मंगलवार, 30 मई 2017

माउंट आबू मीट #2: शनिवार- उदयपुर से होटल सवेरा तक

20 मई 2017,शनिवार

इस यात्रा वृतांत को शुरुआत से पढ़ने के लिए इधर क्लिक करें।




सुबह ट्रेन के हिचकोलों और एक आवाज़  के कारण आँख खुली।  कोई कमबख्त फोन पर बात कर रहा था। नींद के आगोश में समाये मेरे दिमाग को पहले तो लगा कि कोई आशिक अपनी महबूबा से बात कर रहा है। लेकिन जैसे जैसे दिमाग से नींद के जाले हटे तो सोचा कि आशिक अपने प्रेयसी से इतनी तेज आवाज़ में तो बात करने से रहा। फिर ये किससे बात करता हो सकता है? क्या घरवालो से? लेकिन इतनी सुबह या रात को कोई घरवालों से क्यों बात करेगा। तो मेरी डिटेक्टिव खोपड़ी ने इसको भी खारिज कर दिया और अंत में इस नतीजे पे पहुँची कि वो अपने किसी नशेडी दोस्त से ही बात कर रहा होगा। इसके बाद मैंने खुद के पॉवर ऑफ़ डिडक्शन की तारीफ़ की, बात करने वाले के लिए मन में कुछ गालियाँ उचारी  और एक तरफ मुड़ गया। फिर कब नींद आई पता ही नहीं चला।

उसके बाद जब नींद खुली तो वो  किसी आवाज़ के कारण नही थी। उठकर देखा तो नीचे के सभी सहयात्री जाग चुके थे। मैं जिस बर्थ पे उसके टॉप पे अल्मास भाई , बीच में मैं और सबसे नीचे कुलदीप भाई थे शायद । सामने वाली टॉप बर्थ पे योगेश्वर भाई और बीच वाली बर्थ पे दीपक भाई थे। मै दीपक भाई और कुलदीप भाई की स्थिति को लेकर कंफ्यूज हूँ। खैर, नींद खुलने के बाद मैं थोड़ी देर लेटा रहा। फिर पेट ने अपने तरफ मेरी तवज्जो खींची तो उसकी बात मानकर उतर गया। तब तक सभी जाग चुके थे।  मैंने दीपक भाई से एक पेपर सोप लिया और प्रकृति की आवाज़ (नेचरस कॉल ) का उत्तर देने के लिए निकल पड़ा। दीपक भाई के पास एक किट थी जिसमे हमारी सभी जरूरतों का सामान निकल आता था।

तो फ्रेश होकर मैं वापस आया।  अब चाय पीने का मन कर रहा था लेकिन चाय मंगवाई नहीं।  थोड़ी देर में चित्तोरगढ़ आ गया।  उधर  वो भाई उतर गया जो हमारे सामने वाली लोअर बर्थ पे बैठे हुए थे। उनसे हमने विदा ली और बीच वाली बर्थ को बंद करने का निर्णय लिया। मेरा थोड़ा लेटने का मन था तो थोड़ी देर के लिए मैं सामने वाली टॉप बर्थ पे चढ़ा लेकिन कुछ ही देर में बोर होकर नीचे आ गया।  फिर हमने रेलवे की 'बेकार वाली चाय' लेने की सोची। ये चाय केवल इसलिए ले रहे थे क्योंकि कुछ विकल्प नहीं था वरना इसमें और गर्म पानी में ज्यादा फर्क नहीं होता है। थोड़ी देर तक इसे चुसकते रहे।  फिर बात चीत होती रही। कल ट्रेन में जो हुआ उसके ऊपर बात चीत हुई और उदय पुर आने का इन्तजार करने लगे। वैसे तो ट्रेन ने सात बजे के करीब उदय पुर पहुंचना था लेकिन ट्रेन थोड़ी लेट चल रही थी। इसमें कोई नयी बात भी नहीं थी। इसी दौरान हम उदयपुर से माउंट आबू तक कैसे पहुंचेंगे इसकी योजना बनाने लगे। योगी भाई ने एप्प पे बस के विषय में देखा जो साढ़े आठ के करीब थी। लेकिन हमने सोचा स्टेशन के बाहर खड़े गाड़ी वालों से एक बार बात करके देखी जाए। हो सकता है उससे हमे साढ़े आठ बजे तक न रुकना पड़े। यही सोच विचार करते हुए आखिरकार उदयपुर भी आ गया।

हम ट्रेन से बाहर निकले तो उधर एक बुक स्टाल था। उधर मैंने किताबें देखीं तो रीमा भारती के कुछ उपन्यास उधर थे। ये उपन्यास धीरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित थे। कुछ महीनो से मैं रवि पॉकेट बुक्स से प्रकाशित रीमा  भारती के उपन्यासों से निराश सा हुआ हूँ। इससे पहले जब मैंने धीरज से प्रकाशित उपन्यास पढ़े थे तो मुझे वो मनोरंजक लगे थे। इसी कारण धीरज वाले उपन्यास उधर देखें तो खरीद लिए। इसके इलावा कुछ भी रुचिकर उधर नहीं दिखा। उपन्यास एक सौ चालीस के पड़े।

स्टाल से खरीदे उपन्यास 
उदयपुर स्टेशन

स्टेशन के बाहर मौजूद महाराणा प्रताप की प्रतिमा

हम बाहर निकल आये। प्लान के अनुसार हमने एक दो टैक्सी वालो से बात की तो वो चार हज़ार रुपये बता रहे थे। हमने ट्रेन में दो ढाई हज़ार का सोचा था। चार काफी ऊपर जा रहा था। ऐसे हमने एक दो और से बात की तो साढ़े तीन तक भी एक व्यक्ति पहुँच गया था। तो हमे लगा कि अगर स्टैंड पर जायें तो शायद और सस्ता मिल जायेगा। उसी दौरान हमे ये पता चला कि बस स्टैंड नज़दीक है तो हमने उधर जाकर भी पता करने की सोची। अब हमारे पास विकल्प ज्यादा थे।  फिर थोड़ा भूख भी लगी थी तो सोचा उधर जाते हुए कुछ खा पी भी लिया जायेगा।

हम बस अड्डे के विषय में पूछते हुए आगे बढे। पहले एक चाय वाले भाई के पास रुके। उधर एक अच्छी सी चाय पी।  फिर आगे बढ़ गये।आगे जाने पर एक जगह देखा कि एक जगह पाँच रूपये में नाश्ता मिल रहा था। ये बात हमे रोचक लगी और हम उधर नाश्ते के लिए चल दिए।  वो एक सरकारी संस्था द्वारा चलाई गयी अन्नपूर्णा कैंटीन थी।  हमने बीस रूपये दिए और चार प्लेट ली। मेनू में थोड़ा पोहा, कुछ मसाला ओटस और थोड़ा सांभर जिसमे इडली के टुकड़े चूरे हुए थे। पाँच रूपये के हिसाब से मुझे तो नाश्ता सही लगा। बाकियों की प्रतिक्रिया मिश्रित थी। नाश्ता निपटाया। योगी भाई को छास पीनी थी लेकिन आस पास वो नहीं मिल रही थी। मोबाइल कैंटीन के सामने ही एक डेरी भी थी। उधर कोशिश करने के लिए बोला लेकिन उधर भी उन्हें छास नहीं मिली। फिर हम अड्डे की तरफ चल दिए।

रास्ते  में ट्रेवल वाले भी बैठे हुए थे तो  उनसे भी बात करते जा रहे थे लेकिन कुछ मामला सेट नहीं हो रहा था। सभी चार -साढ़े चार हज़ार रूपये बता रहे थे।   अब हम बस अड्डे की तरफ आये।  योगी भाई हमसे पहले ही उधर पहुँच चुके थे। उन्होंने बोला कि शायद उधर से माउंट आबू के लिए कोई बस नहीं है। अड्डे के बाहर  पुलिस वाले बैठे  हुए थे। उधर  एक महिला पुलिस वाली  भी बैठीं हुई थीं।  उनसे कुलदीप भाई ने पूछा तो उन्होंने कहा बस अन्दर से ही मिल जाएगी। मैंने योगी भाई से मज़ाक में कहा शायद आपको देखकर ही लोगो ने मना किया होगा। इस पर सभी हँस दिए। उन महिला ऑफिस के चेहरे पे भी हल्की मुस्कुराहट आई। पुलिस वाले हँसते हैं तो अच्छे लगते हैं।

फिर हम  अन्दर गये। अन्दर साधारण  बसें तो जा रही थी लेकिन अल्मास भाई को वॉल्वो में जाना था। वॉल्वो के विषय में पता किया तो उसको जाने में काफी वक्त था।  हमने उधर ही टैक्सी का पता किया तो सामने टैक्सी स्टैंड का पता चला। ये भी पता चला कि सामने ही ऐसी जगह थी जहाँ से प्राइवेट गाड़ियाँ जाती थी। ये राय भी मिली की हम उधर जाकर देखें तो हो सकता था माउंट आबू के लिए प्राइवेट बस मिल सकती थी।   हमने उधर ही जाने की सोची।अब चूँकि गर्मी काफी बढ़ गयी थी तो हमे प्यास भी लग रही थी इसलिए पहले गला तर करने की सोची। योगी भाई की छाँछ अभी भी नहीं मिली थी। इतने में  हमे सामने ही एक स्टाल दिखा जहाँ लस्सी और  छाँछ दिख रही थी तो हम उसकी तरफ बढ़ गये।  उधर योगी भाई ने अमूल छाँछ ली।  उनके पास एक लोकल  छाँछ थी जो कि प्लास्टिक के ग्लास में थी। मैंने वो ली। वो छाँछ स्वादिष्ट थी। अमूल पंद्रह की थी और ग्लास वाली  की कीमत बीस रूपये थी। कुल्दीप भाई भी हमे देखकर उधर आये लेकिन उन्हें उनकी पसंद  का कुछ उधर मिला नहीं तो उन्होने कुछ नहीं लिया। फिर  हम बाहर की तरफ आये। बाहर निकलते हुए एक जूस वाला दिखा जहाँ से अल्मास भाई ने एक आम का जूस लिया। उसे शेक कहना बैमानी होगा क्योंकि उसमें दूध तो था नहीं। वो पिया और फिर हम आगे बढ़ गये।

अब हमारी मंजिल टैक्सी स्टैंड थी जहाँ हमने टैक्सी देखनी थी। हम जल्द ही उधर पहुँच गये। उधर एक ऑफिस नुमा जगह बनी हुई थी और उसके आगे कुछ लोग बैठे हुए थे। उनसे बात की तो वो चार हज़ार ही बता रहे थे। जब तक बातचीत हो रही थी तब तक मैं इधर उधर नज़र घुमा रहा था। सामने मुझे पार्क दिखा जिमसे एक मूर्ती थी। दूर से वो शिवाजी की लग रही थी। मुझे आकर्षक लगी तो मैंने क्लिक कर दी।

टैक्सी स्टैंड के ऑफिस के बगल में मौज्दूद पार्क और उस पर स्थापित मूर्ती 

मैं उधर जाने की सोच रहा था लेकिन फिर हम सब लोग वापस जाने लगे। ये भी महंगा लग रहा था लेकिन फिर
अब हमे देर भी हो रही थी। वैसे ही चलते हुए काफी देर हो गयी थी। जिस बस को योगी भाई ने ट्रेन में देखा था वो भी निकल चुकी थी। इसलिए हमने इस टैक्सी को करना ही उचित समझा। हमने टैक्सी में सामान डाला।अल्मास भाई ने ऑफिस में जाकर कागजी कारवाही की और हम पेट्रोल पम्प की तरफ चल दिए। दीपक भाई और कुलदीप भाई बीच वाली सीट पर, अल्मास भाई सबसे आगे और योगी भाई और मैं सबसे पीछे बैठे थे। पेट्रोल पम्प में पहुँच कर टैक्सी में तेल भरवाना था और फिर आगे का सफ़र शुरू होना था।

टैक्सी पेट्रोल पम्प के निकट पहुँची तो हम अपनी बारी का इंतजार करने लगे।  हम टैक्सी के  अन्दर बैठे हुए थे और गर्मी से बुरा हाल हो रहा था। हमे प्यास लग रही थी और पानी नहीं था। ऐसे में कुलदीप भाई बाहर गये और एक बड़ी ठंडी पानी के बोतल लाये। हमने अपने गले तर किये।

हमारा नंबर अभी नहीं आया था। हमारी  टैक्सी ऐसी वाली नहीं थी लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मुझे इससे कुछ फर्क नहीं पड़ा था। थोड़े देर का सफ़र था जैसे भी होता कर लेता। मैं इसी से खुश था कि सफ़र तो चालू हुआ था। इसलिए मैं आराम से अपने ख्यालों में दोबारा खो गया था कि अचानक हुए शोर ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। मैंने सुना कुलदीप भाई तेज आवाज़ में बोल रहे हैं  की क्या टैक्सी है जिसमे एसी नहीं है। फिर अचानक से काफी हल्ला होने लगा।  कुलदीप भाई और अल्मास भाई तेज आवाज़ में बोले जा रहे थे। मुझे लगा कि ये लोग मज़ाक कर रहे होंगे। कल ट्रेन में भी ऐसा मजाक चल रहा था। योगी भाई भी बोल रहे थे लेकिन इतना तेज नहीं।  फिर अचनाक से अल्मास भाई गुस्से में गाड़ी से निकल गये। वो कहने लगे कि मैं अकेले चला जाऊँगा। तुम अपना देख लो। मैं सकते में था ये क्या हो रहा है। उधर कुलदीप भाई भी निकलने लगे। फिर हम भी उधर क्यों रुकते हम भी चल दिए। जो बुजुर्गवार टैक्सी के साथ आये थे वो बोलने लगे की अब तो तुम्हे जाना ही होगा। अब तेल भरवा दिया है। वहीं कुल्दीप भाई कह रहे थे कि हम एसी में जायेंगे। इस गर्मी में बिन एसी में नहीं जायेंगे। ऐसे ही बहस चलती रही। हम अब अल्मास भाई की तरफ जाने लगे तो एक बाइक सवार बीच में आ गया। वो शायद टैक्सी वाले का जान पहचान का था। अब बहस बढ़ रही थी। मैं हैरान था कि अभी तक तो सब कुछ सही था लेकिन अचानक से ये क्या हो गया था। पहले अल्मास निकल लिए थे। मुझे लग रहा था कि गुस्से में वो कहीं दूसरी गाड़ी करके न निकल जाएँ। वैसा भी उनका गुस्सा काफी कुख्यात है। वो गुस्से में कई बार ग्रुप छोड़ कर चले जाते रहे हैं। थोड़े थोड़े दिनों में ये मुझे देखने को मिलता रहता था। हमे तो पहले अल्मास भाई को रोकना था। हमने बोला कि पहले उस बन्दे को रोक रहे हैं।  और रोड क्रॉस करने के लिए भागे।

हम रोड क्रॉस करके उधर गये जिधर अल्मास भाई गये थे। वो आखिरी बार हमे एक ऑटो के पीछे दिखे थे। हम उधर गये तो उन्हें हमने पाया उनके चेहरे में गुस्से का नामोनिशान नहीं था और वो एक शरारती बच्चे की तरह  मुस्कान लिए हमे देख रहे थे। उनके हाथ में एक सिगेरेट थी जिसे वो जला रहे थे।  मैं अब तक उनके गुस्से को असल समझ रहा था लेकिन उस मुस्कान से मुझे पता चल गया था कि वो गुस्सा उनका टैक्सी छोड़ने का बहाना था। उन्होंने हमारे पहुँचते ही कहा कि कोई दूसरा तरीका नहीं था गाड़ी छोड़ने का। लेकिन अभी हमारा पीछा इतनी जल्दी नहीं छूटने वाला था। हमने ऑटो से वापस रेलवे स्टेशन जाने की सोची। सचमुच देर हो गयी थी और हमे लग रहा था कि रेलवे स्टेशन के सामने मिल रहे टैक्सी वालों को ही पहले हाइर कर लेना चाहिए था। हमने ऑटो रोका तो तभी वो मोटर साइकिल वाला आ गया। उसने ऑटो वाले को रुकने को कहा और दोबारा बहस होने लग गयी। उसने कहा हम ऐसे टैक्सी नही छोड़ सकते थे। उनका नंबर का हिसाब था और इससे टैक्सी वाले को नुक्सान होगा। उधर से हमारी तरफ से कहा गया कि अगर वो चार हज़ार में ऐसी देता है तो हम तैयार थे। नॉन एसी में तो हम जायेंगे नहीं। वो हमे स्टैंड की तरफ चलने को बोलने लगा और हम कहने लगे कि नहीं हम तो वहीं रहेंगे या पुलिस को कॉल करेंगे। ऐसी ही बहस चलती रही तो उसने कहा वो स्टैंड से बात करके आता है और हम उसका इंतजार करें। इसी बहस में वो ऑटो वाला भी शामिल हो गया था। वो भी हमारे साथ फंस गया था। हमने उससे कहा कि उसकी बोनी हमने उसकी खराब करी उसके  लिए वो माफ़ कर दे और उसे बीस रूपये देकर जाने के लिए कहा। कुछ देर हमने बाइक वाले का इंतजार किया लेकिन वो नहीं आया।  फिर हम स्टेशन की तरफ चल दिए।

चलते हुए प्यास लगी तो हमे उस बोतल का ध्यान आया जो हमने टैक्सी में बैठने के बाद पेट्रोल पम्प पे ली थी। उतरने की जल्दी और बहस में हम उसे उधर ही भूल गये थे। हमने थोड़ा पानी तो पिया था लेकिन थोड़ा रह गया था। इसी बात पे थोड़ा बहुत मजाक हुआ कि अंकल के पास कुछ नहीं तो ठंडा पानी तो है। वो उससे गुस्सा शांत कर लेंगे। बीच बीच में ये भी कहते रहे कि माउंट आबू नही पहुँचे तो उदयपुर कौन सा बुरी जगह थी। इधर भी मिनी मीट तो हो सकती थी। ऐसे ही चलते चलते और होटलों के नाम पढ़ते पढ़ते स्टेशन आ गया। अब टैक्सी वालों से बातचीत आरम्भ होने लगी। बातचीत हुई और उसी आदमी से मामला तय हुआ जिसने सुबह स्टेशन से निकलते हुए चार हज़ार बोला था। हमे अभी काफी टाइम भी हो चुका था। हम जल्द से जल्द होटल पहुंचना चाहते थे। कई लोग उधर पहले से ही पहुँचे हुए थे। हम टैक्सी में बैठे और उदयपुर से होटल की तरफ चल दिए। वक्त सवा नौ बजे के करीब रहा होगा। हम साढ़े सात पे उदयपुर पहुँच गये थे और करीब दो घंटे घूमने के बाद माउंट आबू के लिए निकल रहे थे। हमे देर तो हो गयी थी लेकिन सफ़र में ऐसा होना लाजमी रहता है।
निकल पड़े पांच पापी माउंट आबू की तरफ 

इसके बाद का सफर ठीक-ठाक रहा। हमने एक बार उदयपुर का कोई स्थल देखने की भी सोची लेकिन फिर चूँकि काफी लेट हो गये थे तो खुद ही उस योजना को रद्द कर दिया।  दो घंटे बाद यानी लगभग ग्यारह सवा ग्यारह बजे हम एक ढाबे में रुके।  उधर रुककर हमने चाय बिस्कुट खाए। ढाबा काफी अच्छा था और इसका नाम जय बाबा रामदेव ढाबा था। इधर दस पन्द्रह मिनट रूककर हमने आराम किया।

दीपक भाई,अल्मास भाई, योगी भाई और मैं :सेल्फी कर्टसी दीपक भाई 

चाप पानी निपटाने के बाद : अल्मास भाई, दीपक भाई और योगी भाई 

आईस क्रीम का मज़ा लेते कुलदीप भाई 

ढाबे के बाहर पोज़ देते  दीपक भाई और कुलदीप भाई। 


आराम करने के बाद हम दोबारा होटल की तरफ बढ़ गये। हमने टैक्सी में बैठकर होटल की लोकेशन  मंगवा ली थी। इसको प्राप्त करने में थोड़ा मैसेजेस का आदान प्रदान ज्यादा लगा था। हम उन्हें लोकेशन  शेयर करने को कहते वो उधर से पता आता। पता हमारे किसी काम का नहीं था क्योंकि लोकेशन और जीपीएस की मदद से आगे जाना चाहते थे। थोड़ा बहुत कंफ्यूजन थी लेकिन आखिर कार लोकेशन आ ही गयी थी। सफ़र बदस्तूर चलता था।  काफी चलने के बाद एक जगह हमे गर्मी का एहसास हुआ। अब मुझे ढंग से तो याद नहीं लेकिन शायद होटल में पार्टी आरम्भ हो गयी थी और इसकी तस्वीर व्हाट्सएप्प  में मिली थी। इसने सबकी प्यास बढ़ा दी थी। ड्राईवर साहब से बोला गया कि कहीं बीयर वाले की दुकान मिले तो रोक दीजियेगा। अल्मास भाई ये सुनकर नाराज़ हो गये।  उन्होंने कहा हमें वैसे ही देरी हो गयी है इसलिए हमे बिना रुके चलना चाहिए। फिर वोटिंग का सिलसिला हुआ और ये निर्णय हुआ कि गाड़ी रुकेगी और गला तर करने का इंतजाम होगा। गाड़ी रुकी तो अल्मास भाई का भी मन डोल ही गया था।  इधर थोड़ा कोल्ड ड्रिंक और थोड़ा नमकीन और बीयर ली।  सबने अपने हिसाब से अपनी ड्रिंक चुनी और होटल का सफ़र ड्रिंक चुसकते हुए और चिप्स और मसाला मूंगफली खाते हुए बीता।
वो तस्वीर जिसने हमारे अन्दर की प्यास को बढाया था और हमे गाड़ी रुकवाकर ड्रिंकस लेने के लिए प्रेरित किया  फोटो में हैं :शिव भाई, अमीर सिंह जी , जी पी जी, राजीव भाई, सैंडी भाई , नवल जी ,गुरूजी और संदीप अग्रवाल जी 

टैक्सी से चलने का ये नुक्सान होता है कि आप आस पास के  नज़ारे नहीं देख पाते हो। आप एक डब्बे में ही तो चल रहे होते हो और फिर मैं सबसे पीछे वाली सीट पे बैठा था। उसकी लोकेशन  तो और अलग होती है। देखने के लिए गर्दन मोड़नी पड़ती है। इसलिए कुछ अच्छे दृश्य दिखे भी लेकिन उन्हें ढंग से कैमरे में कैद नहीं कर पाया। योगेश्वर भाई कई बार अच्छे दृश्य देखते हुए हमे बताते थे  लेकिन इन्हें देखने का उतना उत्साह नहीं था। फिर भी कुछ को कैद करने की कोशिश की।



हम अब सफ़र से थक भी गये थे और हमे होटल पहुँचने का इन्तजार था। माउंट आबू पहुँचने पर एक टोल टाइप का आया। ये पहला टोल नहीं था, ऐसे कई पहले भी आ चुके थे। टैक्सी में ५०० रूपये तो कम से कम से टोल के ही थे। इधर हमने अपने होटल यानी होटल सवेरा के विषय में पूछा तो उन्होंने बता कि होटल सनसेट के बगल में ही है। हमें अब एड्रेस का सही पता था और बिना किसी मुश्किल के हम होटल में पहुँच चुके थे।
होटल  सवेरा पैलेस : चित्र गूगल से साभार 

अन्दर रिसेप्शन पे हमने अपने ग्रुप के विषय में पता किया तो उन्होंने रूम १०५ के बाद के कुछ रूम हमे बता दिए। हम ऊपर चढ़ रहे थे कि मुझे विद्याधर भाई (मीट के आयोजकों में से एक) पूल के पास दिखे। पूल को देखकर अल्मास भाई और कुलदीप भाई काफी उत्साहित थे।उन्होंने प्लान बना लिया था कि सबसे मिलकर सबसे पहले पूल में ही जायेंगे। ये प्लान टैक्सी में ही बन गया था। हम १०५ नंबर रूम की तरफ गये।

अन्दर घुसे तो उधर महफ़िल जमी हुई थी। सबका प्रोग्राम चालू था। सबसे मिलना जुलना हुआ। ऊपर सबसे आपका परिचय करवा ही चुका हूँ।उस तस्वीर में केवल महेश ठाकुर जी नही थे लेकिन जब हम पहुँचे वो भी उधर ही थे। फिर थोड़ी बातचीत के बाद उन्होंने हमे रूम नंबर बताया और फ्रेश होने के लिए कहा। अभी हमे लंच भी करना था। मैं शुक्रवार सुबह का नहाया था और इस लम्बे सफ़र के बाद नहाना चाहता था। पूल में जाने का मेरा कोई इरादा नहीं था क्योंकि मेरे पास स्विमिंग ट्रंकस नहीं थे। मुझे १०८ नंबर आल्लोट हुआ था तो मैं उसमे चले गया। दीपक भाई भी उसी में थे। मैंने जाते ही ब्रश निकाला और सबसे पहले ब्रश किया। इसके बाद मैं नहाया और फिर शोर्ट और टी शर्ट डाल ली। बाकी लोग शायद पूल में चले गये थे। मैं तैयार होकर पूल की तरफ चले गया। अब तैर नहीं सकता था तो क्या हुआ। ऐसे ही मिलकर मस्ती तो कर सकता था। मैं उधर गया तो मुझे पता चला कि पूल में जाने के लिए शॉर्ट्स होटल प्रोवाइड कर रहा था।जब हम गोवा गये थे तो ऐसा कुछ नहीं हुआ था। ये मेरे लिए थोड़े आश्चर्य की बात थी लेकिन इस व्यवस्था ने मुझे प्रभावित किया। और होटल का स्विमिंग शॉर्ट्स प्रोवाइड करना जायज भी था। उधर काफी लोग थे। विद्याधर भाई के साथ चार लोग और आये थे तो वो भी उधर ही थे । उनसे भी हाई हेल्लो हुई और जब तक वो पूल में थे तब तक मैं उधर ही था। वो थोड़ी देर में ही बाहर आ गये थे। फिर दो चार फोटो खिंचवाई और वापस १०५ की तरफ सारे चल दिए।

पूल में मस्ती  
पूल साइड सेल्फी : जिनेश भाई, कुंतल भाई, विद्याधर भाई, जिगर भाई , दीपक भाई , कुलदीप भाई , शिव भाई और मैं 

उधर पहुँचे तो थोड़ी देर बैठे। फिर चूँकि लंच का वक्त हो गया था तो लंच करने का निर्णय हुआ। सबने अपने बचे हुए ड्रिंक खत्म किये और हम नीचे हाल में चल दिए। उधर बुफे सिस्टम था। उधर ही राकेश भाई और वीर नारायण भाई से मुलाक़ात हुई। जब हम पहुंचे थे तो वो नींद ले रहे थे और सीधा उठाकर ही लन्च हॉल में आये थे। अब सबने लंच करना चालू किया।  उसी दौरान ये निर्धारित हुआ कि लंच के बाद एक घंटा यानी साढ़े तीन तक थोड़ा आराम करेंगे और फिर घूमने का प्लान करेंगे। कुछ के मन में शंका थी कि कहीं ये एक घंटे आराम के बाद कुछ लोग उठे ही नहीं। वो चाहते थे कि लंच के बाद बिना रुके ही हम घूमने निकल पड़े। लेकिन ज्यादातर थोड़ा रेस्ट करने के पक्ष में थे। मैं भी थोड़ा कमर टिकाना चाहता था। मेरी कमर का दर्द अब काफी हद तक ठीक था लेकिन इतना ज्यादा सफर से थोड़ी दिक्कत तो हो ही रही थी। लंच के बाद थोड़ा आराम कमर को आराम ही देता। हमने लंच निपटाया। हॉल के बाहर ही एक टी टी टेबल थी। कुलदीप भाई और दिनेश भाई उसपे गेम ज़माने पे लग गये। हम भी थोड़ा उधर मस्ती करने लगे। थोड़ा और फोटो क्लिक करी गयी और थोड़ी देर की मस्ती के बाद सभी अपने अपने रूम में चले गये।
टेबल टेनिस के बाद की मस्ती : ऊपर के हिस्से  में -वीर नारायण भाई ,राकेश शर्मा भाई, दीपक भाई, दिनेश भाई,मैं कुलदीप भाई, शिव भाई , ठाकुर महेश जी और राजीव भाई , अल्मास भाई। नीचे के हिस्से में : ठाकुर महेश जी , सैंडी भाई , अल्मास भाई , राजीव भाई , मैं कुलदीप भाई और शिव भाई। (फोटो अल्मास भाई की फेसबुक वाल से साभार )

मैं भी रूम में आकर लेट गया। दीपक भाई भी उसी रूम में थे। उनकी कमर में भी दर्द हो रहा था। वो लगातार सफ़र पे थे तो शायद कोई मसल खिंच गयी थी। वो भी इसलिए थोड़ा लेटने के पक्ष में थे।  अब मैं लेटकर पाठक साहब की जीत सिंह श्रृंखला का उपन्यास मुझसे बुरा कौन पढने लग गया। मैंने 'न आने वाला कल' मीट के बाद पढने का मन बनाया था। पाठक साहब की मीट के दौरान उन्ही की रचना मैं पढना चाहता था।मैंने उपन्यास के कुछ पन्ने पढ़े। जीत सिंह भेष बदल कर मुंबई वापस आ गया था। वो अब टैक्सी चला रहा था लेकिन शान्ति से कट रहे उसके जीवन में अशांति आने वाली थी। न उसे ये पता था और न उस वक्त मुझे कि उसने जिस बन्दे को टैक्सी में बैठाया था वो ही इसका कारण बनने वाला था।

लेकिन अभी मुझे जीत सिंह के इस सफ़र को इधर ही रोकना था क्योंकि तभी उधर राजीव भाई आये। ग्रुप में चैट के दौरान मैंने एक बार बताया था कि मैंने अशोक बैंकर साहब की दशराजन नहीं पढ़ी थी। उनके पास ये पुस्तक थी और वो मेरे लिए इसे लाये थे। जब उन्होंने मुझे पुस्तक दी तो मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। मैं हैरत में था। उनका ये जेस्चर दिल को छू गया था।  उस वक्त मैं शायद ढंग से शुक्रिया भी नहीं कह सका था। इधर एक बार राजीव भाई का तहे दिल से शुक्रिया कि उन्होंने मेरे विषय में इतना सोचा।

राजीव भाई 



फिर हम थोड़ी देर ऐसे ही बैठे रहे। यहाँ वहाँ की बातें हुई। इसी दौरान विद्याधर भाई आये। अब यहाँ पे आकर मेरी याददाश्त धोखा खा जाती है। उन्होंने हमे तैयार होने के लिए बोला था लेकिन मुझे ये याद नहीं कि उन्होंने हमे बुकमार्क शनिवार को दिए थे या रविवार को दिए थे।  मैं इधर यही मान  कर चल रहा हूँ कि शनिवार को उस वक्त उन्होंने हमे बुकमार्क दे दिए थे। उन्होंने हमे तैयार होने के लिए कहा और बुक मार्क पकड़ाये। अगर आप एक पाठक हैं तो आपको पता होगा कि बुकमार्क एक पाठक के लिए कितना जरूरी होता है। ऐसे में बुक मार्क का पूरा कलेक्शन मिला वाकई दिल बाग़ बाग़ कर देने वाली बात थी।  विद्या और शिव भाई के तरफ से ये उपहार सारे ही पाठकों को मिला और उनका तहे दिल से शुक्रिया। अब जब भी पुस्तक पढेंगे आप हमारे मन में रहोगे।

बुक मार्क का कलेक्शन 
अब बुक मार्क को मैंने बैग के सुपुद्र किया। उपन्यास को बंद किया। अब तक राजीव भाई भी तैयार होने के लिए चले गये थे। हमने भी तैयार होना शुरू किया। माउंट आबू के दर्शनीय स्थल हमारा इतंजार कर रहे थे।

एडिट :
(30 मई 2017 )
विद्याभाई ने बुक मार्क्स से सम्बंधित शंका का समाधान किया और बताया कि ये प्रक्रिया रविवार की सुबह हुई थी। लगता है मुझे बादाम खाने शुरू करने पड़ेंगे। लेकिन याद नहीं आ रहे खरीद कर किधर रखे थे। 😜😜😂😂


क्रमशः

पूरी ट्रिप के लिंकस
माउंट आबू मीट #१: शुक्रवार का सफ़र
माउंट आबू मीट #२ : उदय पुर से होटल सवेरा तक
माउंट आबू  #3 (शनिवार): नक्की झील, टोड रोक और बोटिंग
माउंट आबू #4: सनसेट पॉइंट, वैली वाक
माउंट आबू मीट #5: रात की महफ़िल

8 टिप्‍पणियां:

  1. Badhiya Vikas bhai. Waiting for next part.

    P.S. Bookmarks Sunday morning ko diye they. :)

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    1. विद्या भाई इसी में कंफ्यूजन था। अच्छा हुआ आपने इसका समाधान कर दिया।

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  2. आज पहली बार आपके ब्लॉग के बारे में जानकारी मिली है। अपनी यादों को ऐसे ही ब्लॉग रुप में संजो कर सुरक्षित रखते रहिए।

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    1. शुक्रिया, संदीप भाई। आपके शब्द मुझे प्रोत्साहन देंगे। ब्लॉग पर आने का, शुक्रिया।

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  3. ट्रेन की चाय जरूरी है नहीं तो कौन गरम पानी पिता... बढ़िया पोस्ट

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    1. जी प्रतीक जी, मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आते रहिएगा।

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