मंगलवार, 16 अक्तूबर 2018

किधर जायें

यूँ ही ऑफिस में बैठकर कुछ पंक्तियाँ मन में उभरी थी तो उन्हें गूगल ड्राइव के दस्तावेज में नोट कर दिया था। कुछ भी पुख्ता नहीं बन पाया था। यह पिछले शुक्रवार की बात है। यानी 12/10/18 की। फिर इस सोमवार यानी  15/10/18 को सुबह कुछ लिखने का मन हुआ। गूगल ड्राइव के दस्तावेज पर इसे देखा तो  पंक्तियाँ जुड़ती गई और कुछ बन गया। उसे व्हाट्सएप्प समूह में साझा किया तो राशिद भाई ने कुछ सलाह दी और उस पर अमल करके आखिर में यह बनकर आया। 

एक रचना के पीछे न जाने ऐसे ही कितने बार खुद के लिखे को कांटना छाँटना पड़ता है। दोस्तों की सलाह को मानना या न मानना पड़ता है। यानी मेहनत होती है। एक बार में आईडिया तो आता है लेकिन उसे माँझना भी पड़ता है। यही माँझना लगातार चलता है। हो सकता है कुछ सालों बाद इस लिखे हुए को देखूँगा और सोचूंगा कि इसमें और बदलाव हो सकते थे। 

आदमी संतुष्ट कहाँ हो पाता है। जिस दिन आदमी संतुष्ट हो गया उस दिन शायद वह कुछ रचना भी  बंद कर देगा। यह उथल पुथल मन में होती रहनी चाहिए। तभी कुछ बन सकता है। खैर, उस वक्त की उस वक्त देखेंगे। फिलहाल आप इसे ही पढ़िए। 



ये शोर शराबा, ये रोज की कायें कायें,
इन्हे छोड़ कर हम किधर  जायें,

दौड़ती भागती सी ज़िन्दगी में मिले जो सुकून,
हो गर पता तो हम उधर जाएँ,

मैं तन्हा हूँ,करता हूँ इन्तजार तेरा,,
वो दुनिया बता हम तुझे जिधर पायें,

उम्र गुजार दी 'अंजान' भागने दौड़ने में इतनी,
अब चाहत है थोड़ा ठहराव इधर लायें


© विकास नैनवाल 'अंजान'

10 टिप्‍पणियां:

  1. Wonderful.
    बहुत खुब विकास जी ।
    क्या खूब उकेरा है मनःस्थिति को शब्दों में ।

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  2. इस उथल पुथल की जिंदगी में सुकून की बात न कर फराज
    कुछ तूने कुछ मैंने ही इस ठहराव को ख़त्म किया है

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