बुधवार, 17 दिसंबर 2014

गजब ढाते हो

खुद ही ज़ख्म देके मरहम लगाते हो ,
मेरी जान क्यूँ मुझ पर गजब ढाते हो ,

मेरी हालत देख कर जब तुम मुस्कुराते हो ,
पता है कितना मुझ पर गज़ब ढाते हो ,

जब भी मेरे इश्क ए इकरार को तुम नकारते हो ,
मेरी जान मुझ पर गज़ब ढाते हो ,

जानता हूँ जानबूझकर तुम मुझे चिढ़ाते हो ,
पर सोचा है कभी कितना मुझ पर गज़ब ढाते हो ,

मेरे सपनो में आकर मुझे जगाते हो ,
जाने क्यूँ मुझ पर इतना ग़जब ढाते हो।

- विकास 'अंजान'

नोट : copyright  © २०१४ विकास नैनवाल  

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

आपकी टिपण्णियाँ मुझे और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेंगी इसलिए हो सके तो पोस्ट के ऊपर अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।

हफ्ते की लोकप्रिय पोस्ट(Last week's Popular Post)