारी दी आपने पुस्तक मेले के लिए !! बहुत से लोगों के काम आएगा

    जवाब देंहटाएं

आपकी टिपण्णियाँ मुझे और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेंगी इसलिए हो सके तो पोस्ट के ऊपर अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।

हफ्ते की लोकप्रिय पोस्ट(Last week's Popular Post)